Kamal Nath: कमल दल में क्यों समाना चाहते हैं कमलनाथ?
Kamal Nath: कमलनाथ के कमलदल में समाहित होने की खबरें सिर्फ अफवाह नहीं हैं। इसमें सच्चाई है और सौदेबाजी भी जारी है। सवाल यह है कि आखिरकार ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस में 50 साल का राजनीतिक जीवन और उम्र के 77 साल पूरे कर चुके कमलनाथ उम्र के अंतिम पड़ाव में भाजपा में आना चाहते हैं?
वर्तमान में कांग्रेस की राष्ट्रीय और मध्य प्रदेश की राजनीति को देखें तो कमलनाथ के लिए कोई ज्यादा जगह नहीं बची है। कमलनाथ के करीबी नेताओं का कहना है कि कमलनाथ की नाराजगी सोनिया से नहीं राहुल गांधी से रही है।

कमलनाथ की कांग्रेस से नाराजगी की जो वजह सामने आ रही है वह यह कि मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को उम्मीद थी कि कमलनाथ पार्टी के लिए पैसा खर्च करेंगे। अपने उद्योगपति मित्रों से आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराएंगे लेकिन कमलनाथ ने न खुद पार्टी फंड में पैसा दिया और न ही मित्रों से मदद उपलब्ध कराई।
कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे और राहुल गांधी कमलनाथ की इस बात से भी नाराज थे कि इंडिया गठबंधन की मध्य प्रदेश चुनाव के समय भोपाल में होने वाली रैली कमलनाथ ने निरस्त करवा दी थी। मध्य प्रदेश चुनाव के दौरान कमलनाथ का टिकट के प्रार्थी से यह कहने का बयान वायरल होना कि जाओ दिग्विजय सिंह के कपडे फाड़ो, ने भी मध्यप्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी को सामने ला दिया था।
कमलनाथ की अपनी शिकायतें भी पार्टी हाईकमान से थी। मध्यप्रदेश चुनाव में टिकट वितरण में दिग्विजय सिंह की दखंलदाजी के बाद भी हार का ठीकरा सिर्फ उनके सिर फूटने से वह नाराज हैं। कमलनाथ इस बात से भी नाराज हैं कि उनकी जगह जीतू पटवारी को मध्यप्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष्र नियुक्त कर दिया गया लेकिन उनसे राय नहीं ली गई। कमलनाथ इस बात से भी असहज थे कि विपक्ष का नेता बनने की उनकी मंशा को नरजअंदाज कर पार्टी ने उमंग धिंगार को विपक्ष का नेता बना दिया।
मध्यप्रदेश की राजनीति में सबकुछ गंवा चुके कमलनााथ इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि पार्टी उन्हे मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजने का प्रस्ताव देगी लेकिन पार्टी ने कमलनाथ को ना ही राज्यसभा भेजना उचित समझा और न ही राज्यसभा किसे भेजना है, इस संबध में उनकी राय ली। दिग्विजय के बेहद करीबी ग्वालियर के अशोक सिंह को राज्यसभा भेजकर कमलनाथ की नाराजगी को बढ़ा दिया।
लेकिन सिर्फ इन्हीं कारणों को कमलनाथ के भाजपा के करीब आने का प्रमुख कारण मानना ठीक नहीं है। भाजपा और कमलनाथ के बीच बढ़ती करीबी के कुछ और भी कारण हैं जिन्हें जानना और समझना जरूरी है। कमलनाथ को कमल के करीब ले जाने का एक कारण सिख दंगो में कमलनाथ की भूमिका पर आगामी 23 अप्रैल को आनेवाली एसआईटी की रिपोर्ट है। 1984 में हुए सिख विरोधी दंगो में कमलनाथ के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर कोर्ट ने एसआईटी से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।
