Origin of Islam: क्या इस्लाम की शुरुआत भारत में हुई और 'ॐ' 'अल्लाह' एक हैं?
जमीयत उलेमा ए हिन्द के मुखिया महमूद मदनी ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि इस्लाम की शुरुआत भारत से हुई। अब अरशद मदनी ने उसी सम्मेलन में कहा है कि ॐ और अल्लाह एक हैं। मदनी परिवार के इन मनगढंत दावों का आधार क्या है?

Origin of Islam: दिल्ली में आयोजित जमीयत उलेमा ए हिन्द के सम्मेलन में भारतीय प्रतीकों को इस्लामिक प्रतीक बताकर इस पर दावा करने की मुहिम रविवार को भी जारी रही। रविवार को जमीयत उलेमा ए हिन्द के एक धड़े से मुखिया अरशद मदनी ने दावा किया कि अल्लाह असल में ॐ है। जब राम, कृष्ण शिव कोई नहीं था, तब जिस ॐ की पूजा होती थी, वही अल्लाह है।
अरशद मदनी इस्लाम को नहीं जानते ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जानबूझकर उन्होंने इस्लामिक सिद्धांतों के ही खिलाफ बोला है। अल्लाह का अभी तक जब इस्लाम में ही कोई स्वरूप निर्धारित नहीं हो सका है कि वह साकार है या निराकार तो किसी ध्वनि से उसकी तुलना कैसे कर सकते हैं? ध्वनियां नाद होती हैं और नाद का तो आकार भी होता है। नाद एक वर्तुल निर्मित करते हैं जो सूक्ष्म रूप में एक आकार ग्रहण करते हैं।
अगर हम अल्लाह को एक शब्द के रूप में भी देखें तो यह अरबी का नहीं बल्कि हिब्रू का शब्द है। हिब्रू में अल्लाह का मतलब होता है सम्मानजनक बूढी महिला। संयोग से संस्कृत के अल्ला शब्द का अर्थ भी ठीक यही होता है सम्मानजनक वरिष्ठ महिला। अब अरबी में पहुंचकर ये अल्लाह शब्द मेल गॉड कैसे बन गया, ये अलग शोध का विषय है।
ऐसे में ॐ से अल्लाह की तुलना करना न सिर्फ ॐ का अपमान है बल्कि इस्लामिक अल्लाह की भी तौहीन है। हालांकि जानबूझकर बोले गये इस बेसिर पैर के झूठ के विरोध में मंच पर मौजूद जैन संत लोकेश मुनि ने मदनी की इस 'फालतू की बकवास' का मुंहतोड़ जवाब दिया और मंच छोड़कर चले गये।
लेकिन ऐसी फालतू की बकवास कोई पहली बार नहीं हो रही है। कोई ज्यादा समय नहीं बीता जब 'काबा में तेरा जलवा, काशी में नजारा है।' सुनाया जाता था। काबा के 'जलवा' और काशी के 'नजारा' वाली थ्योरी के जरिए बहुत महीन तरीके से यही बताने की कोशिश की गयी कि अल्लाह और ईश्वर एक ही है। हिन्दुओं के लिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। वह ऐसे एकेश्वरवाद की धारणा में जीता है जिसके नाना रूप और नाम हैं। लेकिन मुसलमानों की ओर से किया जाने वाला यह दावा इस्लाम के ही खिलाफ था। अल्लाह को किसी और गॉड या ईश्वर के समतुल्य बताना 'ला इलाह इल्लल्लाह' के बुनियादी इस्लामिक सिद्धांत के ही खिलाफ चला जाता है।
संभवत: इसीलिए महमूद मदनी और मदनी चाचा भतीजा द्वारा ऐसे कुतर्क किये जा रहे हैं जिससे कहा जा सके कि इस्लाम की शुरुआत ही भारत से हुई है। अरशद मदनी से पहले उनके भतीजे महमूद मदनी ने इस्लाम को भारत से शुरु होनेवाला धर्म कहा है, उसके मूल में यह है कि उनके अल्लाह की ओर से आदम हिन्द में उतारे गये थे। अब क्योंकि आदम हिन्द में उतारे गये इसलिए महमूद मदनी ने कहा है कि इस्लाम की शुरुआत भारत से हुई है।
अव्वल तो आदम का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है। आदम का उल्लेख ओल्ड टेस्टामेन्ट में आता है। जेनेसिस 1.27, 2.7 में आदम को पहला मनुष्य माना गया है। इसी को इस्लाम में कॉपी किया गया लेकिन आदम को लेकर इस्लाम में कई मनगढंत कहानियां भी बनायी गयीं। इन मनगढंत कहानियों का आधार तेरहवीं सदी में लिखी इब्न ए कतीर की तफ्सीर है जिसमें वो लिखते हैं कि उन्होंने ऐसा सुना है कि आदम हिन्द में उतारे गये थे। इब्ने कतीर लिखते हैं कि "अल सादी ने बताया कि अल्लाह ने आदम से कहा कि जन्नत से निकल जाओ तो वो धरती पर आ गये। आदम हिन्द में आये। वो अपने साथ कुछ खुशबूवाले पत्ते तथा काला पत्थर लेकर आये थे।"
