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Pakistan Elections: रात के अंधेरे में पाक सुप्रीम कोर्ट का एक और ‘काला’ फैसला

Pakistan Elections: पाकिस्तान के न्यायाधीश अभी तक एक प्रधानमंत्री और एक राष्ट्रपति को मौत की सजा, एक प्रधानमंत्री को आजीवन चुनाव से वंचित करने की सजा और दो अन्य प्रधानमंत्रियों को पद से उतारने की सजा दे चुके हैं।

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इनके अलावा दर्जनों नेता और मंत्रियों को भी सलाखों के पीछे पहुंचा चुके हैं। इसी परंपरा को जारी रखते हुए शनिवार रात इमरान खान से उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह "बल्ला" छीन लिया।

शनिवार को पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में तहरीक ए इंसाफ के चुनाव चिन्ह क्रिकेट बैट को लेकर मैराथन सुनवाई हुई और देर रात को हुए फैसले में पीटीआई से बल्ला छीन लिया गया। मुख्य न्यायाधीश काजी फ़ैज़ ईसा, जज मुहम्मद अली मज़हर और जज मुसर्रत हिलाली की तीन सदस्यीय पीठ ने पाकिस्तानी समय रात 11:15 बजे फैसला सुनाया, जिसे पाकिस्तान न्यायपालिका का एक और काला फैसला कहा जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश काजी फ़ैज़ ईसा ने अपने फैसले में कहा कि राजनीतिक दल के भीतर और आम चुनाव दोनों में यदि वोट देने का अधिकार छीन लिया जाए तो इससे अधिनायकवाद को बढ़ावा मिलेगा और तानाशाही हो जाएगी। इमरान खान की पार्टी पीटीआई पर आंतरिक चुनाव में गड़बड़ी करने के आरोप में चुनाव आयोग ने बल्ले के निशान को जब्त कर लिया था। पीटीआई ने उस फैसले के खिलाफ पेशावर हाई कोर्ट में अपील दायर की और वहाँ से जीत भी गई। लेकिन पाकिस्तान का चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिसने अंतिम रूप से बल्ले को चुनाव चिन्ह के रूप में पीटीआई से वापस लेने के आयोग के फैसले को सही ठहरा दिया।

पेशावर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि चुनाव आयोग अंतर-पार्टी चुनावों पर सवाल नहीं उठा सकता, क्योंकि यह मामला इलेक्शन कमीशन ऑफ पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं आता। 1973 के संविधान संशोधन में यह सुनिश्चित किया गया है कि पाकिस्तान में प्रत्येक नागरिक को पाकिस्तान की संप्रभुता या अखंडता के हित में राजनीतिक दल बनाने या उसका सदस्य बनने का अधिकार है।

जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव अधिनियम 2017 की धारा 209 के तहत, एक राजनीतिक दल इंट्रा पार्टी चुनाव के सात दिनों के भीतर ईसीपी के पास पदाधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रमाण पत्र जमा करने के लिए बाध्य है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आंतरिक चुनाव राजनीतिक दल के संविधान के अनुसार ही आयोजित किए गए।

अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार के पतन के बाद से ही पीटीआई के लिए राजनीतिक स्थिति बहुत उतार चढ़ाव वाली हो गई है। पीटीआई और सेना के बीच भारी मतभेद है। 9 मई 2023 को पाकिस्तान में जबर्दस्त हिंसा हुई, जब उस दिन अदालत परिसर से इमरान खान की अनुचित तरीके से गिरफ्तारी हुई। पीटीआई समर्थकों ने उसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन किए। गुस्साए पुरुष और महिलाएं सड़कों पर उतर आए और सुरक्षा बलों के प्रतिष्ठानों में खूब तोड़ फोड़ मचाई। उसके बाद से सेना गुस्से में है। हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनमें से सैकड़ों अभी भी जेल में हैं।

