कश्मीर में चुनाव से पहले परिसीमन के पीछे क्या है अमित शाह की सोच?

नई दिल्ली। भाजपा के लिए लंबे समय से एजेंडे पर रहे जम्मू कश्मीर को लेकर उसकी राजनीति के अब परवान चढ़ने का वक्त आ गया लगता है। लोकसभा चुनाव में एक बार फिर मिली बड़ी जीत और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद से एक तरह से तय माना जाने लगा था कि अब सरकार वह सब कुछ करेगी जो जम्मू कश्मीर को लेकर भाजपा के घोषणा पत्र में कहा गया था और जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चुनावी सभाओं में बहुत मजबूती के साथ कहा करते थे। भाजपा ने अपने एजेंडों को आगे बढ़ाने के लिए ही पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाई थी। हालांकि गठबंधन बीच में ही टूट जाने के कारण सरकार नहीं रही और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया, लेकिन इस सबके पीछे भाजपा के एजेंडे ही प्रमुख कारण माने जाते रहे। अब बदली परिस्थितियों में भाजपा उस सबको लागू करने की स्थिति में लग रही है जिसका वादा वह राज्य और देश की जनता के समक्ष वर्षों से करती आ रही है।

परिसीमन का काम चुनाव से पहले ही करा लेना चाहती है सरकार

परिसीमन का काम चुनाव से पहले ही करा लेना चाहती है सरकार

उस सरकार में भले ही भाजपा अपने एजेंडों को नहीं लागू कर सकी, लेकिन अब केंद्र सरकार के जरिये उन कामों को पूरा करने की योजना बनाई जा रही है। इनमें धारा 370 से लेकर 35 ए तक फैसले लिए जाने की उम्मीद की जा रही है। फिलहाल शुरुआत विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के साथ की जाने की तैयारियां हो रही हैं। इसी के साथ विरोध की आवाजें भी उठने लगी हैं। यह सब तब हो रहा है जब चुनाव आयोग की ओर से चुनाव की तैयारियां भी की जा रही हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि सरकार परिसीमन का काम चुनाव से पहले ही करा लेना चाहती है। स्वाभाविक रूप से अगर नए सिरे से परिसीमन हो जाता है और इसका अपेक्षित लाभ भाजपा को हासिल हो जाता है, तो धारा 370 और 35 ए पर फैसला लेना भी और ज्यादा आसान हो जाएगा। लेकिन विपक्ष की ओर से जिस तरह की आवाजें उठ रही हैं, उससे इस बात की आशंका भी जताई जा रही है कि अमित शाह के लिए परिसीमन की राह उतनी आसान होगी जितनी वह मानकर चल रहे हैं।

परिसीमन को लेकर आयोग का गठन करने की बात भी सामने आई

परिसीमन को लेकर आयोग का गठन करने की बात भी सामने आई

दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री का कार्यभार संभालने के बाद अमित शाह ने जम्मू कश्मीर को लेकर एक बैठक की। इसी बैठक में परिसीमन को लेकर आयोग का गठन करने की बात भी सामने आई। हालांकि इस तरह की बातें भी की गईं कि बैठक में परिसीमन को लेकर कोई फैसला नहीं किया गया, लेकिन एक तरह से यह मान लिया गया है कि इसको लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। जम्मू कश्मीर में परिसीमन का मुद्दा लंबे समय से चला आ रहा है। भाजपा 2008 से ही लगातार मांग करती रही है कि जम्मू कश्मीर का नए सिरे से परिसीमन किया जाए ताकि सभी के साथ न्याय हो सके। उस समय अमरनाथ भूमि का विवाद बहुत गरम था। यहां यह उल्लेखनीय है कि इससे पहले जम्मू कश्मीर में परिसीमन 1995 में हुआ था। यह भी एक तथ्य है कि 2002 में उस समय की फारूक अब्दुल्ला सरकार ने एक फैसले के तहत 2026 तक परिसीमन पर रोक लगा दी थी। उस समय उनकी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस एनडीए में थी जिसकी केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। कहा जाता है कि इस फैसले में केंद्र सरकार की भी सहमति थी।

