Shyamji Krishna Varma: लंदन में 'इंडिया हाउस' बनानेवाले एक भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी
Shyamji Krishna Varma: आज एक ऐसे क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा की जयंती है जिनको लेकर नेहरूजी ने लिखा है कि 'उनके पास बहुत पैसा था, लेकिन ट्राम के पैसे भी बचाने के लिए वे पैदल चलना पसंद करते थे।' असल में 1927 में जेनेवा की यात्रा पर गए नेहरुजी की जब श्यामजी से मुलाकात हुई तो उन्होंने नेहरू से कहा था कि मेरी सारी सम्पत्ति से एक ट्रस्ट बना दो और तुम ट्रस्टी बन जाओ ताकि जो भारतीय विद्यार्थी विदेश में पढ़ना चाहते हैं, उनकी उससे मदद हो सके।
श्यामजी की पत्नी भी चाहती थी कि उनके धन से बने ट्रस्ट का उपयोग भारत की महिलाओं के कल्याण में हो। श्यामजी को यह शक था कि ब्रिटिश जासूस उनके पीछे लगे हैं, और उनकी हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। अंग्रेजों द्वारा श्यामजी की जासूसी के कारण नेहरूजी को ये डर था कि कहीं ट्रस्ट के धन में गड़बड़ी का आरोप लगाकर ब्रिटिश जासूस उन्हें फंसा न लें, इसलिए उन्होंने श्यामजी व उनकी पत्नी को ट्रस्ट बनाने में कोई मदद नहीं की।

आखिर श्यामजी कृष्ण वर्मा देश के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए इतना धन नेहरूजी के हवाले क्यों करना चाहते थे? क्यों ब्रिटिश जासूस उनके पीछे पड़े रहते थे? उनके द्वारा बनाया गया 'इंडिया हाउस' किस तरह से लंदन में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का केन्द्र बन गया था? इंग्लैंड में रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनका मन अंग्रेजों के प्रति कठोर क्यों हो गया?
श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात में कच्छ के मांडवी में हुआ था। पिता की जल्दी मृत्यु के बाद उनकी पढ़ाई मुंबई के विल्सन कॉलेज से हुई। संस्कृत से उनका नाता यहीं जुड़ा, जो बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाने के काम आया। स्वामी दयानंद सरस्वती से सम्पर्क होने के बाद वो उनके शिष्य बन गए। पूरे देश में श्यामजी ने उनकी शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए दौरे किए। यहां तक कि काशी में उनका भाषण सुनकर काशी के पंडितों ने उन्हें 'पंडित' की उपाधि दे दी। ऐसी उपाधि पाने वाले वो पहले गैर ब्राह्मण थे।
उसके बाद वो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने लंदन चले गए, जहां संस्कृत के प्रोफेसर मोनियर विलियम्स ने उन्हें अपना असिस्टेंट बना लिया। वहां से श्यामजी ने ग्रेजुएशन किया और एमए और बार एट लॉ ऑक्सफोर्ड से करने वाले वो पहले भारतीय बने। इस दौरान वो एशियाटिक सोसायटी के सदस्य बन गए। बर्लिन कांग्रेस ऑफ ओरियंटलिस्ट में भारत का प्रतिधित्व किया और सात साल लंदन रहने के बाद वो 1885 में भारत लौट आए।
भारत आकर उन्होंने बतौर वकील अपना काम शुरू किया। बहुत जल्द उनको रतलाम स्टेट का दीवान बना दिया गया। लेकिन तबियत खराब रहने के चलते उन्होंने वहां से विदा ले ली। उस दौर में उस छोटे से समय की नौकरी की ग्रेच्युटी उन्हें बत्तीस हजार रुपए मिली थी। उन्होंने अपनी रकम कॉटन के बिजनेस में लगा दी और खुद अपने गुरू स्वामी दयानंद के प्रिय शहर अजमेर में बस गए और बिटिश कोर्ट में प्रेक्टिस करने लगे। इसी दौरान वो दो साल तक उदयपुर स्टेट के काउंसिल मेम्बर भी रहे। फिर वो गुजरात में जूनागढ़ स्टेट के दीवान भी बने लेकिन एक ब्रिटिश एजेंट से इस कदर उनका झगड़ा हुआ कि ब्रिटिश सरकार के प्रति उनका मन नफरत से भर गया और उन्होंने इस नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया।
लोकमान्य तिलक उनके आदर्श थे। 1890 में 'एज ऑफ कंसेंट बिल' वाले विवाद में तिलक का उन्होंने जमकर साथ दिया। पुणे के प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या के केस में भी वो चापेकर बंधुओं का समर्थन करने से पीछे नहीं हटे। लेकिन उनको लग गया था कि देश में रहकर अंग्रेजों का विरोध करना आसान नहीं। इसलिए 1900 में उन्होंने लंदन के पॉश इलाके हाईगेट में एक मंहगा घर खरीदा और उसका नाम रखा 'इंडिया हाउस'।
