Opposition Alliance: कांग्रेस और इंडी एलायंस सबक लेने को तैयार नहीं
पांच विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद हुए एक ओपिनियन पोल के नतीजे चौंकाने वाले हैं। इस ओपिनियन पोल में कहा गया है कि लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सीटें बढ़ेंगी, और कांग्रेस अपनी मौजूदा सीटों पर ही बनी रह सकती है, या ज्यादा से ज्यादा 20 सीटें बढ़ेंगी। यह ओपिनियन पोल इंडी एलायंस के लिए बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि इंडी एलायंस के सारे घटक दल 100 से 125 तक सीटों में निपट रहे हैं।
विधानसभा चुनावों से पहले इसी एजेंसी के ओपिनियन पोल में भाजपा की सीटें ज्यादा से ज्यादा 296 तक और एनडीए की सीटें 326 तक बताई गई थीं, और इंडी एलायंस की सीटें 190 तक बताई गई थीं। इसका मतलब यह है कि तृणमूल कांग्रेस-ममता, द्रमुक-स्टालिन, शिवसेना-उद्धव, एनसीपी-शरद, जेडीयू-नीतीश, राजद-लालू, सपा-अखिलेश आदि के लिए खतरे की घंटी है। आज चुनाव होते हैं तो इन सभी दलों की सीटें घटेंगी।

विधानसभा चुनावों से पहले जो लोग भविष्यवाणी कर रहे थे कि भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा होने से भाजपा की हार निश्चित है, उन्होंने अब उस तरह की भविष्यवाणियां करना फिलहाल बंद कर दिया है। भाजपा तो इन चुनावों को सेमीफाइनल मानती ही नहीं थी, इंडी एलायंस ही इन चुनावों को सेमीफाइनल बता रहा था। नतीजों के बाद इंडी एलायंस के नेता भी मानने लगे हैं कि इन चुनाव नतीजों से भाजपा को बूस्ट मिला है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम तक ने कहा है कि हिन्दी हार्टलैंड के तीनों राज्यों में कांग्रेस की इतनी करारी हार की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। इसका मतलब यह है कि कांग्रेस जमीनी हकीकत को समझ ही नहीं रही थी। इन नतीजों से निराश पी. चिदंबरम यथार्थवादी हो कर कह रहे हैं कि भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने पर भी 2024 में उसे नहीं हराया जा सकता। ओपिनियन पोल को हमेशा नकारने वाले पी.चिदंबरम ने अब माना है कि हवा भाजपा के पक्ष में बह रही है।

आखिर क्या कारण है कि चुनावों से सिर्फ चार महीने पहले हवा सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में बह रही है। विपक्ष को अपनी चुनावी रणनीति बनाने से पहले उन पहलूओं पर सोचना चाहिए। पी. चिदंबरम ने उन तीन कारणों की तरफ इशारा किया है, जिनके कारण हवा भाजपा की तरफ बह रही है। सबसे पहला विषय है भाजपा का अति राष्ट्रवाद, दूसरा है भाजपा का चुनावों को गंभीरता से लड़ना और तीसरा है भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति।
भले ही पी. चिदंबरम ने अति राष्ट्रवाद को नकारात्मक रूप से चिन्हित किया है, लेकिन देश इसे भाजपा के सकारात्मक पक्ष के रूप में देखता है। अति राष्ट्रवाद की आलोचना कांग्रेस को बड़ी महंगी पड़ेगी, लेकिन कांग्रेस के ज्यादातर नेता वामपंथियों और कट्टरवादी मुसलमानों से प्रभावित हो कर राष्ट्रवाद को एक बुराई के रूप में देखते हैं। वामपंथी और देवबंदी राष्ट्रवाद की अवधारणा के ही खिलाफ है, इन दोनों वर्गों की आस्था का केंद्र देश से बाहर है। इसलिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को राष्ट्रवाद पर आत्ममंथन करना पड़ेगा।
सुप्रीमकोर्ट ने रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला देते हुए मस्जिद बनाने के लिए सरकार को पांच एकड़ जमीन देने का आदेश भी सुनाया था। सरकार ने जमीन अलॉट भी कर दी थी, अब जब मस्जिद निर्माण के लिए नींव पत्थर रखने की बात चल रही है, तो (वहाबिज्म में विश्वास रखने वाले) देवबंदी मुस्लिमों के प्रभाव वाले सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मक्का मज्जिद के इमाम (मक्का पर वहाबियों का नियन्त्रण है) से नींव पत्थर रखवाना तय किया है। उन्होंने किसी भारतीय इमाम को नींव पत्थर रखने लिए उपर्युक्त नहीं माना। जबकि बरेलवी मुस्लिम मक्का के इमाम से नींव पत्थर रखवाने के खिलाफ हैं।
बरेलवी मुसलमान राष्ट्रवाद में विश्वास रखते हैं, इसलिए उनका कहना है कि जिस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामजन्मभूमि मन्दिर का नींव पत्थर रखा है, उसी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही मस्जिद की नींव का पत्थर रखवाया जाना चाहिए। तो यह कहना भी गलत होगा कि भारत के सारे मुसलमान राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं रखते, लेकिन कांग्रेस और विपक्षी दलों की आस्था देवबंदी विचारधारा में है।
