Tripura Election: क्या टिपरा मोथा भाजपा का खेल बिगाड़ पाएगी या खुद बिखर जायेगी?
प्रद्योत देब बर्मन ने BJP को हराने का लक्ष्य साध कर 60 में से 42 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार खड़े किए। इसलिए BJP ने प्रचारित भी किया कि भाजपा को हराने के लिए टिपरा मोथा ने माकपा और कांग्रेस से गुप्त समझौता किया हुआ है।

Tripura Election: त्रिपुरा में 86.10 प्रतिशत वोटिंग होना आश्चर्यजनक नहीं है| पिछले विधानसभा चुनाव में भी 89.38 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, और उससे पहले 2013 में तो 91.82 प्रतिशत वोटिंग हुई थी| पिछली बार वोटिंग में ढाई प्रतिशत गिरावट आई थी, और माकपा की सरकार उड़ गई थी| इस बार वोटिंग पिछली बार से भी कम हुई है, तो यह सरकार के प्रति बेरुखी का संकेत है| खासकर इसलिए क्योंकि पिछली बार जीती गई भाजपा की 36 में से 10 और सहयोगी आईपीएफटी की सभी 8 सीटें आरक्षित आदिवासी सीटें थीं| अलग आदिवासी राज्य की मांग को लेकर बनी नई पार्टी टिपरा मोथा के सभी 20 आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने से मुकाबला बहुत कड़ा हो गया है|

ग्रेटर टिपरालैंड की मांग को लेकर टिपरा मोथा पार्टी का गठन राजवंश के वारिस प्रद्योत देब बर्मन ने किया है| भाजपा टिपरा मोथा पार्टी से चुनाव गठबंधन करना चाहती थी, अमित शाह की प्रद्योत देब बर्मन से बातचीत भी हुई थी| लेकिन अमित शाह ग्रेटर टिपरालैंड की मांग से सहमत नहीं हुए, और बातचीत टूट गई| हालांकि खुद प्रद्योत ने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन भाजपा को हराने का लक्ष्य साध कर राज्य की 60 में से 42 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार खड़े किए| इसलिए भाजपा ने प्रचारित भी किया कि भाजपा को हराने के लिए टिपरा मोथा ने माकपा और कांग्रेस से गुप्त समझौता किया हुआ है|
भाजपा के इस प्रचार का असर यह हुआ कि चुनाव के दौरान प्रद्योत देब बर्मन के कई साथी टिपरा मोथा पार्टी छोड़ भाजपा के साथ चले गए| बीच चुनाव में लगे इस झटके से प्रद्योत देब बर्मन का दिल टूट गया और उन्होंने आख़िरी चुनावी सभा में राजनीति छोड़ने का एलान कर दिया| यह एक तरह से आख़िरी दिन हथियार डालना था| चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि उनके अंतिम भाषण में जिस तरह निराशा झलकी, उससे उनके ज्यादा सीटें जीतने का चांस कमजोर हो गया है| हालांकि 16 फरवरी को मतदान के दौरान उन्होंने दावा किया कि टिपरा मोथा 31 सीटें जीत कर सरकार बना रही है|
विश्लेषकों की भविष्यवाणी को सच करते हुए टिपरा मोथा ज्यादा सीटें भले ही न जीते, उसको मिले वोट भाजपा के लिए घातक होंगे क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल माकपा और कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं| पिछले चुनाव में माकपा को 42.22 प्रतिशत और कांग्रेस को 7.38 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 43.59 प्रतिशत वोट मिले थे| माकपा और कांग्रेस अगर अपने पिछले वोटबैंक को बनाए रखने में सफल रहती हैं, और टिपरा मोथा भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाती है, तो भाजपा के लिए जीतना मुश्किल होगा|
प्रद्योत देब बर्मन के पिता किरीट देब बर्मन तीन बार कांग्रेस के सांसद रहे थे, और उनकी मां बिहू कुमारी भी सांसद और विधायक रहीं| प्रद्योत खुद 2019 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, जब उन्होंने जम्मू कश्मीर में 370 हटाने पर कांग्रेस के स्टैंड के खिलाफ कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी| सवाल यह है कि 370 पर भाजपा का समर्थन करने वाले शाही वंशज ने भाजपा को हराने के लिए राजवंश की प्रतिष्ठा को दांव पर क्यों लगा दिया| और आखिर में निराशा में यह क्यों कह दिया कि विधानसभा चुनाव के बाद वह राजनीति छोड़ देंगे और कभी भी 'बुबागरा' के रूप में वोट नहीं मांगेंगे| त्रिपुरा के आदिवासी अपने राजा को 'बुबागरा' बुलाते हैं|