9 मई की हिंसा के बाद से ही पीटीआई को चुनाव से बाहर करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। पहले पीटीआई में ही विभाजन कराया गया। पाकिस्तान के बड़े उद्योगपति जहांगीर तरीन ने इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी बनाकर पीटीआई के कई दिग्गजों को उसमें शामिल करा लिया। पूर्व रक्षा मंत्री परवेज़ खट्टक ने भी ऐसा ही किया। फौज और पुलिस के डर से इमरान खान के नेताओं ने डूबते जहाज से कूद कर भागना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने राजनीति से ही तौबा कर ली। इस बीच, पीएमएल-एन के सबसे बड़े नेता मियां नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान वापसी हो गई है, जो बीमारी का बहाना बनाकर 2019 में लंदन भाग गए थे।

अब बदले हुए पाकिस्तान में सबकुछ मियां नवाज शरीफ के मुताबिक हो रहा है। उनकी सभी कानूनी परेशानियों को एक एक कर दूर कर दिया गया है। उन पर लगे आजीवन प्रतिबंध को भी उठा लिया गया है। पाकिस्तान के इसी सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 62(1)(एफ) के तहत आजीवन अयोग्यता के अपने पिछले पिछले फैसले को भी उलट दिया है।

पाकिस्तानी मीडिया में इस बात की अब खुल कर चर्चा हो रही है कि आम चुनाव से महज कुछ हफ्ते पहले, सुप्रीम कोर्ट ने ईसीपी के फैसले का समर्थन कर जनता को अपनी पसंद की पार्टियों और राजनीतिक नेताओं को वोट देने के उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया है। लोग यहां तक कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे लोकप्रिय पार्टियों में से एक पीटीआई को तकनीकी आधार पर अब चुनाव से ही बाहर कर दिया है।

पीटीआई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का यह भी मतलब निकाला जा रहा है कि आगामी चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होगा। चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। आलोचक यह दलील दे रहे हैं कि आयोग पीटीआई के संविधान पर जितनी बारीकी से ध्यान दे रहा है यदि इतनी ही गंभीरता से पाकिस्तान के संविधान पर विचार किया होता तो देश आज बहुत आगे होता। हालांकि लोग पीटीआई को भी दोषी ठहरा रहे हैं। लोगों ने यह महसूस किया कि पीटीआई के वकीलों ने मुकदमे की तैयारी ठीक से नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के सवालों का जवाब भी प्रभावी ढंग से नहीं दे सके।

पीटीआई के बल्ले पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पाकिस्तानी मीडिया किसी बड़े संकट के आगाज के रूप मे देख रही है। पाकिस्तान टुडे अखबार लिखता है - "हालाँकि पाकिस्तान इस तरह की राजनीतिक कैद से अछूता नहीं है, बांग्लादेशी चुनावों के नतीजे हमें एक परिदृश्य की कल्पना देते हैं कि एक महीने के भीतर पाकिस्तान में क्या हो सकता है। पीटीआई के असमंजस में होने के कारण चुनाव के पूर्ण बहिष्कार का आह्वान नहीं हो रहा है। लेकिन एक प्रमुख पार्टी के निष्क्रिय होने से परिणामों की भविष्यवाणी करना कठिन नहीं है।"

"चुनाव नजदीक आते ही ये विषय पाकिस्तान के लिए बेहद प्रासंगिक हो गए हैं। क्या हमारे यहां भी बांग्लादेश की तरह कम मतदान होगा? नामांकन पत्रों की अस्वीकृति निश्चित रूप से निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है। पाकिस्तान का चुनाव आयोग बुरी तरह से पिट चुका है। पाकिस्तान में चुनाव हमेशा अनिश्चितता से घिरे रहते हैं, यहां तक कि सामान्य परिस्थितियों में भी। बांग्लादेश के अनुभव को देखते हुए, एक बात निश्चित है कि दक्षिण एशिया के दो प्रमुख इस्लामिक देशों में लोकतांत्रिक मॉडल अभी भी परिपक्व नहीं हुआ है।"

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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