Adani and Hindenburg: अडानी पर हमला करके हिंडनबर्ग ने क्या कमाया और हमारे पूंजी बाजार ने क्या गंवाया?

अब सवाल यह है कि क्या हम एक छोटी कंपनी के अपने व्यवसायिक हित के लिए जारी रिपोर्ट पर स्यापा मचाते रहेंगे और सेबी, आरबीआई और आर्थिक मंत्रालयों के काम काज पर सवाल उठाकर अपनी विश्वसनीयता को खुद ही कम करते रहेंगे?

What did Hindenburg gain and what did our capital markets lose by targeting Adani

हिंडनबर्ग रिसर्च कंपनी जहां की है वहां के लोग इसे एक टाइनी (सूक्ष्म) कंपनी मानते हैं और इसके कारनामें पर सवाल खड़ा करते हैं। अमेरिकी मीडिया एजेंसी सीएनएन 2 फरवरी के अपने प्रकाशन में लिखता है- 'व्हाई ए टाइनी अमेरिकन फर्म इज टेकिंग एट एन इंडियन कांग्लोमेरेट।' यानी आखिर क्यों एक सूक्ष्म अमेरिकन ईकाई भारत के विशाल औद्योगिक घराने को निशाना बना रहा है। यह मीडिया आगे खुद ही लिखता है कि इस फर्म का काम किसी बड़ी कंपनी के बारे में कथित खुलासा कर उसके गिरते शेयर के दाम से पैसा कमाना है। उसका उद्देश्य इतना ही है क्योंकि वह एक शॉर्ट सेलर फर्म है।

सवाल है कि क्या हिंडनबर्ग ने उतना कमाया, जितना कि हमारा भारतीय शेयर बाजार ने गंवाया? इसका आंकलन किसी के पास नहीं है। लेकिन डिंडनबर्ग की पहुंच और उसकी गतिविधियों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके निवेशकों ने जो भी कमाया वह अडानी के कुल नुकसान का छंटाक भर भी नहीं होगा। खुद हिंडनबर्ग रिसर्च का कहना है कि उसने केवल अमेरिकन बाजार में उतरे अडानी के बांड और डेरिवेटिव्स का ही शार्ट सेलिंग किया। वह भी अपने गैर भारतीय निवेशकों के लिए। अमेरिकी मीडिया द्वारा पूछे जाने के बाद भी हिंडनबर्ग ने ना तो अपने निवेशकों के बारे में बताया ना अपनी कमाई के बारे में। लेकिन हमें पता है कि हमारे लोगों द्वारा तूफान खड़ा करने के कारण हमारे घर से क्या गया।

यह बात अब आम है कि हिंडनबर्ग के आरोपों के बाद बाजार में जो कोहराम मचा, उससे केवल अडानी समूह का ही पैसा नहीं गया, बल्कि तमाम भारतीय वित्तीय संस्थानों और घरेलू निवेशकों का भी पैसा डूब गया। जो लोग खुश हैं कि अडानी समूह के शेयर 50 से 70 फीसदी गिरने के कारण उनकी संपत्ति में 150 अरब डाॅलर का नुकसान हो गया और वह दुनिया के तीसरे सबसे अमीर से खिसक कर टाॅप 20 की सूची से ही बाहर हो गये, उन्हें संभवतः अंदाजा ही नहीं कि उन्होंने दरअसल मोदी और अडानी के तथाकथित संबंधों को दर्शाने में अपने देश के पूंजी बाजार की होली जला दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अडानी समूह ने एक सप्ताह में लगभग 10 लाख करोड़ गंवा दिए। यह आंकलन 25 जनवरी से लेकर 2 फरवरी के बीच हुए नुकसान का है। कुछ लोग कह सकते हैं कि अडानी की संपत्ति गई तो इसमें देश का क्या नुकसान हुआ? हुआ है। अडानी समूह के साथ साथ देश के वित्तीय संस्थानों, म्यूचुलअल फंड्स और निवेशकों के भी 2 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए। 25 जनवरी के बाद एक सप्ताह के कारोबार में ही अडानी समूह में निवेशित एलआईसी के शेयर की कीमत 38,500 करोड़ रुपये कम हो गई। म्यूचुअल फंड्स के निवेश का वैल्यू 16 हजार करोड़ रुपया कम हो गया और स्टेट बैंक आफ इंडिया एवं अन्य वित्तीय संस्थानों के शेयर के दाम लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये कम हो गए।