प्रद्योत देब बर्मन ने आदिवासियों के मन में ग्रेटर टिपरालैंड की इच्छा जागृत कर दी थी| लेकिन प्रद्योत के अंतिम चुनावी भाषण ने टिपरा मोथा के भीतर भ्रम और उनके प्रशंसकों में निराशा पैदा कर दी| 'ग्रेटर टिपरालैंड' का मतलब त्रिपुरा का विभाजन नहीं है, जैसा कि उनके खिलाफ प्रचार किया गया, बल्कि 'ग्रेटर टिपरालैंड' का मतलब एक ऐसा राज्य स्थापित करना है, जिसमें त्रिपुरा, असम और मिजोरम के आदिवासी इलाकों के साथ-साथ बांग्लादेश के चटगांव हिल एरिया का हिस्सा भी शामिल हों|
भाजपा ने अपने प्रचार में इस मुद्दे को शामिल किया कि ग्रेटर टिपरालैंड व्यवहारिक ही नहीं है| कांग्रेस और माकपा ने भी ग्रेटर टिपरालैंड की मांग का समर्थन नहीं किया, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान प्रद्योत देब बर्मन ने भाजपा को ही निशाने पर लिया| भाजपा ने टिपरा मोथा पर आरोप लगाया कि वह भाजपा और उसके सहयोगी आईपीएफटी से आदिवासियों को दूर करने के लिए कम्युनिस्टों के इशारे पर काम कर रहे हैं|
माकपा कांग्रेस गठबंधन उम्मीदवारों के सामने टिपरा मोथा के कमजोर उम्मीदवारों ने भाजपा के आरोप की पुष्टि की| माकपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार जितेंद्र चौधरी के इस दावे ने भी भाजपा के आरोप की पुष्टि की, जिसमें उन्होंने कहा कि माकपा की टिपरा मोथा के साथ अनौपचारिक समझ थी और दोनों के बीच चुनाव के बाद समझौता होने वाला है| प्रद्योत ने चौधरी के इस दावे का खंडन करने की जहमत भी नहीं उठाई| उन्होंने त्रिपुरा में आदिवासियों की दयनीय स्थिति के लिए कांग्रेस और माकपा को जिम्मेदार भी नहीं ठहराया|
इन सब बातों ने टिपरा मोथा नेताओं के दिमाग में भी आशंकाएं पैदा कर दी कि वह असल में माकपा के लिए ही काम कर रहे हैं| इसका असर हुआ, और प्रद्योत देब बर्मन के अनेक साथियों ने 13 फरवरी को प्रधानमंत्री के साथ मुलाक़ात की| इस मुलाक़ात के दौरान मोदी ने राज्य में आदिवासी क्षेत्रों के अधिक विकास का वादा किया और कहा कि चुनाव के बाद जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष रूप से कुछ योजनाओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें लागू किया जाएगा|
बैठक के नतीजे से खुश मोदी ने इसके बारे में ट्वीट भी किया| मोदी की आदिवासियों के साथ हुई बैठक का भाजपा ने 13 फरवरी को धुंआधार प्रचार किया, इसी ने प्रद्योत का हौसला तोड़ दिया। अगले दिन 14 फरवरी को अपनी आख़िरी चुनावी रैली में उन्होंने अपने साथियों के साथ निराशा जाहिर करते हुए चुनाव बाद राजनीति छोड़ने का एलान कर दिया| इसका उलटा असर हुआ और टिपरा मोथा में संदेह पैदा हो गया कि क्या चुनाव बाद वह टिपरा मोथा को आगे चलाएंगे भी या नहीं|
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स्वाभाविक है इसका 16 फरवरी की वोटिंग पर असर होना था, इसलिए 15 फरवरी को उन्हें आनन-फानन में स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा| जिसमें उन्होंने कहा कि वह राजनीति छोड़ देंगे, लेकिन टिपरा मोथा कभी नहीं छोड़ेंगे| हालांकि यह भ्रम पैदा करने की स्थिति है कि राजनीति छोड़कर वह राजनीतिक दल में सक्रिय कैसे रहेंगे| इस आख़िरी तीन दिनों की घटनाओं ने चुनावों पर असर डाला है, जिसने भाजपा की संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा दिया है| इससे पहले शाही वंशज की जनसभाओं में नरेंद्र मोदी की सभाओं से भी ज्यादा भीड़ आ रही थी| विश्लेषकों का कहना है कि टिपरा मोथा दस से बारह सीटें जीत सकता है, अगर ऐसा हुआ तो विधानसभा त्रिशंकु होने के आसार पैदा हो सकते हैं|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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