Indian Economy: तेजी से बढ़ने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मंद क्यों हुई
बढ़ती महंगाई, औद्योगिक उत्पादन, सेवा और कृषि क्षेत्र की मंदी तथा राजकोषीय घाटा ऐसे कारक हैं जो इस वित्त वर्ष में चिंता के कारण बन सकते हैं।

Indian Economy: पिछले एक सप्ताह में भारतीय अर्थव्यवस्था पर केंद्रित तीन महत्वपूर्ण रिपोर्ट आई है। पहली रिपोर्ट केंद्र सरकार के सांख्यिकीय कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी की गई है, जिसमें बताया गया है कि साल के आखिरी तिमाही (अक्टूबर से दिसंबर 2022) मे सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की दर घट कर 4.4 प्रतिशत रह गई है। दूसरा, महालेखा नियंत्रक (सीएजी) की रिपोर्ट में वर्ष 2022-23 के राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 17.55 लाख करोड़ रुपए यानी कि सकल घरेलू उत्पाद का 6.4% बताया गया है जो कि अनुमान से बहुत अधिक है। तीसरी रिपोर्ट में आर्थिक मामलों पर गहन अध्ययन करने वाली संस्था मूडीज ने निजी उपभोग व्यय में कमी, निर्माण के क्षेत्र में आई नरमी तथा कृषि क्षेत्र में पर्याप्त संकुचन के चलते आई सुस्ती को चिन्हित किया है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 6.8% के आंकड़े से उलट भारतीय रिजर्व बैंक तथा एशियन डेवलपमेंट बैंक ने वित्तीय वर्ष 22-23 में जीडीपी में वृद्धि दर 7% रहने का अनुमान किया है, लेकिन जीएसटी संग्रह में वृद्धि का नगाड़ा पीटते हुए सरकार द्वारा आर्थिक प्रगति में सुस्ती को बार-बार नकारे जाने के बावजूद इन रिपोर्टों के समग्र आंकलन तथा अर्थ विशेषज्ञों की राय में देश वित्तीय मजबूती की ओर नहीं बढ़ पा रहा है।
देश की जो फिलहाल आर्थिक स्थिति है उसमें बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ अंदरूनी चुनौतियां भी हैं। बाहरी चुनौतियों में प्रमुख रूप से डॉलर की लगातार मजबूती, रूस यूक्रेन के बीच खींचता लंबा युद्ध आदि का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। हमारी विकास दर लगातार घटती चली जा रही है। औद्योगिक विकास दर और सेवा क्षेत्र में मंदी छाई है। हालिया अध्ययन में कृषि क्षेत्र में भी पर्याप्त संकुचन दर्ज किया गया है। चूंकि अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान कम होने की संभावना जताई गई है इसलिए अर्थव्यवस्था की विकास दर भी कम होना अवश्यंभावी है। मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण महंगाई भी बेकाबू है, वहीं राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि वित्त मंत्री ने बजट पेश करते हुए वित्त वर्ष 2023-24 के लिए राजकोषीय घाटा बजट का 5.9% रहने का अनुमान किया है।
कोरोना महामारी के बाद अमेरिका सहित पश्चिम के देशों की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौटने का संकेत दे रही है, लेकिन विदेशी निवेश अभी भारत की ओर नहीं आ रहा है। यहां तक कि बड़ी तादाद में भारतीय पूंजी किसी ना किसी बहाने बाहर जा रही है। बजट सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था कि पिछले 6 सालों के दौरान लगभग ढाई लाख भारतीय मयपूंजी देश छोड़कर विदेश चले गए हैं।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा बीते सप्ताह जारी किए गए आंकड़े में चालू वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 4.4% पर आ गई है जो कि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 11.2% रही थी। इसके साथ ही वित्त वर्ष 21-22 के लिए देश की आर्थिक वृद्धि को 8.7% के पिछले अनुमान से संशोधित कर 9.1% किया गया है वही सरकार ने वित्त वर्ष 22-23 के लिए आर्थिक वृद्धि दर 7% रहने का अनुमान लगाया है। इस क्रम में मौजूदा स्थिति का आंकलन करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.8% कर दिया है जबकि इसके पहले 7% वृद्धि की उम्मीद जताई थी।
