हाथरस कांड पर हंगामा तो लखीमपुर हत्याकांड पर दलित चिंतकों में चुप्पी क्यों?
लखीमपुर खीरी में दलित परिवार की दो सगी बहनों से गैंगरेप करने के बाद उनकी हत्या कर शव को पेड़ पर लटका दिया गया। इस जघन्यतम कांड ने बदायूं और हाथरस की याद दिला दी, बल्कि कहें तो यह घटना को हाथरस की घटना से भी वीभत्स तरीके से अंजाम दिया गया। लेकिन इस गैंगरेप और हत्याकांड के खिलाफ कथित दलित हितैषियों की ओर से उस तरह की आवाजें नहीं उठी, जैसी हाथरस कांड के समय उठ रही थीं।

अब लखीमपुर पहुंचने की हड़बड़ी ना तो नेशनल मीडिया में दिख रही है, और ना ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा या किसी बड़े कांग्रेसी नेता में। समाजवादी पार्टी ने भी विरोध की रस्म अदायगी के बाद चुप्पी साध ली है। दलितों के नेता चंद्रशेखर रावण या अन्य कोई दलित नेता-चिंतक भी लखीमपुर में दलित समुदाय की युवतियों के साथ हुए हादसे पर तीखी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं, जो उनकी पहचान रही है।
यहां तक हर मुद्दे पर दक्षिणपंथी सरकार को घेरने वाले वामपंथियों में भी सियापा पसरा हुआ है। यह सियापा तब है, जब इन सभी लोगों के विरोध के लिए उपयुक्त राज्य उत्तर प्रदेश में यह घटना हुई है, जहां भाजपा की सरकार है और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। फिर भी पता नहीं क्यों भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर घेरने से परहेज हो रहा है?
ऐसा क्यों है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सर्वाधिक चिंतित रहने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा भी लखीमपुर मामले को लेकर योगी सरकार पर उस अंदाज में हमलावर नहीं हैं, जिस आक्रामकता के साथ उन्होंने हाथरस कांड पर घेरा था। दलितों के लिये जान देने तक को तैयार रहने वाले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर रावण ने राजस्थान के जालौर में हुई घटना पर पीडित परिवार को न्याय दिलाने में जो तेजी दिखाई थी, उस तरह की तेजी दलित बच्चियों के परिवार को न्याय दिलाने में नहीं दिखा रहे हैं। बस एक ट्वीट करके चंद्रशेखर ने यूपी सरकार को वॉकओवर दे दिया है।
जाति धर्म देखकर विरोध करते हैं दलित चिंतक
दरअसल, लखीमपुर मामले में दलित चिंतकों की चुप्पी का मूल कारण है दलित युवतियों से जघन्यता करने वालों का जाति और धर्म। अपराधी ऐसे समुदाय से आते हैं जिनके साथ इनका मेलजोल है इसलिए विरोध में संभवत: राजनीतिक भाईचारा आड़े आ गया है। लखीमपुर के पांच आरोपी मुस्लिम और एक दलित है, जबकि हाथरस में आरोपी उच्च जाति के थे।
लखीमपुर में दो दलित युवतियों से गैंगरेप और निर्मम हत्या के बावजूद कांग्रेस, नेशनल मीडिया के एक वर्ग, दलित चिंतकों एवं वामपंथियों की आत्मा नहीं जगी है तो इसके पीछे कारण है कि आरोपी में कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव या कुर्मी नहीं है। मुस्लिम अपराधियों का विरोध इनकी राजनीति और राजनीतिक अस्मिता को सूट नहीं करता है।
दलितों पर मुस्लिमों के हमले की देशभर में कई घटनाएं हैं, लेकिन यह नेशनल मीडिया की सुर्खियां कभी कभी ही बनती हैं जबकि आरोपियों के सवर्ण या पिछड़ा होने की दशा में छोटी से छोटी घटनाएं भी जातीय और वामपंथी चिंतकों द्वारा राष्ट्रीय मुद्दा बना दी जाती है।
रोहित वेमुला की आत्महत्या अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया, लेकिन बिहार के कटिहार में अब्दुल द्वारा दलित बज्जन दास और उसकी पत्नी को घर में फूंककर जिंदा जलाने की सुर्खियां जिले के भीतर ही दब कर रह गईं।
दलित चेतना जगाने के नाम हिन्दू विरोध
दरअसल जय भीम जय मीम के राजनीतिक नारे की आड़ में हिन्दुओं को विभाजित करने की साजिश लंबे समय से चल रही है। रिपोर्ट बताती हैं कि इस मद में इस्लामिक देशों से हवाला एवं एनजीओ के माध्यमों से बड़ी फंडिंग हो रही है। हिंदू धर्म की कमजोरियों और जातीय विभाजन का लाभ उठाकर ईसाई मिशनरी और इस्लामी ताकतें सुनियोजित ढंग से इसे कमजोर करने तथा तोड़ने में लगी हुई हैं।
अगर आप तमिलनाडु के इरोड वेंकट रामास्वामी उर्फ पेरियार के हिंदू धर्म विरोध पर नजर डालें तो इसकी झलक मिलती है। भारत विभाजन के पैरोकार मोहम्मद अली जिन्ना से सहानुभूति रखने वाले पेरियार ने भी उनकी तरह ही भारत में अगल देश द्रविडनाडु की मांग की थी।
हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ सुधार आंदोलन चलाने की बजाय पेरियार ने हिंदू देवी देवताओं, हिंदी का जमकर विरोध किया। दलित चेतना के नाम पर सनातन के धार्मिक ग्रंथों को जलाकर हिंदू धर्म में मौजूद सामाजिक विखंडन की खाई को और बढ़ाने का काम पेरियार ने किया, जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना जैसे विभाजनकारी नेता का परोक्ष रूप से सहयोग रहा।
दलित जातियों की भावनाओं को भड़काकर हिंदुओं को तोड़ने की साजिश कई दशकों से चल रही है। ईसाई मिशनरीज के बाद अब इस्लामिक संस्थानों में आने वाले फंड के जरिये इसे अंजाम दिया जा रहा है। पीएफआई जैसे संदिग्ध संगठनों से वित्त पोषित होने वाले दलित नेता और चिंतक उन्हीं मामलों में सक्रिय होते हैं, जिनमें दलितों के खिलाफ अत्याचार करने के आरोपी हिंदू या सवर्ण जातियों से ताल्लुक रखते हैं। इस सक्रियता से हिंदुओं में जातीय भेदभाव एवं आपसी वैमनस्यता को बढ़ाने में मदद मिलती है, जिससे हिंदुओं को कमजोर करने में जुटी ताकतों को लाभ मिलता है।
दलित नेता ही नहीं, तमाम गैर सरकारी संस्थाएं एवं संगठन भी विदेशी फंडिंग की सहायता से इस काम को अंजाम देने में जुटे रहते हैं। इन्हीं दलित नेताओं, एनजीओ एवं राजनीतिक संगठनों का मुंह उन मामलों में बंद हो जाता है, जिसमें दलितों के खिलाफ अपराध करने वाले मुसलमान होते हैं। देश भर में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे, जिसमें दलितों के खिलाफ वृहद पैमाने पर हिंसा हुई, लेकिन आरोपियों के मुसलमान होने के चलते दलित चिंतकों के लिए चिंता की बात नहीं बन पातीं।
नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में दलित नेता चंद्रशेखर रावण पीएफआई के साथ मिलकर भारत सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहे थे जिसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्सक हिन्दुओं को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। क्या चंद्रशेखर नहीं जानते थे कि पाकिस्तान में पीड़ित हिन्दू किस समुदाय से हैं? वो भी तो दलित ही हैं। फिर भला भारत का एक दलित पाकिस्तान से आनेवाले दलितों के खिलाफ ही आंदोलन में मुस्लिम संगठनों का साथ क्यों दे रहा था?
चंद्रशेखर रावण पर आरोप है कि पीएफआई से उसके आर्थिक ताल्लुकात हैं। ऐसे आरोपों को तब बल मिलता है जब चंद्रशेखर रावण दलितों पर मुस्लिम समुदाय के आरोपियों द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों पर चुप्पी साध लेते हैं। हाथरस में हुए गैंगरेप कांड में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद भी चंद्रशेखर रावण की सक्रियता दिखी, सरकार का विरोध दिखा, लेकिन लखीमपुर खीरी मामले में वह आक्रमकता नदारद है।
सेकुलर पाखंड का शिकार हुए दलित
दरअसल, दलितों का दर्द अब ऐसे सेकुलर पाखंड का शिकार हो गया है, जिसमें संवेदनहीनता चरम पर है। भारत के कथित धर्मनिरपेक्ष दलित समूहों का पाखंड और संवेदनाएं तभी जागृत होती हैं, जब आरोपी सवर्ण जाति का हिंदू हो। जिस रोहित वेमुला की आत्महत्या को दलित अस्मिता का मुद्दा बनाया गया, क्या वो सचमुच वैसा था, जैसा दिखाने-बताने की कोशिश की गई थी?
दरअसल, ईसाई मिशनरी और इस्लामिक संस्थाएं आजादी के बाद से ही भारत में धर्म परिवर्तन का एजेंडा चला रही हैं। जातियों में बंटे हिंदू इनके निशाने पर हैं, क्योंकि इस धर्म में व्याप्त ऊंच-नीच जैसी बुराइयां इन संस्थाओं को खाद पानी मुहैया कराती हैं। भेदभाव के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करना इनके लिये आसान होता है।
इन संस्थाओं का सबसे मुफीद शिकार उपेक्षित रहने वाली दलित जातियां होती हैं। आर्थिक मदद के जरिए ये संस्थाएं धर्मांतरण तो कराती ही हैं, कुछ तेजतर्रार लोगों को धन साधन देकर दलितों का नेता बनाया जाता है तथा सवर्ण एवं अन्य जातियों के खिलाफ बरगलाकर धार्मिक विद्वेष पैदा कर उन्हें हिंदू धर्म के खिलाफ किया जाता है। ऐसे नेताओं को बताया जाता है कि किस मामले में बोलना है और कहां चुप रहना है। लखीमपुर खीरी मामले में भी वो चुप रह गये तो उनका कोई न कोई आर्थिक स्वार्थ ही होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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