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POCSO and JJ Act: बच्चों पर 'गैंगरेप' का आरोप?

यूपी के गोंडा जिले से एक ऐसी खबर सुर्खियां बनी जिसे पढ़कर शरीर में सिहरन पैदा हो जाए। "5 साल की बच्ची से गैंगरेप।" एक तो पांच साल की अबोध बच्ची ऊपर से उसके साथ भी गैंगरेप। ऐसी दरिंदगी करनेवाले अमानुष भला कौन हो सकते हैं?

खबर में आगे जो बताया गया है वह इस गैंगरेप से भी अधिक चौंकानेवाला है। स्कूल पढ़ने गयी पांच साल की बच्ची से 8 और 10 साल के दो बच्चों ने "गैंगरेप" किया है। उन दोनों बच्चों के खिलाफ गैंगरेप के आरोप के साथ पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा भी दर्ज कर लिया गया है।

POCSO and JJ Act Children accused of gang rape

जो घटनाक्रम बताया गया है उसके अनुसार वह पांच साल की बच्ची स्कूल गयी थी, वहीं पर 8 और 10 साल के दो बच्चों ने उसके साथ तब गैंगरेप किया जब वह स्कूल के पिछवाड़े में गयी हुई थी। हेडिंग पढ़कर जो गुस्सा और क्षोभ उत्पन्न होता है पूरी खबर पढने के बाद वह बढ़ जाता है। अगला सवाल यही मन में उठता है कि आठ और दस साल के बच्चों का मन इतना विकृत कैसे हो सकता है कि वे एक बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसा घिनौना काम कर दें।

कानूनी रूप से हम अब इतने सजग हैं कि उन 8 और 10 साल के बच्चों पर 'बच्चों के साथ यौन व्यवहार' मानते हुए उनपर भी पोक्सो एक्ट लगा दिया। लेकिन यह घटना कानूनी पेचीदगी के साथ कई तरह के मनोवैज्ञानिक सवाल भी पैदा करती है। अगर इस घटना में यौनाचार करनेवाला कोई लड़का 13-14 साल से ऊपर होता तो एक बार को उसमें यौन इच्छा जागने की संभावना समझी जा सकती है। लेकिन 8-10 साल के बच्चों में भला कौनसी यौन विकृति उत्पन्न हो गयी जो उन्होंने अपने स्कूल में पढ़ने वाली एक मासूम बच्ची के साथ 'गलत काम' कर दिया?

आधुनिक साइंस भी इस बात को स्वीकार नहीं करता कि 8-10 साल के बच्चे में कोई यौन इच्छा पैदा हो सकती है। इस उम्र तक बच्चों के जननांग पूरी तरह से अविकसित होते हैं और उनमें ऐसा कोई हार्मोनल सेक्रेशन नहीं होता जिससे उनमें यौन इच्छा जागृत हो। लड़कियों में आमतौर पर 12 से 14 साल के बीच शारीरिक परिवर्तन होते हैं और लड़कों में 14 से 16 साल के बीच। जिस समय बच्चों में ये शारीरिक परिवर्तन हो रहे होते हैं उस समय संभव है उनमें कोई यौन इच्छा जाग जाए। लेकिन अगर ऐसा होता भी है तो यह अपरिपक्व इच्छा ही कही जाती है जिसमें 'भोगने की मानसिकता' से अधिक 'जानने की उत्सुकता' हो सकती है।

उसके पहले उनके भीतर किसी प्रकार की यौन इच्छा सामान्यतया होती नहीं है इसलिए पोक्सो एक्ट में न सिर्फ बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार को अपराध माना गया है बल्कि कम उम्र के बच्चों के साथ भी अगर कोई यौन दुर्व्यवहार करता है तो समान सजा का भागी बनता है, भले ही करने वाला पुरुष हो या स्त्री। लेकिन यहां तो मामला ही उलटा है। जिसकी ओर से आरोप लगा है वह तो अबोध है ही, जिन पर आरोप लगा है, वो भी बच्चे ही हैं। फिर भला ऐसी घटना को गैंगरेप कहकर प्रचारित करना, उन बच्चों पर पोक्सो एक्ट लगा देना कौन सी संवेदनशीलता और समझदारी को दिखाता है?