कश्मीर से संबंधित अन्य एजेंडे लागू करने में भी होगी सहूलियत

कश्मीर से संबंधित अन्य एजेंडे लागू करने में भी होगी सहूलियत

ऐसा कहा जाता है कि भाजपा की कोशिश जम्मू क्षेत्र में सीटों की संख्या बढ़ाने का जहां वह अपना ज्यादा मजबूत आधार मान कर चलती है। इसके जरिये वह राज्य की सत्ता पर मजबूत पकड़ बना सकती है। कुल 87 सीटों वाली राज्य विधानसभा में अभी कश्मीर क्षेत्र में 46, जम्मू क्षेत्र में 37 और लद्दाख क्षेत्र में चार सीटें हैं। वैसे सीटों की कुल संख्या 111 हैं लेकिन इनमें से 24 को रिक्त रखा गया है जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लिए बताई जाती हैं। विधानसभा चुनाव केवल 87 सीटों के लिए होते हैं। भाजपा का जम्मू क्षेत्र में अच्छा खासा जनाधार माना जाता है और उसे चुनावों में अच्छी सफलता भी मिलती रही है। अगर परिसीमन के बाद इस क्षेत्र की सीटों की संख्या बढ़ जाती है, तो उसकी जीत की संभावना भी बढ़ जाएगी और तब वह अपने अकेले दम पर सत्ता पर काबिज हो सकेगी। तब भाजपा को किसी के साथ गठबंधन की मजबूरी उसके समक्ष नहीं रह जाएगी। इसके साथ ही उसके लिए कश्मीर से संबंधित अन्य एजेंडे लागू करने में भी सहूलियत हो जाएगी। अगर राज्य में किसी और पार्टी की सरकार बन जाती है, तो उसके लिए ऐसा कुछ भी करना आसान नहीं होगा। इसीलिए भाजपा और केंद्र सरकार की कोशिश सभी बाधाओं को खत्म कर देने की है।

नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी पहले से ही विरोध में

नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी पहले से ही विरोध में

देखने की बात यह है कि क्या यह सब कुछ इतना आसान होगा। अभी परिसीमन की बात सामने आई नहीं कि उसका तीखा विरोध भी शुरू हो गया। राज्य की दो प्रमुख पार्टियों नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने ऐसी किसी भी कोशिश का सख्त विरोध किया है। नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला का कहना है कि बिना प्रदेश की जनता की सहमति के किसी तरह का बदलाव करने की कोशिश का विरोध किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह तभी संभव हो सकेगा जब परिसीमन का काम पूरे देश में किया जाएगा। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने भी विरोध में आवाज उठाई है। उनका आरोप है कि परिसीमन के जरिये भाजपा की कोशिश भावनात्मक विभाजन की है जिसे सफल नहीं होने दिया जाएगा। उनकी पार्टी की ओर से भी कहा गया कि इस तरह के परिसीमन की इजाजत नहीं दी जा सकती। कांग्रेस के बारे में ऐसा लग रहा है कि वह परिसीमन के समर्थन में हैं। लेकिन फिलहाल की स्थिति में वह राज्य में भाजपा की तुलना में उतनी मजबूत नहीं लगती। लेकिन नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के रुख से यह साफ लगरहा है कि परिसीमन का फैसला उतना आसान नहीं होगा और विरोध भारी भी पड़ सकता है।

परिसीमन कराना बीजेपी के लिए नहीं होगा आसान

परिसीमन कराना बीजेपी के लिए नहीं होगा आसान

इस सबके बावजूद भाजपा और सरकार के लिए अपना एजेंडा लागू करने के लिहाज से यह बड़ा मौका है। अभी राज्य में राष्ट्रपति शासन है जिसके चुनाव से पहले तक बरकरार रहने की संभावना है। एक तरह से तय है कि विधानसभा चुनाव राष्ट्रपति शासन के दौरान ही होंगे। केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार है और गृह मंत्री अमित शाह हैं। मतलब सब कुछ पक्ष में है। परिसीमन को लेकर उसे कांग्रेस का साथ भी मिल सकता है क्योंकि वह परिसीमन के पक्ष में बताई जाती है। बताया जाता है कि कांग्रेस का राज्य का नेतृत्व भी चाहता है कि चुनाव से पहले ही परिसीमन का काम पूरा कर लिया जाए। अगर चुनाव की मानी जाए तो जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा अमरनाथ यात्रा के बाद की जा सकती है। यात्रा 15 अगस्त को समाप्त होनी है। बहरहाल, चुनाव जब भी हों, अगर परिसीमन किया जाता है तो विरोधी पार्टियों की बातों से यही लग रहा है कि वे आसानी से इसे होने देना नहीं चाहेंगी क्योंकि इससे उनकी सत्ता तक पहुंच बनाने वाली सीढ़ी के कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ जाएगा। दूसरी तरफ यह भी है कि भाजपा ऐसा जरूर करना चाहेगी। ऐसे में इस आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि भाजपा के लिए यह फैसला लागू करवाना टेढ़ी खीर तो नहीं साबित होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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