कमलनाथ के भाजपा की ओर कदम बढ़ाने का दूसरा प्रमुख कारण 354 करोड़ की बैंक धोखाधड़ी के मामले को लेकर ईडी का शिंकजा कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी और कमलनाथ के परिवार के सदस्यों पर कस रहा है। गौरतलब है कि कमलनाथ परिवार के सदस्यो के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय ने 2020 में प्रिवेंशन आफ मनी लॉन्ड्रिग एक्ट के तहत मामला दर्ज कर कमलनाथ के भांजे को गिरफ्तार किया था। इस मामले में कमलनाथ की बहन नीता, बहनोई दीपक पुरी और कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ की भूमिका की जांच सीबीआई और ईडी कर रही है।
कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ को इस बारे में नोटिस भी जारी हो चुका है। कमलनाथ को अपने बेटे नकुलनाथ को जांच एजेसियों से बचाने के अलावा सांसद बेटे के राजनीतिक भविष्य को भी सुरक्षित करना है। कमलनाथ इस बात को समझते हैं कि उनके बगैर नकुलनाथ की कांग्रेस में एक सांसद से ज्यादा हैसियत नहीं रहेगी। मोदी लहर में 2024 के चुनाव में नकुलनाथ की जीत आसान भी नहीं है। 2019 में छिंदवाड़ा जैसी सुरक्षित सीट से नकुलनाथ सिर्फ 40 हजार वोट से जीते थे।
कमलनाथ को साथ लाकर भाजपा सिर्फ छिंदवाड़ा सीट पर फोकस नहीं कर रही है। भाजपा का आकलन है कि छिंदवाडा सीट तो मिलेगी ही, विधानसभा में भी कांग्रेस के 66 विधायकों में से 15 से ज्यादा विधायक भाजपा के साथ आ जाएंगे। छिंदवाडा जिले के सभी 6 कांग्रेसी विधायक भी भाजपा के खेमें में कमलनाथ के साथ जाएंगे।
कमलनाथ के साथ आने से कांग्रेस का मजबूत गढ़ छिंदवाड़ा भी ढह जाएगा। कमलनाथ के साथ मुरैना महापौर शारदा सोलंकी, ग्वालियर महापौर शोभा सिकरवार, रीवा महापौर अजय मिश्रा, और छिंदवाड़ा महापौर विक्रम अहाके भी भाजपा में जा सकते हैं।
कमलनाथ को लेकर इतने फायदे में रहने के बाद भी भाजपा के लिए कमलनाथ को लेकर दुविधा बनी हुई है। संघ का एक बड़ा वर्ग कमलनाथ के खिलाफ है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी कमलनाथ को लेकर विरोध कर रहे हैं और शिवराज के विरोध की ताकत कमलनाथ के धुर विरोधी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बढ़ा रहे हैं। सिंधिया कमलनाथ की एंट्री को रोकने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।
कमलनाथ को लेकर सिख नेता भी अपनी नाराजगी से केन्द्रीय नेतृत्व को अवगत करा चुके हैं। भाजपा कमलनाथ को लेने से पहले इस बात का भी आकलन कर रही है कि कहीं दिल्ली और पंजाब में इसका खामियाजा ना भुगतना पड़े। इस बात की संभावना भी है कि भाजपा बीच का रास्ता निकालते हुए अभी सिर्फ कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ को पार्टी में शामिल करे। कमलनाथ कांग्रेस में बने रहे। लोकसभा चुनाव के बाद कमलनाथ को किसी राज्य का राज्यपाल बनाकर एडजस्ट किया जा सकता है।
भाजपा कमलनाथ को पार्टी में लाने से पहले हर पहलू पर गंभीरता से विचार कर रही है। कमलनाथ भी उम्र के इस पड़ाव पर कांग्रेस छोड़ने की पूरी कीमत वसूल करना चाहते है। भाजपा और कमलनाथ के अपने अपने स्वार्थ और मजबूरी है। दोनों एक दूसरे को तौल रहे हैं। दोनों तराजू का पलड़ा अपनी ओर ज्यादा झुका देखना चाहते हैं। इसलिए कमलनाथ और भाजपा में सौदेबाजी की बातचीत जारी है। यह सौदा किसे फायदे पहुंचाता है किसे मंहगा साबित होता है यह आने वाला समय बताएगा लेकिन यह तय है कि कमलनाथ की राजनीति का कांग्रेस में अंत अब करीब है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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