इसलिए यह घटना अपराध और कानून का मामला ही नहीं है। यह मनोविज्ञान का मामला है। अगर पांच साल की बच्ची यौन व्यवहार नहीं जानती तो आठ-दस साल का बच्चा भी यौन व्यवहार नहीं जानता। संभव है उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो और उसकी नकल करने का प्रयास किया हो। जैसा कि खबर में बताया भी गया है कि उन बच्चों ने कोई पोर्न मूवी देख ली थी। संभवत: उन्होंने जो देखा वही करने का प्रयास भी किया भले ही न तो उसके बारे में उन्हें कुछ पता था, और न ही उनका शरीर या मन उसके अनुरूप तैयार हुआ है।

तब सवाल यह उठता है कि इस घटना को गैंगरेप क्यों कहा गया? उन मासूम बच्चों पर भी पोक्सो एक्ट क्यों लगाया गया? यहां हम कह सकते हैं कि कानून की अपनी सीमाएं हैं। एक लाइन का कानून होता है जो सब पर समान रूप से लागू होता है। जिन लोगों ने ये कानून बनाये होंगे उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि पांच साल की बच्ची के साथ आठ साल के बच्चे द्वारा रेप का भी कोई केस कभी सामने आ सकता है। इसलिए कानून में ऐसे कोई सेफगार्ड मौजूद नहीं है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या किया जाए।

लेकिन सामाजिक रूप से और व्यक्तिगत रूप से भी यह गहन चिंतन का विषय होना ही चाहिए कि अगर कभी ऐसी परिस्थिति सामने आ जाए तो समाज और संबंधित परिवार द्वारा क्या किया चाहिए? कानून के प्रति बढती सजगता अच्छी बात है लेकिन इतने विविधतापूर्ण मानव समाज को सिर्फ एक कानून से चलाने का प्रयास एक प्रकार का कानूनी आतंक ही है जो जबर्दस्ती लोगों पर थोपा जाता है। अपराध का विश्लेषण हमेशा परिस्थितिजन्य होता है। लेकिन जब एक तय कानून से हर प्रकार की परिस्थिति का सरलीकरण कर देते हैं तो कानून समाधान नहीं बल्कि समस्या बन जाता है।

यौन अपराधों में तो अपराध निर्धारण अपने आप में बहुत जटिल होता है। 2013 में जब से यौन अपराधों को नियंत्रित करने के लिए कठोर कानूनों का प्रावधान किया गया है, इनके उपयोग के साथ दुरुपयोग का भी रिकार्ड बन रहा है। भारतीय समाज में सामाजिक रूप से भी यौन अपराधी को बहुत घृणित दृष्टि से देखा जाता है। अगर किसी पर आरोप भी लग जाए तो उसका चरित्र कलंकित हो जाता है। फिर सजा सुनवाई तो अपनी जगह लेकिन सिर्फ आरोप ही किसी का जीवन और कैरियर बर्बाद करने के लिए पर्याप्त होते हैं।

ऐसे में अब उसकी जद में इस तरह से बच्चों को लाना एक नये तरह के सामाजिक और व्यक्तिगत पतन की शुरुआत है। ऐसे मामलों में जहां वह अपराध प्राकृतिक रूप से हो ही नहीं सकता वहां कानूनी रूप से केस दर्ज कर लेना अपने आप में कानून का मजाक उड़ाने जैसा है। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि अब अबोध बच्चों को भी ऐसे आरोपों के घेरे में लिया जाने लगा है जिसकी सच्चाई चाहे जो हो लेकिन बर्बादी बच्चों की ही होती है।

ऐसी घटनाएं कानूनसाजों पर भी सवाल खड़ा करती हैं कि वो कितने सीमित दृष्टिकोण से कानून बनाते हैं और हर अवस्था के व्यक्ति पर उसे समान रूप से लागू भी कर देते हैं। देखना यह होगा कि अदालत में उस यौन अपराध के लिए उन बच्चों को दोषी कैसे करार दिया जाएगा जिसके लिए उनका शरीर और मन प्राकृतिक रूप से तैयार ही नहीं है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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