BJP Gujarat Model: भाजपा के लिए गुजरात मॉडल से आगे बढ़ने का समय
कर्नाटक में भाजपा की हार पूरी तरह से गुजरात मॉडल की हार भले न हो लेकिन इस हार में एक चेतावनी तो छिपी है कि हर प्रदेश में एक ही फार्मूले से सफलता अर्जित नहीं की जा सकती।

कर्नाटक से दूर यूपी में वाराणसी के पास एक छोटा सा करखियांव नामक औद्योगिक क्षेत्र है जिसमें खाने पीने वाले सामान के कल कारखाने लगे हैं। यही पर 23 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री मोदी ने बनास डेरी संकुल का शिलान्यास किया था। गुजरात की बनास डेरी गांव गांव से दूध इकट्ठा करती है और डेयरी प्रोडक्ट बनाती है। जब मोदी ने इसकी आधारशिला रखी तो पूरे पूर्वांचल में मोदी की वाह वाह हुई। बताया गया कि मोदी ही हैं जो बनारस का ऐसा विकास कर सकते हैं। किसी ने यह सवाल ही नहीं उठाया कि बनास डेरी के आने से यूपी की पराग दुग्ध सहकारी समिति का क्या होगा?
यह पूर्वी उत्तर प्रदेश है। यहां के लोगों का मन मानस का सदियों से दमन हुआ है। इनका आत्मविश्वास इस गहराई में गिर चुका है कि वो मान ही नहीं पाते कि अपना उत्थान वो अपने हाथों से कर सकते हैं। उन्हें लगता है कि कोई बाहर से आयेगा और उन्हें विकसित कर देगा, या फिर वो बाहर जाएंगे तो उनका विकास हो जाएगा। इसलिए यहां बीते एक दशक से गुजरात मॉडल का बोलबाला है। यही कारण है कि लखनऊ से पूरब के लोग मोदी शाह के गुजरात मॉडल में ही अपना उद्धार देखते हैं।
लेकिन कर्नाटक में जब गुजरात की अमूल डेरी पहुंची तो बहुत बड़ा मुद्दा बन गयी। चुनाव के दौरान वहां नंदिनी बनाम अमूल का युद्ध शुरु हो गया। कांग्रेस ने इस गुजरात मॉडल का विरोध किया और मुद्दा भी बनाया। हो सकता है उत्तर भारत में बैठे लोगों को लगा हो कि कांग्रेस जानबूझकर ऐसे बेकार के मामले उठा रही है। लेकिन जिन्होंने ऐसा सोचा वो पूर्वी उत्तर प्रदेश वाली मानसिकता से प्रभावित लोग होंगे जिन्हें मोदी के आर्थिक रूप से गुजरात मॉडल में मोक्ष दिखता है। कर्नाटक ने साबित कर दिया कि उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश समझने की गलती न की जाए। वो अपनी जमीन पर, अपने उद्यम से विकास करना जानते हैं। उन्हें किसी बाहरी मॉडल की जरूरत नहीं है।
ऊपरी तौर पर भले ही कर्नाटक की चुनावी समीक्षा करते समय उत्तर के लोगों ने इस बात को बहुत महत्व नहीं दिया लेकिन इससे साबित होता है कि मोदी का गुजरात मॉडल पूरे देश में एक समान प्रभावी नहीं हो सकता। न आर्थिक मॉडल और न ही राजनीतिक मॉडल। कम से कम एक दशक के प्रयोगों के बाद अब भाजपा के भीतर ही गुजरात मॉडल को लेकर वह आत्मविश्वास नहीं रहा जैसा 2014 के चुनाव के समय था।
गुजरात के आर्थिक मॉडल में कुछ बड़े पूंजीपति हैं जिनके पास अरबों खरबों की संपत्ति है। वह व्यावसायिक मानसिकता है जो व्यापार करना और लाभ कमाना जानती है। इसलिए बीते दस सालों में मोदी के पीछे पीछे गुजरात से जुड़ा एक व्यावसायिक वर्ग भी दिखता है दिल्ली से लेकर बनारस तक। इसमें ठेकेदार, आर्किटेक्ट, निवेशक सब शामिल हैं जो अलग अलग प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। दिल्ली की संसद भवन हो या काशी का विश्वनाथ कारीडोर उसके डिजाइन और निर्माण का जिम्मा गुजरात के लोगों के पास ही रहा।
दिल्ली और यूपी में इसका विरोध भला क्योंकर होता? जहां सिरे से अकाल पड़ा हुआ हो वहां बारिश की चार बूंदे कहीं से गिर जाएं, कोई शिकायत क्यों करेगा? लेकिन कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु या फिर महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान में इसे जस का तस नहीं दोहराया जा सकता। इन सभी राज्यों के अपने अपने मॉडल हैं। यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा का भी अपना औद्योगिक मॉडल है। इसलिए वो किसी आयातित मॉडल को अपने ऊपर क्यों हावी होने देंगे?
