Sonia Gandhi Article: इकोसिस्टम को 'सुप्रीम कमांडर' का संदेश

सोनिया गांधी ने 'द हिन्दू' अखबार में जो लेख लिखा है वह देश की जनता से संवाद के बजाय कांग्रेस इकोसिस्टम को जारी संदेश जैसा है। कांग्रेस के नेता ये बात क्यों नहीं समझ पा रहे कि इकोसिस्टम के आगे जहां और भी हैं?

Sonia Gandhi Article in the hindu message to the Congress ecosystem

Sonia Gandhi Article: राहुल गांधी भारत यात्रा पर गये तो कांग्रेस का इकोसिस्टम उनके साथ साथ गया। पूरी यात्रा के दौरान उनके आसपास सिर्फ सुरक्षा का घेरा ही नहीं था, कांग्रेस के उस इकोसिस्टम का घेरा भी लगातार बना रहा जिसका कांग्रेस के डूबने में बड़ा अहम किरदार है। इसमें एनजीओ बिरादरी, लेफ्ट लिबरल समूहों तथा कुछ खास मीडिया घरानों के लोग साथ साथ चले। अपनी पूरी यात्रा में राहुल गांधी अपनी उस कोटरी से बाहर निकल ही नहीं पाये जिससे दिल्ली में भी घिरे रहते हैं। अपनी पूरी यात्रा में वो अपने इकोसिस्टम से ही मिलते रहे, बात करते रहे और उन्हीं के सुझाये बयान देते रहे।

अब राहुल गांधी की संसद सदस्यता समाप्त होने के बाद पहली बार सोनिया गांधी ने एक लेख लिखकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। द हिन्दू अखबार के संपादकीय पेज पर 11 अप्रैल को लिखे लेख में उन्होंने केन्द्र की मोदी सरकार पर लगभग वही सारे आरोप लगाये हैं जो उनके बेटे राहुल गांधी लगाते आ रहे हैं। इनमें कुछ नया नहीं है। जैसे, मोदी सरकार बोलने नहीं दे रही है। वह लोकतंत्र के तीनों अंगों न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की स्वतंत्रता छीन रहे हैं। पत्रकारों और आंदोलनकारियों से बोलने की स्वतंत्रता छीन ली गयी है। न्यायपालिका पर कानून मंत्री द्वारा ही हमला किया जा रहा है। समुदाय विशेष को परेशान किया जा रहा है। हिन्दू अपना त्यौहार मनाने के बहाने समुदाय विशेष के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं, आदि आदि। ये सब कहते हुए आरएसएस की विचारधारा का उल्लेख करना भी वो नहीं भूली हैं।

राहुल गांधी का भाषण सुनते आ रहे भारत के लोगों के लिए एक दो बातों को छोड़कर सोनिया गांधी के लेख में कुछ नया नहीं है। ऐसा लगता है राहुल गांधी का भाषण लिखने वाला और सोनिया गांधी का यह लेख लिखने वाला कोई एक ही व्यक्ति होगा। या फिर इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कभी बहुरंगी विचारधाराओं वाली पार्टी अब एकरंगी हो गयी है। वह मॉइनॉरिटी, आरएसएस की विचारधारा, बोलने की आजादी जैसे कुछ खास शब्दों तक सिमटकर रह गयी है जिसे उसके नेता बार बार दोहराते रहते हैं। सोनिया गांधी ने अपने लेख में भी उन्हीं शब्दों को दोहरा दिया है।

असल में कांग्रेस के इतिहास में सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली सोनिया गांधी इस समय भले की कांग्रेस की अध्यक्ष न हों लेकिन कांग्रेस इकोसिस्टम की सुप्रीम कमांडर वही हैं। वरना क्या कारण था कि अपना लेख लिखने के लिए लेफ्ट वैचारिक झुकाव वाले "द हिन्दू" का चुनाव करतीं? लेख में भारत के लोगों की बात जरूर करती हैं लेकिन उनका संदेश अपने उसी इकोसिस्टम के लिए ही है।

