One Nation, One Uniform: बदलाव उतने ही हों कि संघवाद पर खतरा न लगे

पिछले दिनों एक बढिया खबर आई कि रक्षा मंत्रालय ने सेना की छावनियों के नाम बदलने के लिए सुझाव मांगे हैं। यह एक अच्छा कदम है, जिस तरह ब्रिटिश और मुगल काल में रखे गए शहरों और सडकों के नाम बदले जा रहे हैं।

इंडिया गेट के पास जार्ज पंचम की मूर्ति उतारने के बाद खाली पड़ी छतरी में सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा लगाई गई। अंगरेजी दासता के प्रतीक किंग्स-वे (राजपथ) को नरेंद्र मोदी ने कर्तव्य पथ रख कर आज़ादी का एहसास करवाया है।
उससे पहले कांग्रेस सरकार ने भी कनॉट प्लेस का नाम बदल कर राजीव चौक किया। मोरारजी के समय विलिंगटन अस्पताल का नाम राम मनोहर लोहिया अस्पताल हुआ। या कुछ वर्ष पूर्व औरंगजेब रोड का नाम बदल कर डा. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखा गया है।
हालांकि गुलामी की प्रतीक तुगलक रोड, लोदी रोड, बाबर रोड, हुमाऊँ रोड, शाहजहां रोड, औरंगजेब लेन अभी भी मौजूद हैं।
इलाहाबाद को दुबारा से प्रयागराज नाम दिया गया। काशी को बनारस कर दिया गया था, लेकिन वरुणा नदी और अस्सी घाट के बीच बसे होने के कारण अब उस का नाम वाराणसी रख दिया गया है। मुम्बई को अंग्रेजों ने बॉम्बे कर दिया था, जिसे दुबारा से मुंबा देवी के नाम पर मुम्बई किया गया है। कलकत्ता को नया नाम कोलकाता दिया गया। मद्रास को चेन्नई बनाया गया।
दिलचस्प यह है कि जहां मुगलों ने जानबूझ कर हिन्दू नामों को हटा कर मुस्लिम नाम किए थे, वहीं अंग्रेजों ने सिर्फ नई इमारतों या सडकों के नाम अंग्रेज शासकों के नाम पर रखे, या फिर कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जहां अंग्रेजों को नाम उच्चारण में मुश्किल आई, तो उन्होंने अपनी सुविधा के अनुसार उच्चारण किया। जैसे श्यामला शिमला हो गया, तिरुअनंतपुरम त्रिवेन्द्रम हो गया था, कान्हापुर कानपुर हो गया था।
लेकिन अब जो पहल रक्षा मंत्रालय ने की है, वह बहुत ही काबिल-ए-तारीफ़ है। रक्षा मंत्रालय ने ब्रिटिश काल के छावनी क्षेत्रों, छावनी क्षेत्रों की सड़कों, स्कूलों , संस्थानों और शहर आदि के नाम बदलने के सुझाव मांगे हैं। क्योंकि ज्यादातर छावनियों के नाम अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों के नाम पर रख दिए थे, जो जस के तस चल रहे थे।
जैसे उत्तराखंड में एक बहुत ही खूबसूरत जगह है लैंसडाउन, यहाँ आर्मी की छावनी है। लैंसडाउन का पुराना नाम कालौं का डांडा था, जब 1886 में गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना हुई थी। उस वक्त तक लैंसडाउन का नाम कालौं का डांडा ही था। 1890 में अंग्रेजों ने वायसराय लार्ड लैंसडौन के नाम पर इस छावनी का नाम बदल कर लैंसडाउन रख दिया था। रक्षा मंत्रालय की पहल पर लैंसडाउन छावनी ने नाम बदलने पर सहमति दे दी है। नए नाम का सुझाव कालौं का डांडा ही है।
आज़ादी के अमृतमहोत्सव में आज़ादी का एहसास जरूरी है, इसलिए अंग्रेजों के जमाने के नामों और परंपराओं में बदलाव जरूरी है, लेकिन जरूरी नहीं कि सरकार की हर बात से सहमत हुआ जाए। जैसे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुझाव दे दिया है कि सारे देश में सभी राज्यों के पुलिसकर्मियों की एक वर्दी होनी चाहिए।
स्वाभाविक है कि राज्य इसे स्वीकार नहीं करेंगे। हर राज्य की पुलिस यूनिफार्म का अपना इतिहास है, फिर हर राज्य में अलग अलग मौसम के अनुसार यूनिफार्म तैयार की जाती है, ताकि पुलिसकर्मियों को काम करने में दिक्कत न आए। पुलिस की खाकी वर्दी का इतिहास भी ब्रिटिश काल से जुड़ा है।