फिर तो वो घर 'इंडिया हाउस' भारत से लंदन आने वाले क्रांतिकारियों की सराय बन गया। गांधी से लेकर भगत सिंह, लाला लाजपत राय से लेकर तिलक और गोखले भी इंडिया हाउस में रुके। एक बार तो लेनिन भी इस इंडिया हाउस में रुक चुके थे। इंडिया हाउस ने कई क्रांतिकारियों को शरण दीं जिनमें भीखाजी कामा, वीर सावरकर, मदन लाल ढींगरा, वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय आदि प्रमुख थे, बाद में इन शरण पानेवालों में लाला हरदयाल भी जुड़ गए। शुरुआत में 25 भारतीयों को उस इंडिया हाउस में बतौर हॉस्टल रुकने का ठिकाना दिया गया, जो वहां रहकर पढ़ रहे थे।
इसके साथ ही श्याम जी कृष्ण वर्मा ने 'इंडियन सोशियोलॉजिस्ट' नाम का अखबार शुरु किया, जिसकी कॉपियां पूरे यूरोप में भेजी जाती थीं। बाद में इंडियन होमरूल संगठन की भी स्थापना की। 'इंडियन सोशियोलॉजिस्ट' में उनके लिखे अंग्रेज सरकार विरोधी लेखों को लेकर श्यामजी अंग्रेजों के निशाने पर आ गए और साथ में उनका इंडिया हाउस भी। सीक्रेट सर्विस के एजेंट उन पर नजर रखने लगे। यहां तक कि उन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गईं।
इस कारण श्यामजी ने इंडिया हाउस की जिम्मेदारी वीर सावरकर को सौंपी और वो 1907 में पेरिस चले गए। हालांकि अंग्रेजी सरकार ने उनको वहां भी परेशान किया लेकिन श्याम जी ने कई फ्रांसीसी राजनेताओं से संपर्क बना लिया और वो वहीं से पूरे यूरोप के भारतीय क्रांतिकारियों को एकजुट करने, उनको मदद करने, कई भाषाओं में अखबार छपवाने आदि में मदद करने लगे। लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस के बीच एक सीक्रेट समझौते के चलते उन्होंने पेरिस को भी छोड़ना बेहतर समझा और वो प्रथम विश्व युद्ध से ठीक पहले स्विटजरलैंड की राजधानी जेनेवा के लिए निकल गए।
हालांकि वहां भी उन पर थोड़ी पाबंदियां थीं, फिर भी वो जितना हो सकता था, यूरोप में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों की मदद करते रहे। श्याम जी कृष्ण वर्मा को बाद में पता चला कि जिस प्रो-इंडिया कमेटी के प्रेसीडेंट डॉक्टर ब्रीस से वो सबसे ज्यादा बातचीत करते थे, वो एक ब्रिटिश सीक्रेट एजेंट था। इधर मदन लाल ढींगरा ने जैसे ही भारत सचिव वाइली की हत्या की, इंडिया हाउस अंग्रेजी सरकार के निशाने पर आ गया और 1910 में इसे बंद कर दिया गया।
ये अलग बात है कि आज इंडिया हाउस को श्यामजी के बजाय वीर सावरकर की वजह से ज्यादा जाना जाता है। आज लंदन के इंडिया हाउस की सामने की दीवार पर लिखा हआ है, "Veer Sawarkar- Indian Patriot and Philosopher lived here". लेकिन ये भी सच है कि अगर श्यामजी कृष्ण वर्मा नहीं होते तो इंडिया हाउस न होता और शायद सावरकर भी नहीं होते।
30 मार्च 1930 को रात के 11.30 बजे जेनेवा के एक हॉस्पिटल में भारत मां के इस सच्चे सपूत ने आखिरी सांस ली और उसकी मौत पर लाहौर की जेल में बंद भगत सिंह और उनके साथियों ने शोक सभा रखी, जबकि वो खुद भी कुछ ही दिनों के मेहमान थे। मरने से पहले उन्होंने जेनेवा की सेण्ट जॉर्जसीमेट्री में 100 साल तक अपनी अस्थियां सुरक्षित रखने की फीस भर दी थी। बाद में उनकी पत्नी का जब निधन हो गया तो उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं। उन्हें आशा थी कि जब भी देश स्वतंत्र होगा तो देशभक्त उनकी अस्थियां भारत ले जायेंगे।
इस घटना को 17 साल गुजर गए, 1947 में देश आजाद हो गया, लेकिन सत्ता में आए नेताओं को याद नहीं रहा कि श्यामजी की अस्थियों को भारत वापस लाना है। यूं ही 55 साल और गुजर गए, पीढियां बदल गईं लेकिन उनकी अस्थियों को भारत लाने के लिए कोई नहीं गया। 22 अगस्त 2003 को गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी ने यह बड़ा काम किया। जेनेवा की धरती से श्यामजी और उनकी पत्नी भानुमति की अस्थियां भारत मंगवाईं। मोदी मुंबई से उनके जन्मस्थान मांडवी तक भव्य जुलूस और राजकीय सम्मान के साथ उनका अस्थि कलश लेकर लाए थे।
इतना ही नहीं वर्मा के जन्म स्थान पर भव्य स्मारक क्रांति-तीर्थ बनाया। उसी क्रांति तीर्थ के परिसर के श्यामजी कृष्ण वर्मा कक्ष में उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखा गया। मोदी ने क्रांति तीर्थ को भी हूबहू बिलकुल वैसा ही बनाने की कोशिश किया जैसा कि श्याम जी कृष्ण वर्मा का लंदन में 'इंडिया हाउस' होता था। उसके बाहर पति पत्नी की मूर्तियां भी लगवाईं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज भी अधिकांश भारतीय इस महान देशभक्त और विद्वान के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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