इब्न कतीर की इस कहानी को मुसलमान स्कॉलर ही मनगढंत मानते हैं और इसे कोई महत्व नहीं देते। 2017 में सऊदी अरब से एक फतवा जारी किया गया था जिसमें इस कहानी को प्रामाणिक मानने से इंकार कर दिया गया था। कोई भी मुस्लिम स्कॉलर इसे सच मानने को तैयार नहीं है कि आदम हिन्द में उतारे गये थे। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार कुरान (2.36) ये तो बताती है कि आदम धरती पर उतारे गये लेकिन कहां उतारे गये इसके बारे में कुरान मौन है।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि इब्न कतीर जिस हिन्द का जिक्र कर रहे हैं उसका मतलब भारत होने का कोई प्रमाण नहीं है। हां, अरब के कबीलों में हिन्द नाम जरूर प्रचलित था और अबू सूफियान की बीवी का नाम हिन्द-बिन-उतबा था। अरबी में हिन्द शब्द का उल्लेख रियासत के तौर पर भी आता है। उस जमाने में जिसके पास ऊंटों की एक निश्चित संख्या (संभवत: 40) होती थी उसे हिन्द की उपाधि दे दी जाती थी।
यहां एक बात समझने की है कि अगर छठी सातवीं सदी में सऊदी अरब में हिन्द नाम का उल्लेख आता है तो यह थ्योरी अपने आप गलत साबित हो जाती है कि हिन्द का मतलब भारत से है। इसलिए अगर इब्ने कतीर की तेरहवीं सदी में गढी गयी कहानी को सही मान भी लें तो उस समय इस्लाम में जिस हिन्द का जिक्र आता है उसका मतलब भारत है, सबसे पहले यह प्रमाणित करना पड़ेगा।
यही कारण है कि इस्लामिक जगत में ऐसी थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया जाता है कि इस्लाम वाले आदम वर्तमान भारत में कहीं आये थे। आदम से जुड़ी एक और थ्योरी है जिसके मुताबिक कुछ ईसाई और मुसलमान श्रीलंका के त्रिकूट पर्वत को 'एडम्स पीक' कहते हैं। श्रीलंका के त्रिकूट पर्वत पर एक बड़े से पैर का निशान है जिसके बारे में हिन्दू मानते हैं कि ये शिव के पैरों का निशान हैं। बौद्ध मानते हैं कि ये बुद्ध का निशान है क्योंकि बुद्ध ने यहां स्वयं आकर उपदेश किया था। ईसाई मानते हैं कि यह सेंट थॉमस के पैरों का निशान है जो ईसाइयत को लेकर श्रीलंका आये थे जबकि कुछ मुसलमानों का मानना है कि इब्ने कतीर ने आदम के हिन्द में उतरने का जो जिक्र किया है, वो यही पर्वत है। इस पर्वत पर पैरों का निशान भी आदम के पैरों का ही है।
हालांकि इस श्रीलंका वाली थ्योरी को भी मुस्लिम स्कॉलर आधाहीन और मनगढंत मानते हैं फिर भी क्योंकि भारत में मदनी जैसे लोगों को अपना इस्लाम फैलाना है और लोगों को भ्रमित करना है इसलिए वो किसी भी झूठ का सहारा लेने में तनिक नहीं हिचकते हैं। आदम कहां आये या कहां नहीं आये ऐसी मनगढंत कहानी पर यकीन करने से पहले सबसे बड़ा बुनियादी सवाल तो यह है कि आदम से इस्लाम का रिश्ता क्या है?
इस्लाम कोई अब्राहमिक परंपरा का रिलीजन नहीं है। इस्लाम को गढनेवाले ये दावा जरूर करते हैं लेकिन दूसरी ओर के यहूदी या ईसाई इस क्लेम को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। क्योंकि आठवीं सदी में इस्लाम को सबसे अधिक प्रामाणिक होने की जरूरत थी इसलिए उन्होंने यहूदियों और ईसाईयों की परंपरा, मान्यताओं और कहानियों को अपने यहां शामिल कर लिया। इसी को इस्लाम बना दिया गया। इसी में कहीं न कहीं आदम और हव्वा की कहानी भी आकर शामिल हो गयी ताकि इस्लाम भी अपने आप को ईसाइयत या यहूदियों जैसा पुराना मजहब साबित कर सके।
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अब मदनी परिवार उसे एक कदम और आगे ले जाकर सनातन धर्म से जोड़ रहा है ताकि वो इस्लाम को सनातन धर्म से भी पुराना साबित कर सकें। हालांकि वो जिन तथ्यों के सहारे ये दावे कर रहे हैं उन तथ्यों का ही कोई आधार नहीं है। ये बात मदनी भी समझते हैं और उनकी देओबंदी जमात भी। यही कारण है कि उन्होंने रामलीला मैदान में जो प्रस्ताव पारित किये उसमें एक चिंता एक्स मुस्लिम मूवमेन्ट को लेकर भी है। भारत में भी अब पढ़े लिखे समझदार मुसलमान इस्लाम की उन्हीं झूठी कहानियों के कारण इस्लाम छोड़ रहे हैं जिसकी वकालत मदनी परिवार रामलीला मैदान में खड़ा होकर कर रहा है।
यह भी पढ़ें: Madani on Islam: क्या भारत का सबसे प्राचीन धर्म इस्लाम है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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