Old Pension Scheme: पुरानी बनाम नई पेंशन स्कीम पर केन्द्र और राज्य में क्यों हो रहा है टकराव?
पुरानी बनाम नई पेंशन स्कीम को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों में टकराव की नौबत आ गई है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे यह विवाद तूल पकड़ता जाएगा। केन्द्र और राज्य सरकार के बीच मची खींचतान में कर्मचारी पिस रहे हैं।

Old Pension Scheme: हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने सरकार आने पर पहली ही कैबिनेट बैठक में ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करने की घोषणा की थी। हिमाचल में कांग्रेस की जीत के पीछे ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) को लागू करना एक बड़ा कारण माना गया। राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत भी सरकारी कर्मचारियों के एकमुश्त वोट की गांरटी मान कर राजस्थान में ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू कर चुके हैं।
गौरतलब है कि राजस्थान में इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं। राजस्थान सरकार के ऐलान के साथ ही देशभर में इसकी मांग कर रहे सरकारी कर्मचारियों और नेताओं के हौसले बुलंद है और गैर भाजपाई पार्टियां इसे सियासी मुद्दा बनाने में जुट गई हैं।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 23 फरवरी 2022 को अपने चौथे बजट में एलान किया था कि राज्य की कांग्रेस सरकार एनपीएस को छोड़कर अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना लागू कर देगी। गहलोत ने ओपीएस का लाभ 2022 से नहीं बल्कि 2023 से दिए जाने का ऐलान किया था। गहलोत ने इस घोषणा के जरिए सवा सात लाख कर्मचारी और उनके परिवारों को एक झटके में साधने की चाल चल विरोधी नेताओं के माथे पर बल ला दिया।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पुरानी पेंशन बहाली से गहलोत सरकार पर ज्यादा अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं आने वाला है क्योंकि 2004 में नियुक्त हुए कर्मचारी 2030 के बाद ही सेवानिवृत्त होंगे। हालांकि राजस्थान के वित्त विभाग का मानना है कि ओपीएस से सालाना 19 हजार करोड़ रूपये का भार आएगा, जिसमें हर साल 10 फीसदी की बढ़ोतरी भी होगी।
हिमाचल में पुरानी पेशन लागू करने के नाम पर सत्ता में वापसी और राजस्थान में इसके दम पर सरकार में वापस लौटने की प्रबल संभावना ने दूसरे राज्यों में भी इसकी मांग से केन्द्र सरकार के सामने संकट खड़ा कर दिया है। भूपिन्दर सिंह हुडा हरियाणा में, कमलनाथ मध्यप्रदेश में सत्ता में आने पर ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू करने का वादा कर रहे हैं। कर्नाटक में भाजपा के विधायकों का भी कहना है कि राज्य में ओपीएस लागू होना चाहिए क्योकि एनपीएस (न्यू पेंशन स्कीम) कथित लाभ देने में विफल रहा है। एक तरफ ओल्ड पेंशन स्कीम जहां सरकारी कर्मचारियों के लिए अपने भविष्य को सुरक्षित करने का मामला है, वहीं नेताओं के लिए राजनीतिक पूंजी बनाने का मौका है।
गहलोत की घोषणा ने दूसरे राज्यों में ओपीएस के लिए आंदोलनरत कर्मचारियों को उत्साह से भर दिया है। देशभर के 77 लाख सरकारी कर्मचारियों के हौसले बुलंद हो गए, इसमें अगर केन्द्र और राज्यों के कॉर्पोरेट और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी और एनपीएस स्वावलंबन के कार्मिकों को शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या डेढ़ करोड़ से ज्यादा है।
न्यू पेंशन स्कीम को 2004 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय पेंशन योजना के रूप में पेश किया था। 1 जनवरी 2004 से केन्द्र सरकार में सभी नए कर्मचारियों के लिए सेना को छोड़कर नयी पेंशन योजना में शामिल होना अनिवार्य हो गया था। 2004 मेे मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार आई तो एनपीएस का मामला जोर शोर से उठा। तब इस बात से ज्यादातर सांसद सहमत थे कि नई स्कीम के तहत कर्मचारियों को मिलने वाली पेंशन नाकाफी होगी। कांग्रेस का मानना था कि कर्मचारियों को अच्छी पेंशन देने के लिए यह जरूरी है कि उनके पेंशन के अंशदान को शेयर बाजार में लगाया जाए।
