Atique Ahmed: अतीक अहमद का उदय कैसे हुआ?
अतीक अहमद के अंत से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके उदय का वो इतिहास जानना है जिसने उसे इतना कुख्यात अपराधी बना दिया। राजनीति और अपराध के इसी गठजोड़ से पैदा हुए अतीक अहमद की एक पड़ताल।

Atique Ahmed: प्राचीन काल से प्रयागराज अपने धार्मिक महत्व, विद्या और शिक्षा के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध रहा है। तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम के कारण इसे त्रिवेणी भी कहते हैं। आधुनिक युग में भी ऑक्सफोर्ड ऑफ ईस्ट यानी इलाहाबाद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय जैसे संस्थान, जिन्होंने देश को अनेकों शिक्षाविद और न्यायविद दिये हैं, इस ऐतिहासिक नगर की महानता के प्रतीक हैं। अकेले प्रयागराज ने भारत के छ: मुख्य न्यायाधीश दिए हैं।
लेकिन दूसरी तरफ आजकल इस शहर की चर्चा उसकी इन योग्यताओं और क्षमताओं के कारण नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के कारण हो रही है जिसने इसको अपराध का पर्याय बना दिया था। पिछले लगभग आधे दशक से, प्रयागराज की एक छवि गुंडों के शहर के रूप में भी काफी प्रचलित है। इस तरह की मलिन छवि बनाने वालों में अतीक अहमद "चकिया" का नाम सबसे ऊपर आता है, जो इस समय अनेक अपराधों के कारण (इसके विरूद्ध लगभग 70 आपराधिक मामले दर्ज हैं) गुजरात की साबरमती जेल में बंद है। प्रयागराज से संबंध रखने वाले लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि अतीक अहमद का उदय कैसे हुआ।
इंदिरा गांधी के शासन में (70 और 80 के दशक में), जब प्रतिवर्ष अनेक शहरों में नियमित दंगे होना एक आम बात थी, अतीक ने अपने समुदाय के मध्य अपनी छवि एक ऐसे युवा की बनाई जो दंगों के दौरान उसके समुदाय के लोगों की रक्षा कर सकता था। मतलब जितने अधिक दंगे होते थे उसकी पापुलरिटी उतनी अधिक बढ़ जाती थी। लोग यह स्पष्ट रूप से जानते हैं कि ये दंगे काफी कुछ प्रायोजित होते थे। इन दंगों के दौरान अतीक अहमद को प्रसिद्धि क्यों और कैसे मिली? उसने पहले अपने को अपने समुदाय के संरक्षक के रूप में स्थापित किया, अपना जनाधार बनाया और फिर उसे चुनाव में भुना लिया।
1979 में पहली बार अतीक अहमद पर जघन्य अपराध (हत्या) का मुकदमा दर्ज हुआ। अतीक उत्तर प्रदेश का पहला अपराधी था जिसके ऊपर "गैंगस्टर एक्ट" लगाया गया। इसके लगभग दस वर्ष बाद, 1989 में इसने स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा से विधायक का चुनाव लड़कर और विजयी होकर अपनी पॉपुलैरिटी और समुदाय विशेष के जनाधार को भुना लिया। अब वह एक अपराधी, गुण्डा, हत्यारा नहीं बल्कि समुदाय विशेष का हीरो था।
यूं तो कोई भी राजनीतिक दल दूध का धुला नहीं है, लेकिन अपराधियों को संरक्षण देने में समाजवादी पार्टी और उसके बाद बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में अग्रणी रही हैं। मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी ने सबसे पहले अतीक को अपनी पार्टी में सम्मिलित किया। 1996 में वह समाजवादी पार्टी से विधायक बना और शहर पश्चिमी सीट से पांच बार विधायक रहकर रिकार्ड कायम किया। 1999-2003 तक वह, सोनेलाल पटेल द्वारा स्थापित "अपना दल", जो आज एनडीए का घटक है, उसका अध्यक्ष रहा। मोदी सरकार में राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल अब इसी दल की राष्ट्रीय प्रमुख हैं।
अपना दल से अलग होने के बाद एक बार फिर वह समाजवादी पार्टी की ओर लौटा। 2004-2009 तक वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर फूलपुर (इलाहाबाद) से लोकसभा सदस्य चुना गया। अपराध के जरिए राजनीति में प्रवेश करने वाले अतीक अहमद का सारा जीवन जाति और संप्रदाय पर आधारित राजनीति में ही बीता। सिर्फ समाजवादी पार्टी ही नहीं बल्कि अपना दल और बहुजन समाज पार्टी में भी अपनी इसी ताकत के कारण यह व्यक्ति महत्वपूर्ण पदों पर रहा।
अतीक अहमद के प्रारंभ का और उसके बाद के जीवन का पुनरावलोकन करने के पहले यह आवश्यक है कि हम इस विषय पर विचार करें कि ऐसे अपराधी तत्व किस तरह से पनपते और किस तरह से पलते-बढ़ते हैं। ऐसे सांप्रदायिक अपराधियों को पार्टी में सम्मिलित करने और उन्हें महत्वपूर्ण पद देने से सिर्फ एक सीट नहीं आती है बल्कि प्रतीकात्मक रूप से उस समाज, उस जाति या समुदाय के लोगों के भी वोट बैंक की बड़ी गारंटी हो जाती है। राजनीति में ऐसे अपराधियों को संरक्षण देने का यही सबसे प्रमुख कारण रहा है।