दूसरी तरफ आर्थिक मामलों पर गहन अध्ययन करने वाली संस्था मूडीज ने अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती को अस्थाई बताया है तथा कहा है कि आगे की तिमाहियों में इसमें सुधार की संभावना है। मालूम हो कि चालू वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र में 1.1%, निजी उपभोग के क्षेत्र में 2.1% तथा कृषि के क्षेत्र में 1.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। एजेंसी का मानना है कि व्यापार के बनिस्बत देश की घरेलू अर्थव्यवस्था भारत की समृद्धि का प्रमुख इंजन है। लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य है कि वर्ष 2021 की दूसरी तिमाही में जब कोविड-19 का अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा था उसके बाद से यह पहली बार है कि जब निजी खपत कम होने की वजह से पूरी जीडीपी की रफ्तार मंद पड़ गई है।
कई आर्थिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि बीते वर्ष के आखिरी में निजी उपभोग और निर्माण क्षेत्र के रफ्तार का कम होना अस्थाई है और इसके परिणाम बहुत हद तक आगे लाभदायक ही होंगे। इससे अर्थव्यवस्था के पूरी तरह से रुके बिना मांग संबंधी दबाव दूर होने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप में शुरुआती पुनरुद्धार में आ रही लगातार बेहतर वृद्धि का लाभ भी वर्ष 2023 के मध्य की तिमाहियों में भारत को मिलता हुआ दिखाई देगा।
यह समझने के लिए जीडीपी के चार प्रमुख हिस्सों उपभोक्ता व्यय, निवेश, सरकारी खरीदारी और सकल निर्यात में पिछले वर्ष में हुए विकास को देखा जा सकता है। कोरोना संकट के बाद उपभोग, निवेश और निर्यात में तेजी के संकेत मिल रहे थे, लेकिन वर्तमान में हुए आंकलन के अनुसार सभी मोर्चों पर सुस्ती आई है। पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण इनके वैश्विक स्तर पर बढ़ते मूल्यों का असर यहां के आर्थिक विकास पर नकारात्मक रहा है।
भारत दिसंबर 2021 में ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था, जबकि 2014 में दसवें पायदान पर था। फिलहाल विश्व की जीडीपी में भारत का योगदान 3.5% है। माना जा रहा है कि मौजूदा वृद्धि दर के कायम रहने पर 2027 में भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा और 2029 में तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की राह खुल जाएगी।
कई एक बाहरी एवं आंतरिक चुनौतियों के बावजूद विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा कई रेटिंग एजेंसियों सहित विभिन्न संस्थाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ने का अनुमान लगाया है। आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में संभावित उभार के पक्ष में भी मजबूत तर्क दिए जा रहे हैं।
लेकिन इन सकारात्मक पक्ष के साथ ही जनसंख्या के अनुपात में प्राकृतिक संसाधनों और पूंजी की कमी, बड़ी आबादी के लिए उपयुक्त रोजगार की सीमित उपलब्धता, कृषि पर अत्यधिक लोगों की निर्भरता और इसमें उत्पादन एवं आय को लेकर अनिश्चितता, आर्थिक असमानता, सीमित तकनीकी विकास, सरकारों के राजस्व की सीमा जैसे अनेक ऐसे मुद्दे हैं जो नीतिगत स्तर पर अब भी चुनौती बने हुए हैं।
ऐसे में चालू वर्ष की अंतिम तिमाही में आई सुस्ती के आंकड़े ठहर कर सोचने और नीतिगत तौर पर आगे बढ़ने की चेतावनी देते हैं। 12 महीनों के 365 दिन इलेक्शन मोड में रहने वाली सरकार द्वारा उपाय के नाम पर आश्वासन और दावे से ऊपर उठते हुए विकास को अपेक्षित गति देने के लिए समावेशी और स्थाई नीति पर काम करना होगा। अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही भारत भविष्य में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में कामयाब होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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