बॉलीवुड पर क्यों मंडराया बहिष्कार का साया?
स्वतंत्रता आंदोलन के समय से नाराज जनता बहिष्कार के हथियार का प्रयोग करती आयी है। इसके बारे में स्मरण आता है सन 1900 का शुरूआती दौर, जब बंग-भंग यानि बंगाल के विभाजन की बातें शुरू ही हुई थीं। ये वो दौर था जब स्वदेशी आन्दोलन शुरू ही हुआ था और दिसम्बर 1903 में बंग-भंग की योजना को सार्वजनिक किये जाने के बाद जन आक्रोश भड़क रहा था।

स्वदेशी आन्दोलन की विधिवत शुरुआत का श्रेय 7 अगस्त 1905 को तब के कलकत्ता के टाउन हॉल में हुई जनसभा को जाता है। स्वदेशी आन्दोलन के साथ ही बॉयकाट यानि बहिष्कार का आरम्भ भी हो गया। जब तत्कालीन वाइसराय कर्ज़न ने जुलाई 1905 में विधिवत बंग-भंग की घोषणा की तो पूरे देश की जनता ने स्वदेशी को अपनाने और विदेशी (कपड़ों) की होली जलाने की शुरुआत कर दी। लाल-बाल-पाल की तिकड़ी के अलावा इसे श्री अरबिन्दो घोष का भी भरपूर समर्थन मिला।
इसके दस वर्ष बाद जब गांधीजी भारत आये तो उन्होंने इसी आन्दोलन को और बल दे दिया। रोलेट एक्ट के विरोध में 6 अप्रैल 1919 को "ब्लैक सन्डे" घोषित किया गया। इस दिन मुंबई में चौपाटी पर गांधीजी की एक मीटिंग हुई और उनकी लिखी "हिन्द स्वराज" और "सर्वोदय" जैसी पुस्तकों की बिक्री के जरिये "सविनय अवज्ञा आन्दोलन" के लिए धन जुटाने के प्रयास भी किये गए। योजना थी कि 31 जुलाई 1921 को एलिफेंस्टन मिल कंपाउंड में विदेशी कपड़ों की विशाल होली जला दी जाएगी। संभवतः इस पहली विदेशी कपड़ों की होली में उस दिन लाख से ऊपर महंगी साड़ियाँ, कोट-पतलून, टाई इत्यादि होम हुए।
इस घटना ने तो जैसे पूरे देश में ही विदेशी के विरोध की लहर फूंक दी। कई जगह ऐसे आयोजन हुए। ये आन्दोलन कैसा था और कितने लम्बे समय चलता रहा, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 5 अप्रैल 1929 को भी गांधीजी ने मुंबई में खादी के महत्व पर बल देते हुए एक और भाषण दिया था। उस दिन भी प्लेटफार्म पर फेंकी हुई पचासों विदेशी टोपियाँ नजर आयीं!
करीब सौ-सवा सौ वर्ष पहले के इस बॉयकाट यानि बहिष्कार को संभवतः भारतीय जनता ने फिर से याद कर लिया है। इस बार बहिष्कार के निशाने पर बॉलीवुड है। सीधे-सीधे गोरे साहबों के खिलाफ नहीं, इस बार भूरे साहबों को जन-आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। ये कोई अचानक उपज आया गुस्सा भी नहीं है। बॉलीवुड में बन रही फिल्मों पर अश्लीलता और ऐतिहासिक-पौराणिक घटनाओं को तोड़ मरोड़ के परोसने के आरोप लगते रहे हैं।
2018 में आयी संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' ने नाराज जनता को सड़कों पर ला दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस फिल्म पर ध्यान जाने लगा था। जनता के दवाब में कुछ बदलाव करके फिल्म प्रदर्शित की गई। इस समय तक लोगों का ध्यान फिल्मों के बहिष्कार पर जाने लगा था।
जैसा कि कहावतों में कहते हैं बॉलीवुड ने दीवार पर लिखी इबारतें पढ़ने से साफ इनकार कर दिया। अपनी जिद और घमंड पर फिल्म उद्योग से जुड़े लोग अड़े रहे। फिर दक्षिण भारतीय फिल्में जैसे "बाहुबली" लोगों ने देख ली। इसके बाद तो स्पष्ट मांग ही उठने लगी कि किस किस्म का कंटेंट भारत में चलेगा। बॉलीवुड फिर भी नहीं चेता। हो सकता है कि इसका एक कारण ये भी रहा हो कि करीब-करीब दो वर्षों तक कोविड-19 महामारी के कारण थिएटर बंद रहे और दर्शकों की मंशा को भांपने का बॉलीवुड को कोई अवसर नहीं मिला।
दूसरी तरफ दर्शकों के लिए महामारी के लॉकडाउन ने एक दूसरा ही अवसर खोल दिया। उसे ओटीटी प्लेटफार्म पर विदेशों में बनी अनगिनत फ़िल्में और सीरीज देखने का अवसर मिल गया। ये एक नयी ही दुनिया थी क्योंकि किस्म-किस्म की कहानियाँ, जानदार अभिनय से लेकर ग्राफिक्स के माध्यम से बने अच्छे कंटेंट से लोगों का परिचय हो गया। जिसने "फोर्रेस्ट गम्प" असली देख ली हो, वो उसकी सस्ती सी नकल 'लाल सिंह चड्ढा' पर लुभाया जा सकेगा, ऐसा सोचना भी मूर्खता थी।
फिर वो हुआ जो कई वर्ष पहले दिनकर कह गए थे:
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
महामारी के बाद फिल्में थिएटर तक आने लगीं तो फिर से वही भारत के प्रति घृणा, भाई-भतीजावाद की बू से सनी आई। "अगर हमारे एजेंडे पर नहीं चलोगे तो फिल्म इंडस्ट्री में टिकने नहीं देंगे" जैसी धमकियाँ "कश्मीर फाइल्स" के समय साफ सुनाई दी। दर्शकों ने जब इस बहुत कम बजट पर बनी हिंदी फिल्म को हाथों-हाथ लिया तो फिल्म पर, डायरेक्टर पर लगातार कटाक्ष किये गए और फिर दर्शकों तक को दुर्भावना झेलनी पड़ी। संभवतः इसी ने दर्शकों के सब्र का बांध तोड़ दिया। अब सवाल उठा कि यदि गिने चुने लोग अपने पैसे व पहुँच के जरिये दर्शकों की पसंद की फिल्म को थिएटर में पहुँचने से रोक सकते हैं, तो फिर जो कंटेंट पसंद न हो उसे देखने से मना कर देने से दर्शकों को किसने रोका है?
सोशल मीडिया के दौर में जब मनोरंजन के दर्जन भर साधन उपलब्ध हैं, उस दौर में दर्शकों को कोसना अब बॉलीवुड को महंगा पड़ रहा है। तानाजी और बाजीराव जैसे नायकों पर बनी फिल्मों को जनता कैसे लेती है, ये देखने के बाद भी अगर बॉलीवुड को समझ में नहीं आ रहा कि उससे गलती कहाँ हो रही है, तो उनकी बुद्धि, उनका भाग्य। जनता ने बॉयकाट की सफलता का स्वाद चख लिया है। आगे इसका कितनी बार प्रयोग होगा, ये तो अब बॉलीवुड के माफिया बन कर बैठे लोगों की समझ पर ही निर्भर है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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