Stubble Burning: बेलगाम किसान, हलकान इंसान
Stubble Burning: सभी भौतिक कर्मों में कृषि कार्य को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कृषि कर्म से जीव जगत का पेट भरता है। इंसान ही नहीं, जाने कितने पशु पक्षी कीट पतंगे अपना पेट भरने के लिए किसानों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए वह अन्नदाता कहा जाता है। लेकिन आजकल जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं उससे न केवल किसानों पर बल्कि पूरे पंजाब पर सवाल उठ रहे हैं।
7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सख्त आदेश के बाद एक दो दिन पराली जलाने की घटनाएं पंजाब में रुकी जरूर लेकिन दोबारा से धान की पराली जलाने का सिलसिला शुरु हो गया है। पंजाब में दीवाली के दिन तक 987 पराली जलाने की घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं। इस तरह केवल धान के इस सीजन में अकेले पंजाब में 24,717 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। ये वो आंकड़े हैं जो पुलिस रिकार्ड में दर्ज हैं। पुलिस रिकार्ड के बाहर कितनी घटनाएं हैं इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है।

हालांकि इस साल पराली जलाने की जितनी घटनाएं अब तक रिपोर्ट हुई हैं वो बीते दो सालों में सबसे कम हैं। पंजाब में 2021 में 43 हजार और 2022 में 59 हजार पराली जलाने की घटनाएं रिपोर्ट हुई थीं। बीते दो सालों के आंकड़ों को देखें तो इस साल निश्चित रूप से पराली जलाने की घटनाएं घटकर आधी रह गयी हैं। लेकिन अभी भी वायु प्रदूषण का संकट कम नहीं हुआ है। दिल्ली और आसपास के शहरों के हालात इतने बदतर हो गये हैं कि दीपावली के अगले दिन एयर क्वालिटी इंडेक्स ने ऐतिहासिक 969 का आंकड़ा छू लिया जो इस तरह के वायु प्रदूषण की दृष्टि से आपदा कही जाएगी।
निश्चित रूप से दिल्ली की बदतर हुई इस हवा के लिए दिल्लीवालों की पटाखाबाजी भी जिम्मेवार है लेकिन जहां पहले से हालात खराब हों वहां हर एक घटना उन हालात को बद से बदतर ही बनाता है। जैसे-जैसे पंजाब और हरियाणा में कैश क्रॉप के रूप में धान की खेती का चलन बढ़ा है वैसे वैसे खेती के जरिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी बढोत्तरी हुई है। बीते एक दशक में भारत में कृषि कार्यों से होनेवाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 75 प्रतिशत की बढ़त हुई है।
भारत सरकार से संबंद्ध वैज्ञानिक शोध संस्था इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजूकेशन एण्ड रिसर्च (IISER) ने 602 जिलों में पराली जलाने की घटनाओं पर एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन में संस्था ने पाया कि 2011 में देश में 30 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान की पराली जलाने की घटनाएं हुई थीं जो 2020 में बढकर 45 लाख हेक्टेयर हो गयी। धान की पराली जलाने की घटनाएं मुख्य रूप से गंगा यमुना के दोआब में होती हैं जिसमें पंजाब सबसे ऊपर है। देश में धान की पराली जलाने की जितनी घटनाएं दर्ज हुई हैं उसमें 41 प्रतिशत अकेले पंजाब में दर्ज की गयी हैं।
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं का सबसे बड़ा कारण पंजाब का गैर धान का उत्पादक होना है। पंजाब परंपरागत रूप से धान की पैदावार के लिए नहीं जाना जाता। वहां के लोगों के लिए चावल उनके मुख्य भोजन का हिस्सा नहीं है। लेकिन हरित क्रांति के बाद कैश क्रॉप के रूप में पंजाब में धान की पैदावार महामारी की तरह फैली है जिसने न केवल वायु प्रदूषण को गंभीर समस्या बनाया है बल्कि भूजल संकट को भी गहरा किया है। संगरूर के ग्रामीण इलाकों में जहां जहां सन 60 के दशक में कुओं में 8 फुट पर पानी मिल जाता था आज 450 फुट पर पहुंच गया है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड का कहना है कि जिस तरह से पंजाब में भूजल नीचे जा रहा है उसको देखते हुए 2039 तक भूजल गिरकर 1,000 फुट तक पहुंच जाएगा।
ये सभी लक्षण इस बात का संकेत हैं कि पंजाब में जो खेती किसानी हो रही है वह न पंजाब के हित में है और न देश समाज के हित में। सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल अगर निजी यात्रा पर पंजाब न गये होते तो वह सब अपनी आंखों से न देख पाते जिसके बाद उन्होंने पंजाब में धान की खेती को खत्म करने के लिए कहा है। उनका सुझाव गलत नहीं है। धान की खेती ने पंजाब के किसानों को एमएसपी के जरिए कैश जरूर मुहैया कराया है लेकिन पंजाब में धान की खेती ने न केवल पंजाब को बल्कि आसपास के इंसानों को भी हलकान कर दिया है।
परंपरागत रुप से धान के पैदावार वाले इलाकों में पराली की कोई समस्या नहीं है क्योंकि वो धान और पराली दोनों का उपयोग करना जानते हैं। लेकिन गेंहू काटने के अमेरिकन हार्वेस्टर से पंजाब के किसानों ने धान काटने का जो चलन शुरु किया वह अब हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैल रहा है। यह हार्वेस्टर धान की कटाई के लिए डिजाइन ही नहीं किया गया है जिसके कारण पराली एक बड़ी समस्या बन जाती है। इसलिए पंजाब और हरियाणा के बाद अब मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में बढोत्तरी देखी जा रही है। आईआईएसआर के अध्ययन में यह बात उभरकर सामने आयी है कि पंजाब के बाद 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मध्य प्रदेश पराली जलाने के मामले में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है।
भारत की पंरपरागत खेती की पद्धति ऐसी रही है कि वह सबका पोषण करती थी। जीव जगत हो या पर्यावरण। खेती से किसी को कोई नुकसान नहीं होता था। लेकिन जब से खेती को हानि लाभ के व्यापार में झोंक दिया गया है तब से केमिकल फर्टिलाइजर का प्रयोग भी बढा है और अप्रासंगिक खेती का चलन भी।
आज दिल्ली और आसपास रहनेवाले इंसानों के सामने जो संकट खड़ा हुआ है वह इसी हानि लाभ के सौदे से उपजी अप्रासंगिक खेती का परिणाम है। जब तक किसान जो खायेगा, उसे उपजाएगा तब तक खेती से न तो इंसान को कोई नुकसान होगा और न ही पर्यावरण को। देर सबेर यह बात किसानों को भी समझनी होगी और सरकारी योजनाकारों को भी। एमएसपी के फेर में पंजाब में धान और बंगाल में गेहूं की खेती का चलन बढेगा तो किसी न किसी प्रकार का संकट खड़ा ही होगा, जैसे इस समय खड़ा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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