दूसरा प्रमुख कारण रहा कि ऐसे व्यक्ति जिस पार्टी में भी जाते हैं, अपनी लूट, डकैती, छिनैती और फिरौती के हिस्से का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस पार्टी के कोष में जमा करते हैं जो इसे संरक्षण देती है। तीसरा, ऐसे व्यक्ति चुनाव के दौरान संख्या बल ही नहीं अपने बाहुबल से भी काफी कुछ काम कर लेते हैं। चौथा, पुलिस और प्रशासन राजनैतिक संरक्षण के कारण पंगु और मूकदर्शक बने रहने के लिए मज़बूर हो जाता है। इस तरह के अनेक कारण है जिसके कारण राजनैतिक दल ऐसे लोगों को संरक्षण प्रदान करते हैं। अगर सजायाफ्ता करार दिये जाने और बेटे के एनकाउंटर के बाद भी वह गद्दी जाने के बाद देख लेने की धमकी दे रहा है तो इसके पीछे वही राजनीतिक ताकत है जिसके बल पर वह अपराध जगत का शहंशाह बन गया था।
आज जो पुलिसवाले उसके खिलाफ कार्रवाई और अभियोजन को अंजाम दे रहे हैं इनकी दशा कभी अतीक के सामने ये थी कि अतीक जैसे अपराधियों पर हाथ डालते ही उन्हें हटा दिया जाता था। कई बार कैरियर ही बर्बाद कर दिया जाता था जैसे शैलेन्द्र सिंह के साथ हुआ। मुख्तार अंसारी के घर से लाइट मशीनगन बरामद करने का साहस दिखाने वाले पुलिस अधिकारी शैलेंद्र सिंह (पुलिस उपाधीक्षक) के ही विरूद्ध सत्ताधीशों ने षड्यंत्र रच दिया और उसे न सिर्फ जेल जाना पड़ा बल्कि सेवा से त्यागपत्र देना पड़ा।
अब आइए देखते हैं कि अतीक अहमद का आपराधिक और राजनीति ग्राफ किस तरह और किस दिशा में बढ़ा। इस साल 24 फरवरी को विधायक राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल की उनके पुलिस गार्ड के साथ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड को उसके 19 साल के बेटे असद ने अंजाम दिया था जो अब एसटीएफ के एनकाउण्टर में मारा जा चुका है। इसी मामले में पुलिस ने 25 फरवरी को अतीक अहमद, उनकी पत्नी साइस्ता परवीन, उनके दो बेटों, उनके छोटे भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।
लेकिन उमेश पाल की हत्या की कहानी अतीक के उत्थान से जुड़ी हुई है। इस कहानी की जड़ें पुरानी है। 2004 में प्रयागराज के फूलपुर से लोकसभा में चुने जाने के बाद उसकी विधायक की इलाहाबाद पश्चिम की सीट खाली हुई, जिस पर उसने अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़ाया। किन्तु अशरफ यह चुनाव बहुजन समाज पार्टी के राजू पाल से हार गया। इसका बदला लेने के लिए अतीक अहमद ने राजू पाल की हत्या करा दी। यह अतीक अहमद के आतंक और रसूख का ही नतीजा था कि एक विधायक पर सड़कों पर दौड़ाकर गोली मारी गयी और अतीक का बाल भी बांका नहीं हुआ।
लेकिन इस हत्याकांड का एक कांटा अतीक को हमेशा चुभता रहा जिसका नाम उमेश पाल था। उमेश पाल राजू पाल की हत्या का मुख्य गवाह था और जिस दिन अतीक के बेटे असद ने उमेश पाल की दिन दहाड़े हत्या की, उसने कहा कि आज वह 16 साल बाद चैन की नींद सोयेगा। उसने उस गवाह को ही रास्ते से हटा दिया जो उसके खिलाफ गवाही देता। ऐसे ही तरीकों से वह यहां तक पहुंचा जहां से उसका नाम ही आतंक का पर्याय था। लेकिन समय बदला तो उसका वही तरीका उसे भारी पड़ गया जिसके बल पर उसने इलाहाबाद ही नहीं यूपी में अपने अपराध का राज कायम किया था।
योगी सरकार ने विधानसभा में खड़े होकर सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि अतीक को मिट्टी में मिलाने का काम भी किया है। आज अतीक खुद इस बात को स्वीकार कर रहा है कि उसका सबकुछ खत्म हो गया है। उसका यह साम्राज्य कभी बनता ही नहीं अगर पहले के मुख्यमंत्रियों की राजनीतिक इच्छाशक्ति योगी जैसी रही होती।
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अपराधियों का राजनैतिक संरक्षण मात्र कानूनी या प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं। यह नैतिकता और शुचिता से जुड़ा प्रश्न है। कानून बनाकर काफी सीमा तक अपराधियों के राजनीति में प्रवेश और राजनैतिक संरक्षण को रोका जा सकता है किन्तु पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए मतदाता और राजनैतिक दल दोनों में इच्छाशक्ति और नैतिक बोध का होना आवश्यक है जो अपराधियों को बाहुबली बताकर उसे गले न लगाये और न ही उसके पैरों के नीचे रौंदा जाए।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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