अंग्रेजी शासन के दौरान जब पुलिस की शुरुआत हुई तो शुरू में ब्रिटिश पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी पहले सादे कपड़े पहनकर ही काम करते थे। लेकिन कुछ समय बाद ही उनके लिए सफेद वर्दी तय की गई। लेकिन इस वर्दी के साथ एक परेशानी थी, वह जल्दी मैली हो जाती थी, दाग भी पड़ जाते थे। पुलिस कर्मचारी अपनी वर्दी की गंदगी छुपाने के लिए उसे अलग-अलग रंगों में रंगने लगे। जिसकी वजह से पुलिसवालों की वर्दी कई रंगों में दिखने लगी।
सन् 1847 में ब्रिटिश अधिकारी सर हैरी लम्सडेन की सलाह पर पुलिस की वर्दी को हल्के पीले और भूरे रंग के साथ रंगा गया। फिर चाय की पत्ती, पानी का इस्तेमाल किया गया और फिर कॉटन फेब्रिक कलर को डाई की तरह बनाकर वर्दी पर लगाया। जिसकी वजह से उसका रंग खाकी हो गया।
यह मैंने इस लिए बताया कि जब सारे देश में खाकी रंग किया जा रहा था, तो बहुत सारी जगहों पर इस पर एतराज भी हुआ। जैसे कोलकाता में सभी पुलिस वाले आज भी सफेद वर्दी पहनते है। इसी तरह गोवा और पुदुच्चेरी में भी सफेद वर्दी है। इसके अलावा कई राज्यों में यातायात पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी भी सफेद वर्दी पहनते हैं, मध्यप्रदेश और दिल्ली की ट्रेफिक पुलिस की वर्दी भी सफेद ही है। इसी तरह उप्र और बिहार पुलिस लाल रंग की टोपी पहनती है। वहीं पंजाब पुलिस में टोपी की जगह पगड़ी पहनी जाती है।
असल में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सारे देश की पुलिस के लिए एक ड्रेस कोड और राज्य पुलिस की जगह टैग "भारतीय पुलिस" नाम देने की कल्पना की थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनआईडी को यूनिफॉर्म डिजाइन करने की जिम्मेदारी भी दे दी थी। एनआईडी ने कुछ देशों की ड्रेस पर रिसर्च भी किया।
योजना यह थी कि केंद्रीय गृह विभाग ड्रेस की डिजाइन फाइनल करने के बाद सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और डीजीपी की बैठक बुलाएगा। राजनाथ सिंह के गृह मंत्री रहते ही मोदी सरकार ने इस संबंध में राज्यों से सुझाव मांगे थे, लेकिन क़ानून व्यवस्था राज्यों का मामला है, इसलिए राज्यों को लगता है कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की शुरुआत है। इसलिए अधिकाँश राज्यों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को फिर से उठाया है। 28 अक्टूबर को सूरजकुंड में राज्यों के गृह मंत्रियों के चिंतन शिविर को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि "एक राष्ट्र, एक वर्दी" होनी चाहिए।
हालाँकि, वह जानते हैं कि यह विवाद का विषय है, इसलिए उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह उनका सुझाव है और इसे राज्यों पर थोपने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इस चिंतन शिविर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों के गृह सचिव और पुलिस महानिदेशकों के साथ-साथ केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और केन्द्रीय पुलिस संगठनों के महानिदेशक भी मौजूद थे। स्वाभाविक है कि मोदी के इस बयान पर अब तीखी प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि क्षेत्रीय दल राज्यों पर केंद्र के बढ़ते प्रभाव को संघवाद पर खतरे के रूप में देख रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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