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स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और तिरंगे का सम्मान

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में बीते पचहत्तर वर्ष को देखें तो देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक उन्नति हुई है। पीढ़ियों में बदलाव के क्रम में सब बदलता जा रहा है। किन्तु जो नहीं बदला है वह है सेक्युलरवाद के ठेकेदार बने बैठे राजनीतिक दलों की सोच, जो आज भी स्वाधीनता संग्राम आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और तिरंगे के सम्मान पर सवाल उठाते रहते हैं।

Role of RSS in Freedom struggle and Tiranga honour

कई दशकों से कांग्रेसी और वामपंथी यह आक्षेप लगाते रहे हैं कि संघ ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। यह आरोप भी मढ़ा जाता रहा है कि संघ ने कभी तिरंगे का सम्मान नहीं किया और 52 वर्षों तक संघ कार्यालयों पर तिरंगा नहीं फहराया गया। आरोप लगाने का सिलसिला प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी, और 15 अगस्त के आसपास प्रारम्भ होता है और भाजपा के उभार के साथ तेज होता गया है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर घर तिरंगा अभियान की शुरुआत करते हुए देशवासियों से अपील की थी कि वे अपने घरों, प्रतिष्ठानों, कार्यालयों आदि पर शान से तिरंगा लहरायें। यहाँ तक कि अपने-अपने सोशल मीडिया की छवियों के स्थान पर तिरंगा लगाकर उसके प्रति सम्मान दिखाने की अपील की थी।

उनकी इस अपील को व्यापक जनसमर्थन भी प्राप्त हुआ किन्तु इसने विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा भी दे दिया। दरअसल, संघ में सोशल मीडिया अकाउंट में तिरंगे को स्थान न मिलना उन्हें इतना नागवार गुजरा कि राहुल गांधी ने तो सीधे तौर पर इसे संघ द्वारा तिरंगे का अपमान बता दिया।

स्थिति यह हो गई है कि संघ और तिरंगे से जुड़ा मामला अब सड़कों पर बहस के केंद्र में आ गया है। ऐसे में क्या यह माना जाये कि संघ ने कभी तिरंगे का सम्मान नहीं किया? क्या संघ की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी?
इन प्रश्नों के उत्तर हेतु हमें संघ संस्थपाक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन की थाह लेना होगी। जन्मजात राष्ट्रभक्त डॉक्टर हेडगेवार में अंग्रेजों की गुलामी के प्रति कितना क्षोभ था, इसका प्रणाम तो उन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही दे दिया था जब 1897 में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त स्कूल में बांटी गई मिठाई को न खाकर उन्होंने उसे कूड़े में फेंक दिया था।

1907 में 'वंदे मातरम्' के सार्वजनिक उद्घोष पर पाबंदी का अन्यायपूर्ण आदेश घोषित हुआ जिसके विरोध में बाल केशव ने अपने नील सिटी विद्यालय में सरकारी निरीक्षक के सामने कक्षा के सभी विद्यार्थियों द्वारा 'वन्दे मातरम्' उद्घोष करवाकर विद्यालय के प्रशासन का रोष मोल लिया और उसकी सजा के नाते उनका विद्यालय से निष्कासन भी हुआ।
नागपुर से मुंबई पास होने के बाद भी उन्होंने डॉक्टरी पढ़ने के लिए क्रांतिकारियों का केंद्र होने के नाते कलकत्ता को पसंद किया जहाँ वह क्रांतिकारियों की शीर्षस्थ संस्था 'अनुशीलन समिति' के विश्वासपात्र सदस्य बने।

अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध करने के चलते उन पर राजद्रोह का मुक़दमा चला और 19 अगस्त, 1921 से 11 जुलाई, 1922 तक वे कारावास में रहे। 12 जुलाई को जब वे जेल से छूटे तो उनके सम्मान समारोह में पंडित मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, डॉ. अंसारी, विट्ठल भाई पटेल आदि उपस्थित थे। 1930 में गाँधीजी के आह्वान पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन 6 अप्रैल को दांडी (गुजरात) में नमक सत्याग्रह के नाम से शुरू हुआ। संघ ने इस आंदोलन को बिना शर्त समर्थन दिया।

डॉक्टर हेडगेवार स्वयं व्यक्तिगत तौर पर सत्याग्रह में सम्मिलित हुये तथा संघ कार्य अविरत चले इस हेतु उन्होंने सरसंघचालक पद का दायित्व अपने पुराने मित्र डॉक्टर परांजपे को सौंप कर बाबासाहब आप्टे और बापू राव भेदी को शाखाओं के प्रवास की जिम्मेदारी दी। महाराष्ट्र के यवतमाल में 10,000 लोगों का हुजूम उनके नेतृत्व में इस सत्याग्रह से जुड़ा।

उन्हीं दिनों ब्रिटिश शासन के विरूद्ध उनके प्रतिरोध को चिह्नित करने के लिए 9 अक्टूबर, 1930 को जंगल पर आक्रमण करने और सरकारी चंदन के बगीचे से घास काटने की योजना बनाई गई। इसे "जंगल सत्याग्रह" के नाम से जाना जाता है। इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने के चलते डॉक्टर हेडगेवार को 9 महीने का सश्रम कारावास हुआ। वहां से छूटने के पश्चात् सरसंघचालक का दायित्व पुन: स्वीकार कर वे फिर संघ कार्य में जुट गए।

