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Rajasthan: राजे को राज या किसी और के सिर सजेगा ताज?

Rajasthan: राजस्थान में वसुंधरा राजे तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि उनका रास्ता आसान नहीं है। प्रदेश में मुख्यमंत्री पद को लेकर सस्पेंस खत्म जल्दी होनेवाला है, मगर जिस तरह से वे लगातार समर्थक विधायकों से मिल रही हैं, वह एक वरिष्ठ नेता होने के कारण वैसे तो एक सहज और सामान्य गतिविधि हैं, मगर यह भी संभव है कि वसुंधरा किसी अप्रत्याशित आपात स्थिति के लिए अपने कुनबे को संभालने में जुटी हुई हैं। बीजेपी की पहली कतार के ज्यादातर नेता उनके स्पष्ट विरोध में हैं। इसी वजह से श्रीमती राजे के लिए इस बार मुख्यमंत्री बनने का सवाल सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा हैं।

कायदे से देखा जाए, तो इस रण में राजे एकदम अकेली हैं, फिर भी लगातार जोर लगा रही हैं क्योंकि अगले एक - दो दिन में मुख्यमंत्री वे ही बनेंगी या कोई और, यह तय हो जाएगा। वसुंधरा राजे को जोर लगाते देखकर ही बीजेपी आलाकमान भी सधे हुए कदमों से चल रहा है। ऐसा पहली बार है कि राजस्थान विधानसभा के लिए पार्टी का नेता चुनने में बीजेपी को इतना वक्त लगा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान में बीजेपी का नेता चुनने के मामले को खुद देख रहे हैं, इसी कारण वे वक्त ले रहे हैं कि आखिर राजे की राजनीति का तोड़ क्या निकाला जाए।

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राजस्थान विधानसभा के लिए नव निर्वाचित बीजेपी सदस्यों के विधायक दल की बैठक के लिए पर्यवेक्षक जयपुर आ रहे हैं। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े और संसद सदस्य सुश्री सरोज पांडे मुख्यमंत्री के नाम पर विधायकों की राय जानेंगे और उनकी उपस्थिति में विधायक दल की बैठक में इस पर चर्चा भी होगी।

राजस्थान में मुख्यमंत्री पद के लिए जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें वसुंधरा राजे का नाम सबसे आगे है। उनके अलावा केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव जैसे नेताओं के नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है, लेकिन हर व्यक्ति का हर किसी से एक ही सवाल है कि कौन होगा मुख्यमंत्री? कयास तो ओम बिड़ला, अर्जुन मेघवाल, ओम माथुर, राजेंद्र राठौर, सीपी जोशी, किरोड़ीलाल मीणा, जैसे कुछ पुराने नेताओं के भी लगाए जा रहे हैं और राज्यवर्धन सिंह राठौर, दीया कुमारी, कैलाश चौधरी, बालकनाथ जैसे जूनियर नेताओं के भी चलाए जा रहे हैं। मगर, कौन बनेगा मुख्यमंत्री, इस सवाल का जवाब देश में केवल एक ही नेता जानता है और वह है नरेंद्र मोदी।

इस बीच राजस्थान की राजनीतिक फिजाएं बड़ी तेजी से अपने रंग बदल रही हैं। पहले जयपुर में तीन चार दिन तक अपने कई साथी व समर्थक विधायकों से लगातार मुलाकातों के बाद नई दिल्ली में जाकर अपनी पार्टी के केंद्रीय नेताओं से लंबी मुलाकातें कर चुकी वसुंधरा राजे जयपुर लौटकर बीजेपी के कई विधायकों से लगातार मिल रही हैं। विधायकों से मिलते रहने की उनकी कवायद ने राजनीतिक हवा में असमंजस के कई रंग एक साथ उछाल दिये हैं। किसी को लग रहा है कि वसुंधरा राजे इस तरह से बीजेपी की नेता चुनने की मुश्किलें और बढ़ा रही हैं, तो किसी को यह भी लग रहा है बहंत संभव है कि उनको हरी झंडी दे दी गई हो, इसीलिए वे मिल रही हैं।

हालांकि कुछ भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले मान रहे हैं कि वसुंधरा राजे यह सब अपने स्वभाव के हिसाब से ही करती जा रही हैं। खास बात यह है कि वे राजवंश की हैं, स्वभाव में उनके राज करना है और वे चाहती हैं कि हर हाल में तीसरी बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बन ही जाएं। इसी वजह से सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर राजे को राज नहीं मिला, तो राजस्थान में बीजेपी की राजनीति का क्या होगा?

