Supreme Court on Delhi: संसद से बड़ा दिखना चाहता है सुप्रीमकोर्ट?

Supreme Court on Delhi: 1991 में संविधान में उनसठवां संशोधन करके अनुच्छेद 239 में 239एए जोड़ा गया था| यह संशोधन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को एक विधानसभा देने के लिए था| दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया था, केंद्र शासित राज्य कहा गया था और अनुच्छेद 239एए (3) में कहा गया है कि इस संदर्भ में संसद कभी भी कोई भी कानून बना सकती है| संसद को विधान सभा के बनाए कानून में कुछ जोड़ने, संशोधित करने, बदलने या निरस्त करने का अधिकार भी होगा| 239एए (7) में भी कहा गया है संसद क़ानून के माध्यम से मौजूदा प्रावधानों में कोई प्रावधान जोड़ सकती है|

केंद्र सरकार ने इन्हीं प्रावधानों के अंतर्गत 20 मई को एक अध्यादेश जारी किया, इस अध्यादेश का मूल मुद्दा यह था कि दिल्ली में नियुक्त 'दानिक्स' कैडर के 'ग्रुप-ए' अधिकारियों के तबादले और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए 'राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण' गठित किया जाएगा| दानिक्स में दिल्ली, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दमन एंड दीव, दादरा एंड नागर हवेली सिविल सर्विसेस आते हैं|

Parliament vs supreme court over delhi ordinance

केंद्र सरकार ने संविधान में मिले अधिकार के अंतर्गत ही क़ानून में संशोधन किया है, लेकिन दिली सरकार ने केंद्र सरकार के अध्यादेश को चुनौती दी कि यह सुप्रीमकोर्ट के फैसले को बदलने के लिए लाया गया अध्यादेश है| सुप्रीमकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने इसे संविधान में संशोधन मान कर पांच सदस्यीय पीठ को सौंप दिया है| जिससे केंद्र सरकार और सुप्रीमकोर्ट के बीच एक बार फिर टकराव शुरू होने की आशंका पैदा हो गई है| ऐसी उम्मीद तो केजरीवाल सरकार को भी नहीं रही होगी कि चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय पीठ अध्यादेश को संविधान संशोधन मान लेगी|

संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है, और एक-आध दिन में सरकार अध्यादेश की जगह पर बिल पेश कर देगी, लेकिन अब स्थिति यह पैदा हो गई है कि अगर सुप्रीमकोर्ट इसे संविधान संशोधन मान रही है, तो सरकार के सामने मुश्किल खड़ी होगी| लेकिन सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई कोई एक दिन में तो नहीं जाएगी, इसमें साल भर भी लग सकता है, इसलिए सरकार फिलहाल इसे सामान्य बिल के रूप में पास करवाएगी| जो सरकार के लिए मुश्किल नहीं होगा|

Parliament vs supreme court over delhi ordinance

भले ही राज्यसभा में सरकार को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं है, फिर भी सरकार को इस बिल के संसद में पास होने में कोई आशंका नहीं है| लोकसभा में तो दो-तिहाई के अंतर से बिल पास होगा, लेकिन राज्यसभा में जुगाड़ करना पड़ेगा। वैसे सरकार ने जुगाड़ कर लेने के बाद ही अध्यादेश जारी किया होगा| राज्यसभा में भाजपा के खुद के 5 मनोनीत सदस्यों समेत 97 सदस्य हैं, और 10 सहयोगी दलों के 13 सदस्य हैं|

इस तरह मौजूदा 237 के सदन में एनडीए के 110 सांसद हैं, बिल पास करवाने के लिए उसे सिर्फ 9 अन्य सदस्यों का समर्थन चाहिए| तटस्थ 29 सदस्यों में से भारत राष्ट्र समिति के सात सदस्यों को छोड़कर बाकी सभी 22 भाजपा के संपर्क में हैं। वाईएसआर कांग्रेस के 9, बीजू जनता दल के 9, और टीडीपी, बसपा, जेडीएस और एसडीएफ के एक एक सदस्य अगर बिल के समर्थन में वोट न भी दें, वे तटस्थता बनाए रखने के लिए अनुपस्थित ही हो जाएं, या मतदान में हिस्सा ही न लें, तब भी बिल पास हो जाएगा| इन सभी के मतदान में हिस्सा नहीं लेने से सदन की प्रभावी संख्या 215 रह जाएगी, जबकि एनडीए के अपने सदस्यों की संख्या 110 है, जो सदन में बहुमत के लिए वांछित 108 से 2 ज्यादा है| वैसे किसी भी बिल पर मतदान के समय सौ फीसदी हाजिरी बहुत कम होती है|

बिल का प्रारूप अभी सामने नहीं आया है| अध्यादेश में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में जिस प्राधिकरण को बनाने की बात कही गई है, उसमें कहा गया है कि प्राधिकरण को 'ग्रुप ए के सभी और दानिक्‍स के अधिकारियों के तबादलों, नियुक्तियों से जुड़े फैसले लेने का हक़ तो होगा, लेकिन आख़िरी मुहर उपराज्यपाल की होगी| यानी अगर उपराज्यपाल को प्राधिकरण का लिया फैसला ठीक नहीं लगा तो वह उसे बदलाव के लिए वापस लौटा सकते हैं| फिर भी अगर मतभेद जारी रहता है तो अंतिम फैसला उपराज्यपाल का ही होगा|