8 अगस्त, 1942 को गाँधीजी ने 'अंग्रेजों, भारत छोड़ो' की घोषणा की। चिमूर में आंदोलन का नेतृत्व संघ अधिकारी दादा नाईक, बाबूराव बेगडे, अण्णाजी सिरास आदि ने किया। इस आन्दोलन में अंग्रेजों की गोली से एकमात्र मृत्यु बालाजी रायपुरकर की हुई जो संघ के स्वयंसेवक थे। इस संघर्ष में 125 सत्याग्रहियों पर मुकदमा चला और असंख्य स्वयंसेवकों को कारावास में रखा गया।

भारत भर में चले इस आन्दोलन में स्थान-स्थान पर संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता, प्रचारक स्वप्रेरणा से अपना योगदान दे रहे थे। राजस्थान में प्रचारक जयदेवजी पाठक, जो बाद में विद्या भारती में सक्रिय रहे, आर्वी (विदर्भ) में डॉक्टर अण्णासाहब देशपांडे, जशपुर (छत्तीसगढ़) में रमाकांत केशव (बालासाहब) देशपांडे, जिन्होंने बाद में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की, दिल्ली में श्री वसंतराव ओक जो बाद में दिल्ली के प्रान्त प्रचारक रहे, बिहार (पटना) में प्रसिद्ध वकील कृष्ण वल्लभप्रसाद नारायण सिंह (बबुआजी) जो बाद में बिहार के संघचालक रहे, दिल्ली में ही श्री चंद्रकांत भारद्वाज, जिनके पैर में गोली धंसी और जिसे निकाला नहीं जा सका, पूर्वी उत्तर प्रदेश में माधवराव जी जो बाद में प्रान्त प्रचारक बने, उज्जैन (मध्य प्रदेश) में दत्तात्रेय गंगाधर (भैयाजी) कस्तूरे जो बाद में संघ प्रचारक हुए; जैसे असंख्य संघ स्वयंसेवकों में स्वाधीनता संग्राम में अपनी भूमिका का निर्वहन किया जिसे षड्यंत्रपूर्वक व एक ही परिवार के त्याग को सर्वोच्च ठहराने की जिद ने बिसरा दिया।

अब चूँकि उपरोक्त सभी गतिविधियाँ तिरंगे की आन-बान-शान के लिए ही हुई थीं अतः यह कहना कि संघ ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया अथवा तिरंगे का सम्मान नहीं किया, ओछी मानसिकता का प्रतीक है। दिल्ली के विज्ञान भवन में सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने त्रिदिवसीय व्याख्यानमाला ने तिरंगे पर उठते सवाल का उत्तर देते हुये एक घटना बताई थी। उन्होंने बता था कि फैजपुर के कांग्रेस अधिवेशन में 80 फीट ऊँचे ध्वज स्तम्भ पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा झंडा फहराया। जब उन्होंने झंडा फहराया तो वह बीच में अटक गया।

ऊंचे पोल पर चढ़कर उसे सुलझाने का साहस किसी का नहीं था। तभी एक तरुण भीड़ में से दौड़ा और ध्वज स्तम्भ पर चढ़कर उसने रस्सियों की गुत्थी सुलझाई तथा ध्वज को ऊपर पहुंचाकर नीचे आ गया। पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा।
वहाँ उपस्थित जनसमूह ने तरुण को अपने कंधे पर उठा लिया और नेहरू जी के पास ले गये। नेहरू जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि तुम शाम को अधिवेशन में आओ, तुम्हारा अभिनंदन करेंगे। तभी कांग्रेस से कुछ नेता आए और उन्होंने नेहरू जी से कहा कि इसे मत बुलाइये, यह शाखा में जाता है। और नेहरू जी ने तरुण को नहीं बुलाया। यह तरुण जलगांव में फैजपुर में रहने वाले श्री किशन सिंह राजपूत थे।

डॉक्टर हेडगेवार जी को जब इस घटना का पता चला तो उन्होंने उस स्वयंसेवक को एक छोटा-सा चांदी का लोटा पुरस्कार रूप में भेंट देकर उसका अभिनंदन किया। 31 दिसम्बर, 1929 की अर्द्धरात्रि को रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया गया। इसके बाद 26 जनवरी, 1930 को पूरे राष्ट्र में जगह-जगह सभाओं का आयोजन किया गया जिनमें सभी ने सामूहिक रूप से स्वतंत्रता प्राप्त करने की शपथ ली। इस अवसर पर डॉक्टर हेडगेवार ने सभी स्वयंसेवकों से अपील की कि कांग्रेस के पूर्ण स्वराज के संकल्प हेतु तन-मन से जुट जाएँ और पूरे देश में लगने वाली शाखाओं में शान से तिरंगा फहरायें। अब इन सबके बाद भी यदि कोई कहे कि संघ तिरंगे का सम्मान नहीं करता तो वह निश्चित रूप से कुंठा का शिकार हो चुका है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने तिरंगा यात्रा का आयोजन किया था जिसमें भाग लेने से कांग्रेस ने मना कर दिया था। कांग्रेस का आरोप था कि सरकार की आड़ में एक पार्टी ने इस कार्यक्रम को हाईजैक कर लिया है जबकि वास्तविकता यह है ही नहीं। कांग्रेस यह बर्दाश्त ही नहीं कर सकती कि तिरंगा, स्वाधीनता संग्राम, महात्मा गाँधी जैसे प्रतीकों पर कोई सम्मान दिखाये। दूसरों का यह सम्मान कांग्रेस को नागवार गुजरता है क्योंकि उसकी सामंती सोच इन सभी प्रतीकों पर अपना सर्वाधिकार सुरक्षित रखना चाहती है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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