कांग्रेस ने भारतीय मुसलमानों को राष्ट्रवाद की धारा में लाने की बजाए, खुद ही अपनी धारा बदल ली। आज़ादी के बाद राष्ट्रवाद ही कांग्रेस की सबसे बड़ी पूंजी थी, लेकिन भाजपा ने कांग्रेस की इसी पूंजी को उससे छीन लिया है। जैसे राष्ट्रवाद के कारण कांग्रेस की जड़ें जमी हुई थीं, वैसे ही भाजपा की जड़ें जम गई हैं। इसलिए चिदंबरम ने तो मान लिया है कि 2024 में विपक्ष मोदी को नहीं हरा सकता। क्योंकि भाजपा चुनाव को आख़िरी चुनाव समझ कर लडती है, और कांग्रेस चुनाव को गंभीरता से लड़ ही नहीं पाती।
छोटी छोटी घटनाएं कभी कभी चुनाव की दिशा और दशा बदल देती हैं। राहुल गांधी ने राजस्थान के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पनौती कह दिया था। मोदी क्रिकेट का मैच राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करने के लिए देखने गए थे, भारत हार गया, तो राहुल गांधी ने मोदी को ही पनौती कह दिया। राहुल गांधी चुनाव को गंभीरता से लड़ रहे होते, तो पनौती वाली टिप्पणी करने से पहले सोचते कि लोग इसका क्या अर्थ निकालेंगे।
मोदी देश की जनता के साथ जुड़ चुके हैं, जनता के दिमाग से मोदी को निकालने के लिए कांग्रेस को नकारात्मक राजनीति छोड़ कर सकारात्मक राजनीति करनी होगी। लेकिन हैरानी यह है कि कांग्रेस देश के मिजाज को समझ ही नहीं रही है। देश का मिजाज 370 के खिलाफ था, कांग्रेस ने उसे नहीं पहचाना, बल्कि उसे हटाए जाने के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट तक लड़ने वालों का साथ दिया।
चिदंबरम जैसे नेता अभी भी भाजपा के राष्ट्रवाद को कांग्रेस की समस्या के रूप में देख रहे हैं। हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण का मुद्दा भी इसी से जुड़ा है, वह इससे अलग नहीं है। ध्रुवीकरण के लिए भाजपा जिम्मेदार नहीं है, जैसे कांग्रेस ने राष्ट्रवाद छोड़कर भाजपा को थमा दिया, उसी तरह ध्रुवीकरण का मुद्दा भी कांग्रेस ने खुद भाजपा को थमाया है। कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण न करती तो भारत का हिन्दू उसी तरह कांग्रेस को वोट करता रहता, जैसे 1952 से लेकर 1984 तक कर रहा था। देश के हिन्दुओं ने 2004 में एक बार फिर मौक़ा दिया था, लेकिन उस मौके को भी कांग्रेस ने तुष्टिकरण से गंवा दिया।
2014 का चुनाव हारने के बाद ए.के. एंटनी अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस की हार के कारणों में सबसे बड़ा कारण मुस्लिम तुष्टिकरण को बता चुके हैं। इसलिए चिदंबरम का यह कहना कि कांग्रेस और विपक्षी दलों को भाजपा के ध्रुवीकरण की काट ढूंढनी होगी, सच्चाई को नकारने का एक ओर प्रयास है। ध्रुवीकरण का हल कांग्रेस के पास ही है, 2018 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जब राहुल गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण छोड़ने के संकेत दिए थे, तो हिन्दुओं ने भी उन्हें बेहतर सीटें देकर फिर से गले लगाने के संकेत दे दिए थे। लेकिन कांग्रेस खुद सबक लेने को तैयार नहीं।
पी. चिदंबरम चौथा कारण भी गिना देते तो अच्छा रहता कि विपक्ष अपनी स्तरहीन राजनीति के कारण जनता में विश्वास खोता जा रहा है। उन्होंने भाजपा की जीत के कारण तो गिना दिए, लेकिन विपक्ष खासकर कांग्रेस की हार के कारण नहीं गिनाए। वह कारण है विपक्षी दलों के नेताओं का संसद के भीतर स्तरहीन व्यवहार। ऐसा व्यवहार जो राजनीत के अनाड़ी ही कर सकते हैं। जिन्हें समाज में बन रही अपनी छवि की चिंता नहीं होती।
13 दिसंबर को लोकसभा में दहशत पैदा करने की जो घटना हुई, विपक्ष उस पर भी परिपक्वता और गंभीरता नहीं दिखा सका। पहले भी एक दर्जन बार से ज्यादा ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। खुद कांग्रेस के शासनकाल में ऐसी घटनाएं हुई हैं, लेकिन न पहले कभी इसे राजनीति का विषय बनाया गया था, न अब बनाया जाना चाहिए था। विपक्ष ने विधानसभा चुनाव नतीजों से भी कोई सबक नहीं सीखा कि जनता में उसकी कैसी छवि बन रही है।
पिछले छह दिनों से दोनों सदनों में इस मांग के लिए हंगामा हो रहा है कि गृहमंत्री आकर बयान दें। सरकार भी अड़ी हुई है कि संसद भवन परिसर गृह मंत्रालय के अधीन नहीं आता, पहले भी कभी गृहमंत्री ने बयान नहीं दिया। दोनों तरफ से अड़ियल रवैये के कारण संसदीय इतिहास में पहली बार 141 सांसदों को निलंबित किया जा चुका है।
दोनों तरफ से अड़ियल होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीच का रास्ता निकालने के बजाए यहाँ तक कह दिया है कि कुछ महीनों में देश की जनता निलंबित सांसदों की सीटें भाजपा सांसदों से भर देगी। उधर सारी मर्यादाओं को लांघ कर विपक्ष के सांसद देश के उपराष्ट्रपति की शर्मनाक मिमिक्री करने की हरकत कर रहे हैं। जिससे जनता के बीच विपक्ष की छवि और खराब होती जा रही है। ऐसी छवि के रहते भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने से भी विपक्ष को कोई फायदा नहीं होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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