Chinese intrusion in Tawang: लोहिया ने 73 साल पहले जताई थी तवांग में चीनी घुसपैठ की आशंका

तवांग में चीनी घुसपैठ की नापाक कोशिश को भारतीय सेना के रणबांकुरों ने नाकाम कर दिया। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि 73 साल पहले ही डॉ राम मनोहर लोहिया द्वारा चीनी घुसपैठ की आशंका जताई जा चुकी थी।

ram manohar Lohia had expressed apprehension of Chinese intrusion in Tawang 73 years ago

आज के अरूणाचल प्रदेश समेत तमाम इलाके 1972 तक अलग राज्य की बजाय एक ही केंद्र शासित प्रदेश का भाग थे, जिसका नाम था नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी नेफा। इसके रणनीतिकार थे पूर्व मिशनरी और बाद के दिनों में मानव शास्त्री के रूप में जाने गए वेरियर एल्विन। वेरियर एल्विन ने 'फिलॉसफी ऑफ नेफा' नाम से किताब भी लिखी थी।

पिछली सदी के पचास के दशक में जल्दी-जल्दी इसके दो संस्करण प्रकाशित हुए थे, जिसकी भूमिका प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी। वैसे तो व्यवहार में नेफा का प्रशासक असम का राज्यपाल होता था, लेकिन हकीकत में वह विदेश मंत्रालय के अधीन ऐसा स्वायत्त क्षेत्र था, जिसके प्रशासन की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नेहरू के विश्वासपात्र वेरियर एल्विन और केंद्र सरकार की ओर से तैनात अधिकारियों के पास थी। वेरियर एल्विन मानते थे कि यह इलाका भारत की मुख्य भूमि से कुछ अलग है और जनजातीय बहुल है। लिहाजा इस इलाके की संस्कृति से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।

उनकी इसी सोच का परिणाम था कि नेफा इलाके में जाने के लिए आम भारतीय को इनर लाइन परमिट लेनी पड़ती थी। यह व्यवस्था अरूणाचल प्रदेश के लिए अब भी जारी है। डॉक्टर लोहिया इस इनर लाइन परमिट व्यवस्था के साथ ही नेफा इलाके के लोगों से आम भारतीयों का मेलजोल बढ़ाने के समर्थक थे। उनका मानना था कि इससे नेफा इलाके के लोगों को भारत की मुख्य धारा से जुड़ने का मौका मिलेगा और भारतीयता की जो मुख्यधारा है, उसका नेफा इलाके में भी विस्तार होगा।

लेकिन वेरियर एल्विन इसके विरोधी थे। चूंकि वो प्रधानमंत्री नेहरू के जनजातीय मामलों के सलाहकार थे, लिहाजा प्रधानमंत्री आंख मूंदकर वेरियर के सुझावों पर ही भरोसा करते थे और उसी के अनुरूप फैसले लेते थे। इसका असर यह हुआ कि नेफा को सुरक्षित जंगल के तौर पर तब्दील कर दिया गया था। इसके बारे में लोहिया का कहना था कि नेफा के लोगों को ऐसे सुरक्षित वन में बंद कर दिया गया है, जैसे गिर के शेरों को किया गया है। लोहिया इस प्रवृत्ति के विरोधी थे। उनका मानना था कि अगर इसी तरह नेफा के लोगों को मुख्यधारा से काट दिया जाएगा तो चीन तिब्बत के रास्ते नेफा पर कब्जा कर लेगा।

15 जून 2020 को हुई गलवान की घटना के बाद अरूणाचल प्रदेश के सांसद तापीर गावो ने तवांग में ऐसी घुसपैठ की आशंका जताई थी। लोहिया की आशंका को तब की सरकार ने बार-बार नजरंदाज किया, लेकिन मौजूदा सरकार और सेना ऐसी नहीं है। शायद यही वजह है कि चीनी सेना की टुकड़ी को तवांग में भारतीय रणबांकुरों को पीठ दिखाकर भागना पड़ा।

नेफा पर साफ नहीं चीन की नीयत

दरअसल नेफा पर चीन की नीयत शुरू से ही साफ नहीं थी। वैसे यह भी जान लेना चाहिए कि भारत और तिब्बत के बीच 1912 तक कोई स्पष्ट सीमा रेखा नहीं थी। पहली बार 1912 में शिमला में भारत, तिब्बत और चीन के अधिकारियों की सीमा को लेकर बैठक हुई। इसी बीच तवांग में प्राचीन बौद्ध मंदिर मिला। तब इस सीमा रेखा को स्पष्ट करने की जरूरत महसूस हुई और 1914 में शिमला में हुई बैठक के बाद तिब्बत और भारत के बीच सीमा रेखा तय हुई। जिसे मैकमोहन लाइन कहा जाता है।

1949 में चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के बाद चीन के तत्कालीन नेता माओ ने तिब्बत पर हक जताना शुरू कर दिया। चीन वैसे भी अरसे से तिब्बत को स्वतंत्र या स्वायत्त नहीं मानता था। बहरहाल जब चीन ने तिब्बत पर हक जताना शुरू किया तो भारत ने उसके हक को सैद्धांतिक मान्यता दे दी। इससे जहां तिब्बत के धार्मिक शासक दलाई लामा समेत तिब्बतियों को निराशा हुई, वहीं चीन को इससे नैतिक बल मिल गया।

