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Mizoram: बांस के फूल, चूहे, अकाल और पूर्वोत्तर का अजीब रिश्ता

Mizoram: पूर्वोत्तर के राज्यों में बांस के जंगलों में फूल आने का मतलब है कि अकाल आने वाला है। ऐसे ही एक अकाल से लड़ने के लिए 1959 में मिजो नेशनल फेमिन फ्रंट बना जो बाद में अलगाववादी संगठन मिजो नेशनल फ्रंट बन गया। अकाल एक ऐसी आपदा है जो बांस में फूल आने पर उत्तर पूर्व के कई राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और सबसे भीषण रूप से मिजोरम में आती है। एक बार फिर 2025-26 में बांस के जंगलों में फूल की आहट मणिपुर में सुनाई दे रही है।

अगर बांस में फूल आयें तो क्या होगा? बांस के पौधों में फूल आने के तुरंत बाद बांस सूख जाते हैं। असल में ये बांस के जंगलों की प्राकृतिक व्यवस्था होती है जिससे फूल आने के तुरंत बाद बांस सूखते हैं, उसके बीज इधर-उधर वहीं जंगल में बिखर जाते हैं। जब बांस में फूल आते हैं, उसी समय जंगलों में चूहों की आबादी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। हजारों चूहों को भला जंगल में खाने को क्या मिलेगा? ये चूहे जंगलों से निकलकर धान इत्यादि के खेतों पर, आस पास के गावों में जमा अनाज पर हमला करते हैं। नतीजा, अनाज समाप्त और मनुष्यों के लिए अकाल!

The relationship between bamboo flowers, rats, famine and Mizoram

बांस के फूल के जरिए आनेवाले अकाल के इस चक्र को मौतम और थिंगटन कहा जाता है। मौतम में एक प्रजाति के बांस पर फूल आते हैं, उसके 18 वर्ष बाद दूसरी प्रजाति पर आते हैं तो थिंगटम नाम का अकाल आता है, उसके तीस साल बाद फिर से मौतम आएगा। बांस के फूल के जरिए आनेवाले अकाल का यह चक्र ऐसे चलता रहता है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में जंगलों का करीब तीस फीसदी हिस्सा बांस का है। यानि इस तरह के अकाल का सामना मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि को झेलना पड़ता है। ब्रिटिश रिकॉर्ड के हिसाब से मिजोरम में ऐसा मौतम का अकाल 1862 में आया था, फिर 1911 में भी आया था। अब आपने अंदाजा लगा लिया होगा कि इस किस्म का अकाल हर 48-50 वर्षों में आता होगा, क्योंकि बांस में फूल तो आयेंगे।

ऐसा ही एक अकाल मिजोरम में 1959 में आया। इस समय तक भारत आजाद हो चुका था लेकिन दिल्ली दरबार को पूर्वोत्तर के सुदूर राज्यों की समस्याओं से कोई विशेष मतलब नहीं था। इस समय तक मिजोरम कोई अलग राज्य भी नहीं था। आज की तरह "सेवन सिस्टर्स" अस्तित्व में नहीं आये थे और ये इलाका भी असम का ही हिस्सा होता था। केंद्र की कांग्रेसी सरकार के अलावा जब असम की स्थानीय सरकार ने भी ध्यान नहीं दिया तो मिजोरम की जनता ने स्वयं ही इस अकाल से निपटने के लिए संगठन बनाए।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1958-59 के मौतम में कम से कम 100 लोगों की मृत्यु हुई थी। स्थानीय लोगों को अपनी दंतकथाओं और परंपराओं के कारण मौतम के आने का पता था लेकिन उस दौर की असम की कांग्रेसी सरकार ने ऐसे दावों को "अन्धविश्वास" कहकर दरकिनार कर दिया। जब मौतम शुरू हुआ और फिर चूहे आने लगे तो 40 पैसे प्रति चूहे के दर से करीब 20 लाख चूहों को मारने का भुगतान किया गया।

