Highway Toll: नेशनल हाईवे पर सवारी, जेब पर पड़ रही भारी

Highway Toll: केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने एक बार फिर कहा है कि वो देशभर में हाईवे पर बने हुए टोल प्लाजा को खत्म करने जा रहे हैं। यह कब तक लागू होगा यह तो समय बतायेगा लेकिन नेशनल हाइवे पर जिस तरह से टोल रेट बढ़ता जा रहा है वह सामान्य नागरिकों की जेब पर भारी पड़ रहा है।

पहले भी नितिन गड़करी कई बार संसद के भीतर और बाहर इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि वो देशभर से टोलप्लाजा खत्म करना चाहते हैं। इसकी जगह देशभर के नेशनल हाईवे पर सेटेलाइट बेस्ड टोल सिस्टम लागू करेंगे। गड़करी के मुताबिक हाईवे पर चलनेवालों को इससे फायदा यह होगा कि वो जितने किलोमीटर चलेंगे उतने का ही पैसा उन्हें देना होगा।

toll rates

अभी हाईवे और एक्सप्रेसवे पर जो टोल सिस्टम काम करता है उसमें एक निश्चित अंतराल के बाद टोल प्लाजा बने होते हैं। जैसे ही आप वहां पहुंचते हैं, वहां लगे स्कैनर आपकी गाड़ी में लगे फास्ट टैग को रीड करते हैं और टोल कट जाता है। फास्ट टैग की व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लागू करने का श्रेय भी नितिन गड़करी को ही जाता है, जिन्होंने 16 फरवरी 2021 से देशभर के टोलप्लाजा पर फास्ट टैग अनिवार्य कर दिया था।

अब अगर किसी गाड़ी में फास्ट टैग नहीं लगा है या फिर उसका फास्ट टैग वाउचर रिचार्ज नहीं है तो उसे दोहरी रकम अदा करनी पड़ती है। अगर किसी टोल पर फास्ट टैग से 125 रूपये कटने हैं तो फास्ट टैग नहीं होने पर 250 रूपये वसूल किया जाता है। यह नियम इसलिए बनाया गया ताकि सभी गाड़ियों में फास्ट टैग लग जाए और टोल प्लाजा पर लगनेवाली भीड़ कम हो जाए।

इस नियम का असर भी हुआ। सड़क परिवहन मंत्रालय का दावा है कि हाईवे टोल पर औसत वेटिंग टाइम 8 मिनट से घटकर 45 सेकेण्ड हो गया। इसके कारण टोल पर जाम लगने की समस्या खत्म हुई और समय तथा ईंधन दोनों की बचत हो रही है। नवंबर 2023 तक देश में 98 प्रतिशत टोल कलेक्शन फास्ट टैग के जरिए होने लगा है। लेकिन ये जो बाकी बचे जो 2 प्रतिशत लोग हैं इन पर ही टोल की असली मार पड़ती है जब उन्हें दोगुनी कीमत चुकानी पड़ती है। ये वो लोग हैं जो किसी न किसी मुसीबत या संकट में फास्ट टैग नहीं लगा पाते या रिचार्ज नहीं कर पाते और दोहरी कीमत चुकाने पर मजबूर हो जाते हैं।

खैर लोकतंत्र में बहुसंख्यक का बोलबाला होता है। अगर 98 प्रतिशत लोग फास्टटैग से टोल दे रहे हैं तो यह एक सुपर सक्सेस रेट है। इसी बात से प्रेरित होकर नितिन गड़करी ने सड़कों पर से टोल प्लाजा हटाने का ही प्लान बना लिया। इस नये प्लान के तहत जिन एक्सप्रेसवे या हाईवे पर यह टोल सिस्टम लागू किया जाएगा उसे इस तरह तकनीकी के जरिए लैस किया जाएगा कि उस पर गाड़ी के आते ही उसका टोल शुरु हो जाएगा। जहां तक वह गाड़ी हाईवे पर चलेगी, उसका टोल जुड़ता जाएगा। जैसे ही वह गाड़ी हाईवे से उतरेगी, उसका टोल उसके बैंक एकाउण्ट से कट जाएगा।