सही मायने में देखा जाए, तो बीजेपी में मुख्यमंत्री पद के चयन को लेकर राजस्थान में संभवतया पहली बार इतना लंबा वक्त लग रहा है। हालांकि सन 2003 के विधानसभा चुनाव में तो पूरा चुनाव अभियान ही वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चलाया गया था और उसके बाद के वर्ष 2008, 2013 और 2018 के तीनों चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में हुए थे, इसलिए कोई असमंजस नहीं था। मगर, 2023 का यह चुनाव सार्वजनिक तौर पर कमल को चेहरा बताकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में लड़े जाने की वजह से वसुंधरा राजे के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर शंका के बादल गहराये हुए हैं।

मुख्यमंत्री बनने और न बनने पर न तो वसुंधरा राजे कुछ बोल रही हैं, और न ही उनके समर्थक बोल रहे हैं। चुप्पी वसुंधरा ने इस कदर ओढ़ रखी है कि कुछ भी समझना आसान नहीं है। लेकिन उनके चेहरे के भाव, उनका राजनीतिक स्वभाव और इन दिनों की उनकी राजनीतिक कवायद बहुत कुछ कह रही है। राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि वो जिस तरह से अपने समर्थक विधायकों से लगातार मिल रही हैं, और विधायक भी खुद आकर उनसे मिल रहे हैं, उससे लगता है कि वह पीछे हटने वाली नहीं हैं।

दरअसल, तीन दिन तक नई दिल्ली में रहने के बाद रविवार वसुंधरा राजे दिल्ली से जयपुर लौटी तो बीजेपी के कई विधायक सिविल लाइंस स्थित उनके सरकारी आवास पर मिलने पहुंचते रहे। दिन भर विधायकों का उनके घर पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। चुनाव जीतते ही लगातार तीन चार दिनों तक वे कई विधायकों से मिलीं और नई दिल्ली जाने तक मिलती रहीं।

बीजेपी आलाकमान के कड़े अनुशासन और सख्त रवैये को देखकर यह आशंका भी होती है कि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री शायद ही बनें, क्योंकि उनको लेकर आलाकमान के मन में कई तरह के असमंजस हैं। मगर फिर भी वसुंधरा राजे से लगातार विधायकों का मिलने जाते रहने का परिदृश्य कई नई कहानियां कह रहा है। इन कहानियों में सबसे ज्यादा जो कहानी कही जा रही है वह वसुंधरा राजे और कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की संकट में साथ देने की कहानी भी है। कांग्रेस के पास 69 विधायक हैं, निर्दलीय, बसपा व अन्य 15 हैं, जो कुल 84 होते हैं। सरकार बनाने के लिए केवल 101 विधायकों की जरूरत है। मतलब केवल 16 कम पड़ते हैं। बीजेपी में वसुंधरा समर्थकों की संख्या 47 के आसपास बतायी जा रही है। इसलिए इन तथ्यों को भी ध्यान में रखते हुए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बहुत सधे हुए और सतर्क कदमों से अपनी चाल चल रहा है।

हालात बेहद मुश्किल हैं और रास्ता उनसे भी ज्यादा कठिन, फिर वसुंधरा राजे का राजस्थान में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की जंग में बिल्कुल अकेले पड़ते जाना तो और नई मुश्किल है। माना यह भी जा रहा है कि छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश की तरह के आसान राजनीतिक हालात राजस्थान में नहीं है, इसलिए इस मुश्किल राह को सुलझाते हुए बीजेपी नेतृत्व कोई सर्वमान्य रास्ता निकालकर मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा कर सकती है। लेकिन जो वसुंधरा राजे को मान्य होगा वही सर्वमान्य रास्ता होगा, यह भी सभी जानते हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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