कांग्रेसियों की इस नासमझी की वजह से ही मिजो नेशनल फेमिन फ्रंट बना जो आगे चलकर मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) में बदल गया। इसके तुरंत बाद असम की कांग्रेस सरकार ने असमिया भाषा को राज्य की भाषा बनाने का कानून पास किया तो अलगाव और बढ़ा। उस वक्त एमएनएफ के जो नेता थे, वही लालडेंगा आगे चलकर मिजोरम के मुख्यमंत्री भी बने, लेकिन जबतक ये होता उससे पहले के ही दौर में कई घटनाएँ घटी।

दिसम्बर 1957 से नवम्बर 1970 के दौर में कांग्रेसी नेता बिमल प्रसाद चलिहा असम के मुख्यमंत्री थे। बिमल प्रसाद असम राज्य को छोटे हिस्सों में तोड़े जाने के मुखर विरोधी थे और "सेवेन सिस्टर्स" बनने की प्रक्रिया उनकी मृत्यु के बाद ही शुरू हो पायी थी। केंद्र और असम की कांग्रेसी सरकारों की अक्षमता और अनदेखी के कारण जो एमएनएफ बना, वो थोड़े ही समय में असमिया भाषा जबरन लागू किये जाने के बाद एक अलगाववादी संगठन में बदला और फिर अगले करीब बीस वर्षों तक (1986 के समझौते तक) भारतीय सेना के विरुद्ध लड़ता रहा।

इस लड़ाई से मिजोरम को केवल लालडेंगा जैसे नेता नहीं मिले थे। जब 2006 के जून में मौतम फिर से आने वाला था उस समय मिजोरम के मुख्यमंत्री थे जोरामथंगा, जो कि पूर्व गुरिल्ला योद्धा रहे थे। भारतीय सेना की मदद से इस बार सरकार दूर-दराज के गावों तक पहुंची। कृषि चक्र के परिवर्तन के जरिये लोगों को अलग-अलग किस्म के अनाज उपजाकर संरक्षित करने के लिए प्रेरित किया गया। पेस्ट कण्ट्रोल की व्यवस्थाएं की गयीं। ग्रामीणों को तेज गंध वाले लहसुन और अदरक जैसी फसलें उपजाना सिखाया जाने लगा। इन तेज गंध वाली फसलों से चूहे दूर रहना चाहते हैं। इसके अलावा इनकी बिक्री से पैसे आते, और जो कहीं अनाज खत्म होता भी तो ग्रामीणों के पास खाना खरीदने के लिए पैसे होते।

दक्षिणी अमेरिका, मेडागास्कर, जापान और लाओस में भी चूहों का ऐसा ही प्रकोप देखा गया है। बांस की एक दूसरी नस्ल में जब फूल आते हैं तो भी ऐसी ही तबाही आती है जिसे थिंगटम कहा जाता है। मौतम से थिंगटम के बीच करीब 18 वर्ष और फिर थिंगटम से अगले मौतम के बीच 30 वर्षो का फासला होता है। इस हिसाब से अगला थिंगटम 2025-26 में आने वाला है।

फूल आने पर चूहों की आबादी बढ़ती क्यों है? क्योंकि चूहे अपने बच्चों को खा जाने के लिए जाने जाते हैं। इससे उनकी आबादी नियंत्रित रहती है। जब बांस में फूल आते हैं तो चूहों के पास खाने को बहुत से फूल होते हैं और भूख लगी ही नहीं है तो वो अपने ही बच्चों को नहीं खाते। इससे चूहों की आबादी बेतहाशा बढ़ने लगती है और अंततः फूल खत्म होते ही लाखों चूहे आस पास के गावों पर हमला करते हैं।

आज कृषि पर इतनी बहसें होती हैं, बाढ़ जैसी समस्या की चर्चा होती है, आम किसानों और ग्रामीणों की बातों को जनता के सामने रखने के लिए सेमिनार और बैठकें होती हैं, उसके बाद भी अगर आपने अगले कुछ ही वर्षों में (2025-26) आने वाले थिंगटम या मौतम के बारे में कभी नहीं सुना तो आपको आश्चर्य तो होना ही चाहिए। उत्तर-पूर्वी भारत की समस्याओं के लिए दिल्ली कितनी दूर है, इसका भी इससे पता चलता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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