क्या इतना बड़ा नुकसान सिर्फ हिंडनबर्ग की रिपोर्ट से हुआ या इस बर्बादी कि स्क्रिप्ट यहां के कुछ लोगों ने ही लिखी? हिंडनबर्ग की विश्वसनीयता, उसकी दक्षता, क्षमता और सबसे बड़ी बात कि उसका हित क्या है यह जाने बिना मोदी विरोध की राजनीति करने वालों ने चाय की प्याली में तूफान खड़ा कर दिया। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी और अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी दोनों गुजरात से आते हैं, इसलिए इसी को आधार बनाकर विरोधियों ने अडानी को मोदी का यार बताना शुरू कर दिया। इस बारे में डेनमार्क का रिसर्च हाउस 'स्टेनो रिसर्च' लिखता है- "हिंडनबर्ग का खुलासा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विपक्ष के हमले का एक सटीक हथियार है। ना सिर्फ नरेंद्र मोदी और अडानी के बीच संबंध स्थापित करने के लिए, बल्कि विकास के मोदी माॅडल पर सवाल खड़ा करने के लिए भी।" यह रिसर्च हाउस 3 फरवरी 2023 की अपनी रिपोर्ट में आगे लिखता है कि "चूंकि अडानी समूह का निवेश पोर्ट्स, रेल, पावर और एयरपोर्ट में है, जो कि मोदी के महात्वाकांक्षी भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास माॅडल के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, ऐसे में हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के आधार पर चलाया जाने वाला राजनीतिक अभियान बहुत खतरनाक है और इसका असर बहुत व्यापक हो सकता है।"

कांग्रेस ने हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट पर जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग तो उठाई ही साथ ही फिर से 'चौकीदार ही चोर है' का नारा वाला अभियान माइक्रो ब्लागिंग साइट्स के जरिए चलाने की कोशिश की। यही नहीं कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने देश भर में एलआईसी और एसबीआई की शाखाओं के बाहर प्रदर्शन किया और यह माहौल बनाने की कोशिश की कि एसबीआई और एलआईसी जैसी बड़ी संस्थाएं अडानी के कारण डूबने वाली हैं। जबकि इन संस्थानों के प्रबंधन ने अपनी ओर से कई बार स्पष्ट किया कि अडानी समूह में उनका निवेश उनकी क्षमता का एक प्रतिशत भी नहीं है और टूटने के बाद भी उनका अडानी के शेयर में निवेश सुरक्षित है। इसके बाद भी विरोधियों ने अपना अभियान बंद नहीं किया। संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। सड़कों पर मार्च किया और टीवी पर आकर देश बेचने का झूठा प्रोपोगंडा किया।

किसी के भी मन में यह बात आ सकती है कि आखिर हिंडनबर्ग ने जो खुलासा किया है उसकी जांच कराने में क्या परेशानी है? इस पर विचार करने से पहले यह तो देखना पड़ेगा कि यह खुलासा करने वाला कौन है, उसकी क्षमता क्या है? शेयर, डिबेंचर या बांड की समीक्षा जैसे काम के लिए उसके पास आवश्यक ढांचा या विशेषज्ञता है क्या? क्या वह एक मान्यताप्राप्त एजेंसी है क्या? सबके जवाब आएंगे नहीं।