ऐसे में नई पेंशन के सुधारों के लिए 2005 में पेंशन कोष नियामक एवं विकास प्राधिकरण विधेयक लाया गया। लेकिन यूपीए सरकार के कम्युनिस्ट सहयोगियों ने यह कह कर अडंगा लगा दिया कि कर्मचारियों का पैसा सिर्फ सरकारी बांड में ही लगाया जाए। बिल आठ साल तक संसद में लटका रहा। लेकिन जाते जाते मनमोहन सरकार ने इस कानून को 2013 में पारित करा लिया। इसमें कहा गया न्यू पेंशन स्कीम के तहत हर कर्मचारी के पास एक व्यक्तिगत पेंशन खाता होगा, जो नौकरी में बदलाव के लिए पोर्टेबल होगा। कर्मचारियों को छूट दी गई कि वे पेंशन के लिए जमा हो रहा अपना पैसा सरकार को ऋण प्रतिभूति में निवेश करने का विकल्प दे या शेयर बाजार में। एक तरह से सरकार ने निवेश का सारा जोखिम कर्मचारियों के मत्थे पर डाल दिया।
इस नई स्कीम के तहत पहली बार सरकारी कर्मचारियों के वेतन का हर महीने दस फीसद अंशदान पेंशन के नाम पर कटने लगा। सरकार भी कर्मचारी के पेंशन खाते में अपना 14 फीसद अंशदान जमा करने लगी। इस तरह नए कर्मचारी के पेंशन फंड में 24 फीसदी हिस्सा जमा होने लगा। जबकि पुरानी पेंशन व्यवस्था में पेंशन के नाम पर कर्मचारी का कोई पैसा नहीं कटता था, और उसके सेवानिवृत्त होने पर उसे एक तय एकमुश्त पेंशन रकम यानी अंतिम वेतन की बेसिक तनख्वाह के 50 फीसद की गारंटी थी। जबकि नई पेंशन में तय पेंशन जैसी कोई गांरटी नहीं रही। अब तक पश्चिम बंगाल को छोड़कर सभी राज्य एनपीएस में शामिल हो चुके हैं।
सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन की मांग देशभर में कर रहे हैं। हिमाचल में कांग्रेस, झारखंड में सोरेन 'एनपीएस है केवल टेंशन, लौटा दो पुरानी पेंशन' के नारे के साथ सत्ता में लौटे थे। आंध्र प्रदेश में भी मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने पुरानी पेंशन को लागू करने का वादा कर सत्ता प्राप्त की थी। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि जल्द ही वह पुरानी पेंशन को लागू करने को लेकर फैसला लेंगे। मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने भी सत्ता में आने पर पुरानी पेंशन लागू करने का वादा किया है।
ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर केन्द्र और गैर भाजपा शासित राज्य सरकारें आमने-सामने है। भाजपा शासित राज्य सरकारें भी एनपीएस पर कर्मचारियों का विरोध देखकर उनकी नाराजगी मोल लेना नहीं चाहती और अंदरखाने में ओल्ड पेंशन स्कीम का समर्थन कर रही हैं, लेकिन खुलकर बोलने से बच रही हैं। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की मांग कर्मचारी कर रहे हैं।
अशोक गहलोत की मांग को सिरे से खारिज करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि राज्य सरकार ने जनवरी 2004 में अपने कार्मिकों के लिए एनपीएस का विकल्प चुना था। 2010 में प्रदेश- एनपीएस ट्रस्ट के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसमें प्रावधान है कि राज्य सरकार पीएफआरडीए/ एनपीएस ट्रस्ट के सभी निर्देशों का अनुपालन करेगी। पीएफआरडीए अधिनियम राज्य सरकार को जमा राशि या उस पर रिटर्न के प्रबंध की मंजूरी नहीं देता। यह राशि कर्मचारी की है, इसलिए नियोक्ता को नहीं लौटा सकते।
राजस्थान के मुख्यमंत्री की मांग पर केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने साफ कह दिया है कि यह मांग नाजायज है और केन्द्र सरकार इसे पूरा नहीं कर सकती। हालांकि 2018 की कैग रिपोर्ट में कहा गया कि प्लानिंग-इम्प्लीमेंट के स्तर पर सामाजिक- आर्थिक सुरक्षा देने में एनपीएस विफल है। 2021 में नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन ने इसके रिव्यू के लिए कमेटी बनाने की मांग की।
विपक्ष अशोक गहलोत पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगा रहा है, लेकिन अशोक गहलोत का साफ कहना है कि राजनैतिक लाभ राजकोषीय विवेक से ज्यादा अहम है। गहलोत सरकार ने पिछले साढे तीन साल में 91 हजार करोड़ रुपये का कर्जा लिया है। अब राज्य सरकार पर 4 लाख 77 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्जा हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का कहना है कि प्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ रहा है। वित्तीय प्रबंधन लगातार गड़बड़ा रहा है।
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ऐसे में पुरानी बनाम नई पेंशन स्कीम को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों में टकराव की नौबत आ गई है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे यह विवाद तूल पकड़ता जाएगा। फिलहाल केन्द्र और राज्य सरकार के बीच मची खींचतान में कर्मचारी अधरझूल में हैं। कर्मचारियों को अपना भविष्य अंधकार में लग रहा है और वे इसका समाधान जल्द चाहते हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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