वैसे कम्युनिस्ट चीन को अप्रैल 1950 में मान्यता देने वाला पहला गैर कम्युनिस्ट राष्ट्र भारत ही था। तब भारतीय प्रधानमंत्री हिंदी-चीनी भाई-भाई के स्वप्न में डूबे थे। उन्हें चीन की कारस्तानियां नजर नहीं आ रही थीं। वे चीन के साथ पंचशील के सिद्धांत पर वैश्विक भाईचारा बनाने को लेकर कहीं ज्यादा प्रयासरत थे।

लेकिन चीन की नापाक चाल को तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल भांप रहे थे। उन्होंने तो चीन के मसले पर व्यापक विचार के लिए 7 नवंबर 1950 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कैबिनेट की बैठक बुलाने की मांग रखी थी। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने उसे अनदेखा कर दिया था। सरदार कुछ कर पाते, इसके पहले ही 15 दिसंबर 1950 को इस दुनिया से कूच कर गए।

प्रधानमंत्री नेहरू की चीन और तिब्बत नीति के साथ ही नेफा के लिए उनके सलाहकार वेरियर एल्विन की गतिविधियों पर डॉ. लोहिया कहीं ज्यादा गहरी निगाह लगाए बैठे थे। वे वेरियर एल्विन के सिद्धांत के घोर विरोधी थे। वे पूर्वांचल में जाने के लिए इनर लाइन परमिट व्यवस्था के भी कटु विरोधी थे।

डॉक्टर लोहिया का मानना था कि इनर लाइन परमिट व्यवस्था से नेफा के लोगों को मुख्यधारा से काटा जा रहा है। इसके लिए उन्होंने 23 नवंबर 1959 में इनर लाइन परमिट के बिना नेफा में घुसने की कोशिश की। उन्हें रोका गया तो एक बार फिर 27 नवंबर को उन्होंने नेफा में घुसने की कोशिश की। उन्हें तब भी गिरफ्तार कर लिया गया।

इस गिरफ्तारी से रिहाई के बाद लोहिया ने गुवाहाटी में कई सभाओं को संबोधित किया था। ऐसी ही एक सभा गुवाहाटी के प्रसिद्ध कॉटन कॉलेज में हुई थी। इसके बाद हुई चर्च मैदान की सभा में लोहिया ने कहा था कि भारत की फौजों और पुलिस को चीनी घुसपैठ को रोकना चाहिए, लेकिन वह भारतीयों को गिरफ्तार करने में जुटी है। इसी सभा में लोहिया ने यह भी कहा था कि अगर भारतीय फौजें उर्वशीयम के लोगों को इसी तरह मुख्यधारा से काटती रहेंगी तो तिब्बत के रास्ते उर्वशीयम चीन के कब्जे में चला जाएगा।

लोहिया नेफा को उर्वशीयम कहा करते थे। लोहिया ने अपने लेख 'हिंदुस्तान, चीन और तिब्बत: कांग्रेस व कम्युनिस्ट नीतियां' में उर्वशीयम की व्याख्या करते हुए लिखा है, "भूटान से सटे इलाके को आम तौर से पढ़े-लिखे लोग नेफा कहते हैं। क्योंकि अंग्रेजी शब्दों के जो पहले अक्षर हैं, नार्थ का एन, ईस्ट का ई, फ्रंटियर का एफ और एजेंसी का ए, इन चारों अक्षरों को मिलाकर उस इलाके का नाम पड़ा नेफा। यह न समझना कि यह मील-दो मील का इलाका है। तीस-चालीस हजार वर्ग मील का इलाका है।

लोहिया आगे कहते हैं "मैं नहीं कहता कि इसका नाम हिंदुस्तान की किसी एक जबान के शब्दों के अनुसार रखो। उस इलाके में जितने भी अफसर हैं, सरकारी नौकर हैं, उनकी पेटियां मैंने देखीं, झब्बे वगैरह देखे। उन सब पर लिखा भी रहता है, उत्तर पूर्व सीमांत अंचल। कितना बढ़िया नाम बन जाता है, उत्तर का उ ले लो, पूर्व का पहले का न लेकर...र्व ले लो, सीमांत से सी ले लो और अंचल का अम् ले लो, हो जाता उर्वसीयम्..रोज की जिंदगी में रंभा, मेनका, तिलोत्तमा से मुलाकात न हो सके, अपने मुल्क के एक हिस्से को उर्वसीयम कह तबियत कुछ खुश की ही जा सकती है। कितना बढ़िया नाम हो जाता है।"

यह विख्यात है कि रूक्मिणी, तिलोत्तमा, उर्वशी इसी भूमि की निवासी थी। लोहिया का तर्क था कि भारतीय संस्कृति की शोभा रही इन सुंदरियों की भूमि के लोगों को मुख्यधारा से काटना दरअसल संस्कृति से काटना है। वे मानते थे कि यही वजह है कि इस प्रदेश के लोग भारतीय मुख्यधारा से कट रहे हैं। उन्होंने एक जगह तर्क दिया है कि महाभारत में मणिपुर के धनुर्धरों ने हिस्सा लिया था और उसी मणिपुर के लोग अब भारत से अलग सोच रखते हैं तो इसकी वजह वेरियर एल्विन जैसे लोगों की सोच और नीतियां हैं।

उर्वशीयम अभियान के जरिए उन्होंने बार-बार तत्कालीन सरकार को आगाह किया। लेकिन उसे सरकार समझ नहीं पाई। जिसकी कीमत 1962 में भारत को अपनी 27 हजार वर्गमील जमीन चीनी आक्रमण के दौरान गंवाकर चुकानी पड़ी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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