यह पूरी तरह से सेटेलाइट आधारित टोल सिस्टम होगा जिसे करने के लिए सरकार को एक्सप्रेसवे और हाईवे पर व्यापक स्तर पर तैयारी करनी होगी। इसके लिए इसरो द्वारा विशेष रूप से तैयार गगन जीपीएस सिस्टम को लागू किया जाएगा। जगह जगह सेन्सर और कैमरे लगाये जाएंगे तब जाकर किसी एक्सप्रेसवे या हाईवे पर यह टोल सिस्टम काम करेगा।

स्वाभाविक है भारत के विशाल 1 लाख 46 हजार किलोमीटर लंबे नेशनल हाईवे नेटवर्क पर यह सेटेलाइट आधारित टोल सिस्टम लागू करने में लंबा वक्त लगेगा। यह बात सही है कि बीते दस सालों में फोर लेन सड़कों की लंबाई 18,387 किलोमीटर से बढकर 46 हजार किलोमीटर से अधिक हो गयी है, फिर भी यह कुल राजमार्ग का एक तिहाई ही है। आज भी भारत में दो लेन वाले हाइवे का नेटवर्क ही सर्वाधिक है जबकि 10 प्रतिशत नेशनल हाइवे तो ऐसे हैं जो 2 लेन के स्टैण्डर्ड मानक से भी कम हैं।

स्वाभाविक है सेटेलाइट आधारित टोल की घोषणा करने, उसे तकनीकी रूप से सफल बनाने और फिर देशभर में लागू करने में लंबा समय लगेगा। इसलिए सबसे पहले इसे उन एक्सप्रेसवे पर लागू करने की तैयारी है जहां वाहनों की आवाजाही अधिक है और तकनीकी रूप से उन्हें तैयार करना भी आसान है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन एक्सप्रेसवे पर चढना और उतरना नियंत्रित होता है। सिर्फ कुछ निर्धारित जगहों से ही एक्सप्रेसवे पर आया जाया जा सकता है।

इसलिए जब तक देश का हर नेशनल हाईवे सेटेलाइट आधारित टोल वसूली के लिए तैयार नहीं हो जाता तब तक टोल बूथ वाली व्यवस्था चलती रहेगी। हालांकि यहां एक बात और ध्यान देने वाली है कि सेटेलाइट आधारित टोल टैक्स से सरकार फायदे में ही रहनेवाली है। इसका कारण यह है कि अभी बड़ी संख्या में ऐसे वाहन टोल नहीं चुकाते हैं जो किसी नेशनल हाइवे पर छोटी दूरी तय करते हैं। संभवत: सरकार की मंशा इन्हीं छोटी दूरी वाले लोगों को भी टोल दायरे में समेटने की है।

अभी नेशनल हाइवे एथारिटी का जो नियम है उसके मुताबिक हर 45-50 किलोमीटर पर एक टोल बूथ स्थापित किया जाता है। अब अगर कोई बीस तीस किलोमीटर ही यात्रा करके टोल बूथ आने से पहले ही हाईवे से उतर जाता है तो वह टोल नहीं चुकाता है। लेकिन सेटेलाइट आधारित टोल व्यवस्था आ जाने से एक दो किलोमीटर भी नेशनल हाइवे पर चलनेवालों को टोल चुकाना होगा। भले ही इसके लिए उनके एकाउण्ट से पांच या दस रूपया ही कटे। देखने में यह राशि भले ही छोटी लगे लेकिन छोटे अमाउण्ट ही हमेशा बड़ा फायदा करवाते हैं। संभवत: यही कारण है कि नितिन गड़करी काफी समय से सेटेलाइट आधारित टोल व्यवस्था की बात कर रहे हैं।

लेकिन इन तमाम तकनीकी विकास के बीच एक बात जो छिप जाती है या छिपा ली जाती है वह यह कि अब नेशनल हाइवे पर चलना मंहगा सौदा बनता जा रहा है। जैसे जैसे नेशनल हाइवे की दशा सुधरी है, वैसे वैसे उस पर चलना भी मंहगा होता गया है।