अडानी समूह में कथित गडबड़ी करने वाला हिंडनबर्ग रिसर्च केवल पांच साल पहले स्थापित अमेरिका की एक छोटी सी कंपनी है। इसके संस्थापक नाथन एंडर्सन एक सामान्य ग्रेजुएट हैं और शार्ट सेलिंग के व्यवसाय में आने से पहले वह कई और काम कर चुके हैं, जिनमें इजरायल में मेडिकल एंबुलेस के चालक का काम भी शामिल है। 10 से 15 लोगों की टीम है उनकी। वह केवल अमेरिका में काम करते हैं। उन्होंने खुद ही कहा है कि अडानी के बारे में जो भी उन्होंने खुलासा किया है, उससे जुड़ी सभी सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। उन्होंने अपनी ओर से कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं जुटाई है। सिवाय कुछ कंपनियों की तथाकथित गड़बड़ी उजागर करने और उससे मुनाफा कमाने के अलावा कोई विशेषज्ञता उनके पास नहीं है और हिंडनबर्ग रिसर्च शेयर मार्केट या बांड की रेटिंग के लिए किसी भी देश या संस्था से संबद्ध नहीं है।

फिर दुनिया भर में इक्विटी या बांड की समीक्षा या रेटिंग कौन करता है या कर सकता है? तो प्रमुख रूप से केवल तीन ही एजेंसियां है जो किसी कंपनी, अर्थव्यवस्था या देश की वित्तीय हालत पर अपनी रेटिंग या रिपोर्ट जारी करती हैं। वे हैं स्टैंडर्ड एंड पुअर (एस एंड पी), मूडीज एंड फिच समूह। एस एंड पी और मूडीज अमेरिका से ताल्लुक रखती हैं, जबकि फिच ग्रुप न्यूयार्क के साथ लंदन से भी काम करता है। ये तीनों एजेंसियां मिलकर दुनिया के 95 प्रतिशत से अधिक मार्केट और अर्थव्यवस्था की समीक्षा या रेटिंग करती हैं।

एस एंड पी ने 14 फरवरी को अडानी के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है- "अडानी संकट से फिलहाल भारत की वित्तीय स्थिरता को कोई खतरा नहीं है। हां यह हो सकता है कि अब बैंक किसी काॅरपोरेट को आगे लोन देने में अतिरिक्त सावधानी बरतेंगे।" एस एंड पी ने यह भी कहा कि उनकी जानकारी में ऐसा है कि अडानी समूह में किसी भी बैंक समूह का निवेश उनकी क्षमता का एक प्रतिशत से अधिक नहीं है।

इसी तरह फिच ने 3 फरवरी को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शार्ट सेलर की विवादस्पद रिपोर्ट से अडानी की रेटिंग पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यदि काल्पनिक रूप से यह मान भी लें कि इस रिपोर्ट से अडानी समूह के शेयर धराशायी भी हो जाते हैं तो भी भारतीय बैंकों पर कोई असर नहीं आएगा क्योंकि बैंकों का निवेश उनकी क्षमता का बहुत छोटा हिस्सा है जिसका उन पर कोई नकारात्मक असर नहीं आएगा। इसीलिए 10 फरवरी को अडानी समूह की अधिकांश कंपनियों की रेटिंग को निगेटिव से स्टेबल कर दिया।

अब किसी भी समझदार व्सक्ति के लिए यह सवाल है कि क्या हम एक छोटी कंपनी के अपने व्यवसायिक हित के लिए जारी रिपोर्ट पर स्यापा मचाते रहेंगे और सेबी, आरबीआई और आर्थिक मंत्रालयों के काम काज पर सवाल उठाकर अपनी विश्वसनीयता को खुद ही कम करते रहेंगे या फिर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ साथ अपनी सरकार पर भरोसा कर देश की आर्थिक प्रगति की गति को निर्बाध बढ़ाते रहेंगे?

अडानी समूह पर हिंडनबर्ग रिसर्च के कथित खुलासे के बाद हमारे ही लोगों ने जिस तरह से अपने पूंजी बाजार को आग लगाई उस पर एक शायरी बिल्कुल सटीक बैठती है। 'दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग से, इस घर को आग लग गई, घर के चिराग से।'

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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