आरएसएस और भाजपा के लोगों पर वो जो हिंसा करवाने का आरोप लगा रही हैं वो राजनीतिक रूप से वैसा ही है जैसे रामनवमी के मौके पर बंगाल और बिहार में हुई हिंसा का आरोप ममता बनर्जी और नीतीश कुमार ने भाजपा पर लगा दिया था। ये कोई नयी बात नहीं है। भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल लंबे समय से ऐसा ही करते आ रहे हैं। हिन्दुओं के ऊपर जब भी मुसलमानों द्वारा हमला किया जाता है भारत के सेकुलर दल अपने 'मुस्लिम वोटबैंक की हिंसा' का बचाव करने के लिए इसी तरह भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहरा देते हैं।

लेकिन जब से ये चलन शुरु हुआ है भाजपा को नुकसान होने की बजाय फायदा ही हुआ है। उसका कारण यह नहीं है कि लोग भाजपा और आरएसएस की कथित हिंसक विचारधारा का साथ दे रहे हैं। कारण यह है कि जब लोग अपनी खुली आंखों से सबकुछ देख रहे हैं उसके बाद भी कोई नेता ये बयान दे कि ये भाजपा और आरएसएस की साजिश है तो लोग स्वत: ऐसे झूठ की प्रतिक्रिया में भाजपा की ओर चले जाते हैं।

लेकिन भारत के कथित सेकुलर दलों को ये बात आज तक या तो समझ नहीं आयी या फिर उन्हें समझने नहीं दी गयी। हम यहां जिस कांग्रेस इकोसिस्टम की बात कर रहे हैं वह ऐसे झूठे नैरेटिव गढ़ने का मास्टरमाइंड है। उसमें एनजीओ, मीडिया का कुछ हिस्सा, बुद्धिजीवी, और न्यायपालिका में बैठे लोग भी शामिल हैं। इसलिए ऐसे लोग जैसा चाहते हैं वैसा माहौल बना देते हैं लेकिन आखिर में इनके झूठ का पर्दाफाश हो ही जाता है। रोहित वेमुला से लेकर अखलाक तक, डर के माहौल से लेकर शाहीन बाग और दिल्ली दंगों तक ऐसे ऐसे झूठे प्रपंच रचे गये कि मानों इस देश में दलित और मुस्लिम बहुत पीड़ित है।

लेकिन इन सब मामलों में इकोसिस्टम ने मात खायी और सच्चाई यही उभरकर सामने आयी कि मुस्लिम समुदाय भारत में पीड़ित नहीं है बल्कि वह खुद पीड़ा दे रहा है। दिल्ली दंगें हों या रामनवमी के जुलूसों पर पथराव मुस्लिम समुदाय आक्रामक रूप में ही दिखाई देता है। लेकिन इकोसिस्टम के तहत राजनीति करने वाले राजनीतिक दल कभी ऐसी सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते। बहुसंख्यक समुदाय को दोषी ठहराने का उन्होंने ऐसा झूठा महल खड़ा कर लिया है जिसे अपने से ढहाने का साहस उनके भीतर नहीं है।

राजनीतिक दल अपने वोटबैंक की भाषा भले बोलें लेकिन जनता तो सच झूठ जानती है। कांग्रेस के ऐतिहासिक पतन की साक्षी बनी सोनिया गांधी को चाहिए था कि कम से कम वो सच को स्वीकार करतीं। उन्हें समझना चाहिए कि झूठे आरोप लगाने से सच्चे संकट पर से ध्यान हट जाता है। अच्छा होता कि उनके लेख में जैसे उन्होंने बजट पर चर्चा न होने का उल्लेख किया है वैसे ही मंहगाई का भी जिक्र करती। भारत के वो वास्तविक मुद्दे जहां सरकार को घेरना चाहिए उसे छोड़कर तुष्टीकरण वाले मामले को ही बार बार उठाना उनके वोटबैंक का मुद्दा तो हो सकता है, आम जनता का नहीं। भारत की आम जनता जिन वास्तविक मुद्दों पर परेशान है उसका अपने लेख में उल्लेख करना भी उन्होंने जरूरी नहीं समझा।

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    सोनिया गांधी ने अपने लेख में वही लिखा जो उनके इकोसिस्टम ने माहौल बना रखा है। इससे तो कांग्रेस को कोई विशेष लाभ नहीं होगा, क्योंकि ऐसी ही झूठी बातों की प्रतिक्रिया में कांग्रेस का पतन हुआ है और देश ने नरेन्द्र मोदी को चुना है। अगर आज भी वो उन्हीं बातों के लिए मोदी को कसूरवार ठहरायेंगी तो 2024 का चुनाव भला कैसे जीत पायेंगी?

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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