केंद्र सरकार ने यह अध्यादेश सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के फैसले के कारण जारी किया था। सुप्रीमकोर्ट के 11 मई के फैसले में अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया था| आम आदमी पार्टी का कहना है कि सरकार ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने के लिए अध्यादेश जारी किया। क्या सरकार को सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने का अधिकार है? कांग्रेस भी आम आदमी पार्टी का साथ दे रही है, जिसने शाहबानो केस में सुप्रीमकोर्ट का फैसला बदलने के लिए संसद से क़ानून पारित किया था|

आम आदमी पार्टी सरकार ने अध्यादेश को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है| सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड भी केजरीवाल सरकार से सहमत लगते हैं कि केंद्र सरकार को सुप्रीमकोर्ट का फैसला बदलने का अधिकार नहीं| जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड केशवानंद भारती केस के फैसले को हू-ब-हू लागू करना चाहते हैं कि संसद सर्वोच्च नहीं है, सुप्रीमकोर्ट सर्वोच्च है|

सुप्रीमकोर्ट ने ईडी के डायरेक्टर को क़ानून में संशोधन करके तीसरी बार दिए गए सेवा विस्तार को रद्द कर दिया था, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले में उनके दूसरे सेवा विस्तार को अंतिम बताया था| पहले के नियम में 60 साल की उम्र में रिटायर होने पर दो साल तक का सेवा विस्तार दिए जाने का प्रावधान था, जिसे सरकार ने संशोधित करके पांच साल कर दिया था| सुप्रीमकोर्ट ने इसे अपने पूर्व फैसले को बदलने के लिए किया गया संशोधन माना| हालांकि सुप्रीमकोर्ट के जज खुद 65 साल की उम्र में रिटायर होते हैं, और उसके बाद भी कई प्राधिकरणों में अगले पांच साल तक मलाईदार पद पाने का कानूनी प्रावधान करवाए हुए हैं|

एक सवाल यह उठाया जा रहा है कि अध्यादेश के मुताबिक़ बनाए गए प्राधिकरण के किसी फैसले पर अगर उपराज्यपाल सहमत नहीं है, तो उसे वह प्राधिकरण को लौटा देंगे, लेकिन प्राधिकरण फिर भी अपने फैसले पर अडा रहता है, तो उपराज्यपाल का फैसला ही अंतिम होगा, प्राधिकरण का नहीं| यह सवाल जायज है, लेकिन यह प्रावधान हू-ब-हू कोलिजियम सिस्टम के प्रावधानों जैसा है, जिसे कोलिजियम ने खुद बनाया है कि उन्हीं का फैसला अंतिम है, सरकार उसे एक बार वापस लौटा सकती है, दूसरी बार नहीं| राष्ट्रपति को उन्हीं के फैसले पर दस्तखत करने पड़ेंगे, भले ही चुनी हुई सरकार उससे सहमत हो या न हो|

11 मई को सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में खुद लिखा था, उनका फैसला किसी क़ानून के अभाव के कारण दिया जा रहा है| 239एए (3) 239 (7) में मिले अधिकार के अलावा इस आधार पर भी केंद्र सरकार को अध्यादेश जारी करके क़ानून बनाने का अधिकार था| कायदे से दिल्ली सरकार की याचिका खारिज कर देनी चाहिए थी| गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार पर राष्ट्रीय राजधानी को 'पंगु' बनाने और सतर्कता विभाग के अफसरों को परेशान करने का आरोप लगाते हुए दिल्ली सरकार की याचिका खारिज करने की मांग की थी|

लेकिन चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड ने केंद्र सरकार के अध्यादेश को सुप्रीमकोर्ट की इज्जत का सवाल बना लिया है, इसलिए 17 जुलाई को पहली सुनवाई में उन्होंने कहा कि क्या केंद्र सरकार सुप्रीमकोर्ट के फैसले को पलट सकती है? हैरानी यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने भी 17 जुलाई को सुनवाई के समय कहा कि सरकार ने पहली बार 239एए (3) और 239एए (7) का इस्तेमाल किया है, एक तरफ से यह संविधान में संशोधन किया गया है, सुप्रीमकोर्ट देखेगी क्या सरकार को इसका अधिकार है|

संविधान के अनुच्छेद 239एए में जब संसद को क़ानून बनाने का अधिकार पहले से दिया गया है, तो यह संविधान संशोधन कैसे हुआ| चीफ जस्टिस ने अध्यादेश के खिलाफ याचिका को फिर से पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंपने का इरादा जता दिया था| सरकार ने संसद में अभी बिल पेश नहीं किया है| लेकिन सुनवाई के दौरान ही याचिका का नेचर बदल जाएगा, क्योंकि तब तक संसद से बिल पास होकर बाकायदा कानून बन चुका होगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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