लेकिन यहां आर्थिक मॉडल से अधिक महत्वपूर्ण है राजनीतिक मॉडल। राजनीति के उस गुजरात मॉडल के बारे में भी समझना चाहिए जो हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस के हाथों बुरी तरह परास्त हुआ है। जो बीते एक दशक से केन्द्र में मोदी शाह की राजनीति को करीब से देख समझ रहे हैं, उनके लिए इस मॉडल को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। मोदी शाह के गुजरात मॉडल के चार चरण है।
पहला चरण होता है जहां चुनाव हो रहा है वहां विकास के उस गुजरात मॉडल को स्थापित करना जो मोदी के मुख्यमंत्री रहते देश में चर्चित हुआ था। इसके बाद दूसरा चरण होता है वहां के टिकट बंटवारे में भरपूर हस्तक्षेप। भाजपा में टिकट देने की एक व्यवस्था रही है। इसमें पार्टी के अलावा संगठन के सहयोगियों की भी सलाह ली जाती है। लेकिन मोदी शाह के नेतृत्व में संगठन से सलाह वाली बात खत्म तो नहीं हुई लेकिन बहुत सीमित हो गयी। आमतौर पर उचित जातीय समीकरण वाले ऐसे "कमजोर उम्मीदवारों" पर दांव लगाया गया जो अपना कोई आधार नहीं रखते और स्वयं चुनाव जीतने की क्षमता नहीं रखते। जबकि कद्दावर लोगों को या तो टिकट नहीं दिया गया या फिर जहां से वे टिकट मांग रहे थे, वहां से नहीं दिया गया।
अब आता है तीसरा चरण। तीसरे चरण में जिस राज्य में चुनाव है वहां मोदी की सघन रैली, रोड शो, अखबारों और टीवी पर विज्ञापन के जरिए मोदी मैजिक को स्थापित किया जाता है। हालांकि मई 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुए 57 विधानसभा चुनावों में से भाजपा को 29 चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है, और पूर्ण बहुमत तो केवल 12 बार ही मिला है। सक्सेस रेट का प्रतिशत निकाला जा सकता है लेकिन बड़ी चतुराई से मोदी मैजिक को भारतीय जन मानस पर स्थापित कर दिया गया है।
ये तीन चरण अगर सफलता से काम कर गये तो चौथे चरण में मोदी शाह की पसंद लागू होती है। वो मुख्यमंत्री तय करते हैं और परोक्ष रूप से एक संदेश भी दिया जाता है कि आपकी सफलता असल में आपकी या पार्टी की सफलता नहीं बल्कि मोदी मैजिक की सफलता है। मोदी का जादू चला है तब आप जीत पाये हैं। उनका मैजिक न चलता तो आप चुनाव नहीं जीत सकते थे।
कुछ हद तक ये बात सही भी है। मोदी की छवि एक लोकप्रिय नेता की है और वो जनता से सीधे संवाद में महारत रखते हैं। कई बार उनके द्वारा चुनाव के समय में दिये गये "धर्म देखकर बिजली सप्लाई" "कपड़ा देखकर आतंकवादी की पहचान" या फिर बजरंग बली वाले बयान अटपटे लगते हैं। लेकिन राजनीति के इस गुजरात मॉडल का नुकसान यह है कि स्थानीय नेतृत्व अप्रभावी होने लगा है और 'मजबूत दावेदार' या तो घर बैठ गये हैं या फिर परिधि पर निठल्ले भंवरे की तरह मंडरा रहे हैं।
वैसे तो हिमाचल के बाद ही भाजपा को राजनीति के गुजरात मॉडल की प्रासंगिकता पर विचार करना चाहिए था लेकिन कर्नाटक की हार के बाद तो उन्हें जरूर इस पर विचार करना होगा। गुजरात के बाहर अन्य राज्यों से भी राजनीति के मॉडल को उभारना होगा ताकि ये संदेश जाए कि देश की राजनीतिक विरासत में अकेला गुजरात मॉडल भर नहीं है। विविधता से भरे इस देश में भारतीय जनता पार्टी के पास राजनीतिक रूप से सफल दूसरे भी कई मॉडल हैं जो देश प्रदेश को आकर्षित कर सकते हैं।
अगर बीजेपी यह विचार विमर्श करने में समर्थ होती है तो कर्नाटक में हुई हार उसके भविष्य की जीत का रास्ता खोल देगी। उस स्थिति में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान ही नहीं 2024 के आम चुनाव में भी उसे कर्नाटक जैसी कठिन परिस्थिति का सामना शायद न करना पड़े।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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