नेशनल हाइवे के विस्तार और सुधार के लिए अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल किया गया। निजी कंपनियों के निवेश का रास्ता खोला गया। इसका परिणाम यह हुआ है कि टोल रेट भी अलग अलग सड़कों पर अलग अलग हैं जो निजी कार के लिए 80 पैसे प्रति किलोमीटर से 2.25 रूपये प्रति किलोमीटर के बीच रहता है। ट्रक, बस का रेट इनसे दो, तीन या फिर चार गुना अधिक बैठता है।

इसमें भी एनएचआई प्रति वर्ष इसकी समीक्षा करता है और हर साल टोल रेट बढ़ जाते हैं जिन्हें 1 अप्रैल से लागू किया जाता है। साल 2022 में 10 से 15 प्रतिशत, साल 2023 में 10 प्रतिशत और इस साल 2024 में फिर से 5 प्रतिशत टोल रेट बढ़ा दिया गया है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी का अपना आंकड़ा बताता है कि साल 2018-19 से साल 2023-24 के बीच टोल रेट में 32 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है।

आज एक सामान्य कार से अगर दिल्ली से हरिद्वार जाना हो तो उसे एक ओर का लगभग 500 रूपया सिर्फ टोल देना होता है। इसमें दिल्ली मेरठ एक्सप्रेसवे का टोल भी शामिल है। जबकि अगर इसी रूट पर रेलवे से सफर किया जाएगा तो लगभग इतने ही खर्च में वह एसी थ्री टीयर में दिल्ली से हरिद्वार पहुंच सकता है।

निश्चित रूप ये यह टोल रेट उनके लिए भारी पड़ेगा जो छोटी गाड़ियों से आते जाते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए आज भी भारत में 8 लाख से कम कीमत की कारों की बिक्री का आंकड़ा ही सर्वाधिक है। मारुती हो या टाटा। भारत की टॉप टेन बिक्री वाली कारों में सबसे अधिक वही कारें या पैसेन्जर वाहन शामिल हैं जिनकी कीमत 8 लाख से कम है। मारुति सुजुकी की अल्टो, वैगन आर हो या फिर टाटा की पंच। भारतीय बाजार में सबसे अधिक बिक्री का रिकार्ड इन्हीं का है।

यह इस बात का प्रमाण है कि भारत में पैसेन्जर वाहन की बिक्री तो बढी है लेकिन आज भी कम कीमत की कारें और अधिक माइलेज देनेवारी कारें ही सबसे अधिक बिकती हैं। इनके मालिकों को बजट बायर कहा जाता है। लेकिन सड़क पर आते ही ये बजट बायर हों या फिर मंहगी गाड़ियां खरीदनेवाला अपर मिडिल क्लास। इन सबके लिए टोल रेट समान रहता है जो मिडिल क्लास पर भारी पड़े न पड़े, सामान्य वर्ग को भारी पड़ता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि टोल निर्धारण में जैसे पैसेन्जर व्हीकल और कामर्शियल व्हीकल को अलग किया जाता है वैसे ही छोटी कारों और बड़ी कारों के लिए अलग अलग टोल निर्धारित हो। अगर सरकार 4 मीटर से कम लंबाई वाली गाड़ियों पर करों में कटौती कर सकती है तो फिर टोल रेट में कटौती क्यों नहीं हो सकती?

इसके साथ ही कॉमर्शियल व्हीकल के टोल रेट को भी तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। इसका कारण यह है कि अगर डीजल की कीमतें बढ़ने से मंहगाई बढती है तो अधिक टोल वसूल जाने का भार भी आखिरकार आम आदमी के कंधे पर ही आता है क्योंकि इससे खुदरा वस्तुओं का मूल्य और सार्वजनिक परिवहन मंहगा हो जाता है। सरकार जो टोल रेट बढ़ाती है उसे कॉमर्शियल गाड़ी वाले सामान या सवारी पर ही डाल देते हैं, अपनी जेब से नहीं भरते।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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