Spam Calls and TRAI: आखिर क्यों नहीं मिल पा रहा है स्पैम कॉल से छुटकारा?
स्पैम कॉल अथवा साधारण भाषा में कहें तो मार्केटिंग कंपनियों की अनचाही कॉल से पूरी दुनिया परेशान है। ट्राई वर्षो से उपभोक्ताओं को इससे छुटकारा दिलाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसका हर प्रयास बेकार साबित क्यों हो जाता है?

Spam Calls and TRAI: पिछले हफ्ते ट्राई ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। उसने सभी टेलीकॉम कंपनियों को 30 से 60 दिनों के भीतर अनचाहे कॉल और मैसेजों पर रोक लगाने के लिए कहा है। इसके लिए कंपनियों को डीएलटी पर रजिस्टर्ड सभी हेडर और मैसेज टेंपलेट को फिर से वेरीफाई करना होगा। डीएलटी यानि डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी एक प्लेटफॉर्म है, जिस पर मार्केटिंग या अन्य कंपनियां अपने हेडर और मैसेज टेम्पलेट पंजीकृत कराकर उसी फॉर्मेट में लोगों को संदेश भेजती हैं। हेडर एक तरह से मैसेज भेजने वाले की आईडी होता है। हेडर का पहला अक्षर टेलीकॉम कंपनी के नाम से जुड़ा होता है और दूसरा राज्य के नाम से। इसके बाद के पांच-छह अक्षर उस कंपनी या संस्था का संक्षिप्त नाम होते हैं जो मैसेज भेजती है।
सख्ती की कमी
होता यह है कि कुछ टेलीमार्केटियर पंजीकरण तो करवा लेते हैं, लेकिन सीमित अवधि के लिए ही कराते हैं। पंजीकरण एक्सपायर हो जाता है, पर उनका मैसेज भेजना, कॉल करना जारी रहता है।
दूसरी दिक्कत ये है कि सख्ती के अभाव में कई टेलीमार्केटर्स बिना डीएलटी पर पंजीकृत किए ही मैसेज भेजते रहते हैं। ये कॉल या मैसेज सामान्यतः दस अंकों वाले मोबाइल नंबर से किए जाते हैं। उपभोक्ता के लिए यह पहचानना मुश्किल होता है कि ये कामर्शियल कॉल हैं या पर्सनल। वह न चाहते हुए भी इन कॉल को रिसीव करता है या मैसेज खोलता है।
अधिकतर यूजर्स का अनुभव है कि ऐसे पचास प्रतिशत कॉल व मैसेज, पर्सनल लगने वाले नंबरों से भेजे जाते हैं। आप एक नंबर ब्लॉक करते हैं, उसी कंपनी के कॉल व मैसेज आपको दूसरे नंबर से आने लगते हैं। यदि ट्राई ऐसी कोई व्यवस्था कर सके कि एक आधार नंबर पर एक बार में दो या तीन से ज्यादा फोन नंबर न दिए जाएं तो इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है। लेकिन, टेलीकॉम कंपनियां शायद ही इसके लिए राजी हों।
ट्राई के नए निर्देश उपभोक्ताओं की परेशानी दूर करने के लिए हैं। लेकिन, सवाल यह है कि क्या वाकई उन्हें इससे कोई राहत मिलने वाली है? शायद नहीं, क्योंकि अभी तक इनसे संबंधित जितनी जानकारी सामने आई है, उससे यही पता चलता है कि ये गाइडलाइंस सिर्फ मैसेज के लिए हैं। कॉल के लिए इन निर्देशों में कहीं कुछ नहीं कहा गया है।
जबकि पिछले साल नवंबर में ट्राई ने जो कन्सल्टेशन पेपर रिलीज किया था, उसमें बहुत सारी महत्वपूर्ण बातें थीं। इनमें एक थी सीएनएपी यानि कॉलर नेम प्रेजेंटेटर। इसमें एआई, मशीन लर्निंग टेक्नोलॉजी व स्पैम डिटेक्ट सिस्टम आदि की मदद से कॉलर का नाम डिस्प्ले करने की बात कही गई थी।
हालांकि ट्रूकॉलर जैसे एप्प अभी यह सुविधा दे रहे हैं। लेकिन, स्पैमर्स की पहचान में ये भी ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं। इसकी वजह यह है कि इसमें यूजर अपना कोई भी नाम सेव कर सकता है। ट्रूकॉलर आपको वही नाम दिखाएगा, जिसे यूजर ने अपना नंबर सेव करते समय एड किया होगा। जबकि सीएनएपी में वही नाम आपके मोबाइल स्क्रीन पर डिस्प्ले होगा, जिस पर उस नंबर का सिम कार्ड रजिस्टर्ड होगा। दूसरे, आप किसी स्पैमर के एक नंबर को ब्लॉक करते हैं तो वह दूसरे नंबर से कॉल या मैसेज करने लगता है।
