ताकत के नशे में चूर चीन चेत जाए तो एशिया युद्ध और अशांति से दूर रहेगा
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी की ताइपे यात्रा भले ही बहुत छोटी रही, लेकिन उसकी तासीर कम से कम पूर्वी एशिया में बहुत तीखी रही। चीन की तरफ से उनकी यात्रा पर विवाद उठना स्वाभाविक ही था। इसकी वजह यह है कि माओत्से तुंग की अगुआई में हुई क्रांति के बाद से ही चीन ताइपे को अपना अंग मानता रहा है, जबकि दुनिया के कई देशों की नजर में सवा दो करोड़ से कुछ अधिक की आबादी वाले इस देश को स्वाधीन राष्ट्र के तौर पर मान्यता हासिल है।

यह बात और है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से उसे ना तो सदस्य देश के रूप में मान्यता है और ना ही उसके सदस्य 193 राष्ट्रों में से ज्यादातर के साथ उसके कूटनीतिक संबंध हैं। ताइपे के साथ दुनिया के सिर्फ 22 देशों के ही कूटनीतिक रिश्ते हैं, जबकि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संबंध 170 देशों के साथ हैं।
पेलोसी की ताइपे यात्रा पर चीन ने आक्रामक विरोध जताया, यह बात और है कि उसको साथ सिर्फ रूस से ही मिला। अमेरिका के खेमे वाले देश जहां अमेरिका के साथ रहे, वहीं ज्यादातर देशों ने इस मसले पर तटस्थ रूख अख्तियार किए रखा। चीन के आक्रामक रूख को दुनिया में खास समर्थन नहीं मिला। वैसे भी अब दुनिया शांति चाहती है। बेशक मध्य एशिया के इलाके साल 1990 से ही आपसी और जातीय लड़ाई में जूझ रहे हैं, लेकिन वहां लड़ाई का कोई हल नहीं निकल पाया है। यह भी कह सकते हैं कि मध्य पूर्व के देशों की लड़ाई कहीं भी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाई है।
फरवरी 2022 से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी साबित किया है कि बदली विश्व व्यवस्था में जरूरी नहीं कि ताकतवर देश जल्द ही किसी कमजोर देश को कब्जे में कर लें। 23 फरवरी 2022 को रूस ने यूक्रेन पर जब हमला किया था तो दुनिया ने माना था कि रूस की अजेय ताकत के आगे यूक्रेन जल्द ही समर्पण करने को मजबूर हो जाएगा। लेकिन पश्चिमी और हथियार आपूर्तिकर्ता देशों ने पर्दे के पीछे से यूक्रेन की सहायता बढ़ाई है, उससे आठ महीने बाद भी यूक्रेन मैदान में ना सिर्फ डटा हुआ है, बल्कि कई मोर्चों पर उसने दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से शुमार रूसी सेना का जोरदार मुकाबला किया है।
स्पष्ट है कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने एक बार फिर साबित किया है कि युद्ध से बरबादी ही आती है और उसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं आता। इसलिए बेहतर है कि राष्ट्रों के बीच के बिगड़े रिश्तों को सुधारने के लिए बातचीत का मध्यमार्गी रास्ता ही अपनाया जाय।
अमेरिकी प्रोटोकाल के हिसाब से तीसरी बड़ी ताकत का ताइपे जाना चीन के लिए गुस्से की वजह हो सकता है, लेकिन ऐसा लगता है कि इस मसले को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी गई। भारत में पूर्वी एशिया के जानकार श्रीकांत कोडापल्ली का मानना है कि चीन को इस मामले को ज्यादा तूल देना नहीं चाहिए था, बल्कि उसे संतुलित तरीके से अनदेखा करना चाहिए। चूंकि मामले को तूल दिया गया, और पेलोसी भी नहीं मानीं, इसलिए इस पर विवाद बढ़ गया। यह बात और है कि पेलोसी के ताइपे से निकलकर दक्षिण कोरिया जाने के बाद इलाके में शांति है।
वैसे भी अमेरिका पर दबाव है कि वह सुस्त पड़ी अपनी अर्थव्यस्था में तेजी लाए। वहां महंगाई दर आठ फीसद से कुछ ज्यादा हो गई। इस बीच चीन की विकास दर भी सिर्फ 3.3 प्रतिशत है। जाहिर है कि दोनों देशों के सामने इन दिनों आर्थिक चुनौतियां हैं। अमेरिका की ख्याति चूंकि हथियार के कारोबारी देश के रूप में भी है, इसलिए माना जा रहा है कि अमेरिका अपनी मंदी और महंगाई को काबू करने के लिए अपने हथियार बाजार को बढ़ाने की कोशिश जरूर करेगा। पेलोसी की ताइपे यात्रा का एक मकसद यह भी हो सकता है। पेलोसी की यात्रा के बाद चीन की ओर से उपजे गुस्से से पूरा उपमहाद्वीप सशंकित हो उठा था। उसे युद्ध का खतरा सामने दिख रहा था। बहरहाल अभी हालात शांत हैं।
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लेकिन चीन चेतता हुआ नहीं दिख रहा, वह लगातार उकसावे की कार्रवाई कर रहा है। उसने जहां ताइवान की तीन तरफ से घेराबंदी कर रखी है, वहीं उसने कई मिसाइलें दागकर जापान को भी उत्तेजित कर रखा है। चार अगस्त को उसकी दागी पांच मिसाइलें जापानी सीमा में गिरी हैं। ऐसे में जापान का भी उत्तेजित होना स्वाभाविक है। वैसे एक बात और है कि नैंसी पेलोसी की यात्रा के जरिए अमेरिका ने चीन को यह संदेश दे दिया है कि अब उसकी दादागिरी नहीं चलेगी।
चीन के खिलाफ पहले से ही अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत ने क्वाड नामक संगठन बनाकर आपसी रणनीतिक सहयोग करना शुरू कर दिया है। इसलिए चीन को अब चेत जाना चाहिए। चूंकि उसके पास सैनिक और तकनीकी ताकत ज्यादा है, इसलिए वह इस ताकत के नशे में ही फिलहाल चूर दिख रहा है। हालांकि उसे पता होना चाहे कि जब नशा उतरता है तो नशेबाज की स्थिति बेहतर नहीं रह जाती।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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