वर्तमान में जारी व्यवस्था में सिर्फ कॉलर का नंबर डिस्प्ले होता है। टेलीकॉम कंपनियों को लाइसेंस के लिए सीएनएपी लागू करने की कोई बाध्यता नहीं है। टेलीकॉम कंपनियाँ और स्पैमर इसका पूरा फायदा उठाते हैं। इसी का नतीजा है कि ब्राजील, पेरू और यूक्रेन के बाद भारत स्पैम कॉलरों के लिए चौथा सबसे पसंदीदा देश है। देश के हर तीन में से दो मोबाइल फोन यूजर स्पैम कॉल, रोबो कॉल या फ्रॉड कॉल से त्रस्त हैं।
हर महीने दो करोड़ स्पैम कॉल
करीब डेढ़ साल पहले वर्ष 2021 में ट्रूकॉलर ने एक ग्लोबल स्पैम रिपोर्ट जारी की थी। इसमें दिए गए आंकड़े बताते हैं कि स्पैम की समस्या हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा बड़ी है। इसमें कंपनी ने दावा किया था कि उसने जनवरी'21 से अक्टूबर'21 के बीच 37.8 अरब स्पैम कॉल ब्लॉक करके दुनिया के तीस करोड़ लोगों की मदद की।
रिपोर्ट में भारत के बारे में बताया गया था कि यहॉं अक्टूबर में यूजर्स को 3.8 अरब स्पैम कॉल मिलीं। हर भारतीय ने प्रतिमाह लगभग 16.8 स्पैम कॉल रिसीव की थीं। यही आँकड़े थे, जिनकी वजह से 2020 में भारत 'स्पैम' के मामले में नौवें स्थान से चौथे स्थान पर आ पहुँचा था। स्मरण रहे कि ये सिर्फ उन यूजर्स के आँकड़े हैं, जिन्होंने अपने फोन में ट्रूकॉलर एप्प इंस्टॉल किया हुआ था। वास्तविक संख्या इससे काफी बड़ी हो सकती है।
डीएनडी भी कारगर नहीं
ऐसे कॉल या मैसेज से बचने के लिए लोग एक दूसरे को ' डूनॉट डिस्टर्ब' वाला ऑप्शन चालू करने की सलाह देते हैं। लेकिन, जो लोग इस विकल्प को आजमाकर देख चुके हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि डीएनडी किसी काम का नहीं है। कुछ अर्सा पहले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोकल सर्किल्स ने देश के 342 जिलों में एक सर्वे किया। इसमें करीब 66 हजार प्रतिक्रियाएं मिलीं।
डीएनडी से संबंधित प्रश्न का जवाब देने वाले 15 हजार प्रतिभागियों में से 92% का कहना था कि उन्हें डीएनडी लिस्ट में दर्ज होने के बावजूद अनचाहे मैसेज आना जारी था। शॉपिंग, क्रेडिट कार्ड, इन्श्योरेंस, ऑफर्स आदि से संबंधित इन एसएमएस में करीब एक चौथाई तो खुद उनके मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर के द्वारा भेजे होते थे।
ऐसा ही एक सर्वे लोकल सर्किल्स ने जुलाई 2021 में ही कराया था। उसमें यह शिकायत करने वालों की संख्या, सिर्फ 74 प्रतिशत ही थी।
ट्राई डाल-डाल, स्पैमर पात-पात
यह सिर्फ डीएनडी की ही असफलता नहीं है। पिछले 10-12 सालों में हमने ट्राई को बार-बार इस दिशा में कदम बढ़ाते देखा है। लेकिन हर बार स्पैमर, रेगुलेशनों से ज्यादा स्मार्ट साबित होते हैं।
उदाहरण के लिए 2011 में ट्राई ने सभी प्रमोशनल कॉल्स और मैसेजेज पर ब्लैंकेट बैन लगा दिया । इस साल ड्राई ने 15 टेलीमार्केटर्स और 100 व्यक्तिगत यूजर्स पर नियमों के उल्लंघन के लिए जुर्माना लगाया। स्पैमर ने इससे बचने का रास्ता खोज निकाला और भारतीय वेबसाइटों की बजाए विदेशी वेबसाइटों का इस्तेमाल कर मैसेज और फोन कॉल करना शुरू कर दिया।
2018 में ट्राई ने, 'स्पैम' रोकने के लिए ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने की बात कही थी और दावा किया था कि ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला दूरसंचार क्षेत्र होगा। लेकिन इस तकनीक से भी यूजर्स को कोई खास राहत नहीं मिल पाई।
इस तरह स्पैमर और स्कैमर अपना खेल जारी रखे हैं और ट्राई का कोई कदम त्रस्त यूजर्स में भरोसा नहीं जगा पा रहा है कि उन्हें अनचाहे मैसेज और कॉल्स से छुटकारा मिल सकता है। देखते हैं कि ताजा निर्देश कितने असरदार सिद्ध होते हैं।
यह भी पढ़ें: हर महीने इतना डेटा यूज करते हैं भारतीय यूजर, रिपोर्ट में बताया पिछले पांच सालों में हुआ चौंकाने वाला इजाफा
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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