One Nation One Election: मोदी की मुहिम से क्यों डरे हुए हैं क्षेत्रीय दल और कांग्रेस?
One Nation One Election: एक देश एक चुनाव को लेकर गठित पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति की पहली बैठक विशेष सत्र के बाद 23 सितंबर को प्रस्तावित है। ऐसे में 'अस्थाई' के टैग वाले एजेंडा के साथ आहूत विशेष सत्र के दौरान इससे जुड़े किसी विधेयक के आने की संभावना न के बराबर है।
लेकिन हाल के बरसों में हर मसले पर जल्दबाजी में रहने वाली कांग्रेस पार्टी शायद कोई जोखिम नहीं लेना चाहती, उसे अब भी आशंका है कि अक्सर सरप्राइज देने के लिए चर्चित प्रधानमंत्री कोई मूव ले सकते हैं, इसीलिए कांग्रेस पार्टी अपनी पहले से स्थापित लाइन से इतर हटकर त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है।

इतिहास गवाह है कि 60 के दशक तक 'एक देश एक चुनाव' कांग्रेस का मुद्दा रहा है। बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी इसके पक्ष में लगातार चर्चाएं की हैं। अब जब मौजूदा सरकार ने चुनाव खर्च में भारी कमी आने की बात को प्रमुखता से आगे कर इस विषय को उठाया है, तो विपक्षी पार्टी होने के नाते कांग्रेस इसका खुलकर विरोध कर रही है, संविधान पर हमला बता रही है।
राजनीति में किसी विषय पर सहमति-असहमति अपनी जगह है। लेकिन विषय से संबंधित संवाद में हिस्सा लेना लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ व्यवहार माना जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुद्दा चाहे आसान हो अथवा जटिल, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद होना ही चाहिए। संवाद में जहां कमी है उस विषय को अवश्य विपक्ष को उजागर करना चाहिए। जैसे सरकार ने इस विषय पर विचार के लिए जो समिति बनाई है, उसमें कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी को रखा गया था। लेकिन पार्टी के दवाब में उन्होंने समिति से अलग होने की घोषणा कर दी।
कांग्रेस यह भी कह सकती थी कि एक देश एक चुनाव का मुद्दा पूरे देश को प्रभावित करेगा, इसलिए समिति का आकार बड़ा होना चाहिए था। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं के भी चुनाव होने हैं इसलिए इस समिति में राज्यों के मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय दलों के प्रमुखों को भी रखा जाना क्या बेहतर नहीं होता? एक देश एक चुनाव पर होने वाले खर्च पर ही व्यापक पैमाने पर बहस की मांग करती क्योंकि खर्चे में कमी के दावे को सरकार के कानून मंत्री के तर्कों ने ही सिर के बल उल्टा खड़ा कर दिया है।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने ध्यान दिलाया है कि एक ईवीएम मशीन का जीवनकाल 15 वर्ष भी मानें तो एक साथ चुनाव की व्यवस्था में एक मशीन का अपने पूरे जीवन काल में सिर्फ तीन या चार बार ही उपयोग किया जाएगा, जिससे हर 15 साल पर उन्हें बदलने पर बहुत भारी खर्च होगा।
पीछे के पन्नों को पलट कर देखें तो एक राष्ट्र और एक चुनाव को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के विचार अलग-अलग रहे हैं और वक्त के साथ बदलते भी रहे हैं। मगर एक मोटा सा विभाजन हमेशा ही रहा है। बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने इस विचार का हमेशा समर्थन किया है, वहीं छोटे क्षेत्रीय दल इसको लेकर आमतौर पर आशंकित रहे हैं। वर्ष 2014 में भाजपा के नेतृत्व में राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही कांग्रेस पार्टी बहुत हद तक क्षेत्रीय दलों के सहारे खड़ा होने का प्रयास करती रही है। संभव है क्षेत्रीय दलों को फौरी तौर पर साधे रखने के लिए कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बदलाव किया हो। लेकिन यहां उल्लेखनीय यह है कि छोटे बड़े 38 दलों के समूह राजग की अगुवाई कर रहे प्रधानमंत्री की ओर से यह प्रस्ताव आया है, और 26 दलों को मिलाकर बने इंडिया के घटक दल कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को संघीय ढांचे पर हमला बताते हुए विरोध किया है।
छोटे और क्षेत्रीय दलों को इस बात का डर है कि अगर एक देश एक चुनाव लागू हुआ तो चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमट जाएंगे, स्थानीय मुद्दों की हवा निकल जाएगी। चूंकि देश में मतदान को लेकर समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। अधिकांश मतदाता आज भी अपने मतों का प्रयोग नहीं करते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना कि एक मतदाता लोकसभा में अन्य मुद्दे पर मतदान करेगा और विधानसभा या पंचायत के लिए अन्य मुद्दे पर अपना वोट डालेगा, सही नहीं है। ऐसे में जनजीवन से जुड़े हुए मुद्दों की भी अनदेखी होगी।
दूसरा डर यह है कि एक साथ चुनाव होने पर जनता के बीच बड़ी पार्टियां तो दिखाई देगी लेकिन साधन संसाधन के अभाव में छोटी पार्टियां लाइमलाइट से दूर हो जाएगी। क्षेत्रीय दलों पर राष्ट्रीय दलों की तुलना में मीडिया का भी ध्यान कम ही जाएगा। उन्हें डर है कि मीडिया के अभाव में जनता उनके विचारों से अवगत ही नहीं हो पाएगी।
तीसरा मामला खर्चे से जुड़ा हुआ है। बड़ी पार्टियों के पास संसाधन बहुत हैं लेकिन छोटे दलों के पास सीमित है। छोटे दलों को डर है कि अपने सीमित साधन के साथ अपने चुनाव प्रचार को लेकर आधिकाधिक जनता के बीच नहीं जा सकते। चौथे, सरकारों के महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कार्यों से जनता के मत प्रभावित होते हैं। ऐसे में केंद्र के प्रभाव से राज्य या राज्य के प्रभाव से क्षेत्र विशेष का चुनाव प्रभावित हो सकता है।
पांचवा डर है चुनाव में बड़े चेहरों के प्रभाव का। राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के बड़े चेहरे मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। मतदाताओं का स्वाभाविक लगाव बड़े कद के नेताओं के प्रति होता ही है। कांग्रेस ने अपना पहला तीन चुनाव पंडित नेहरू के नाम पर लड़ा, अब 2014 से भाजपा अपना चुनाव नरेंद्र मोदी को आगे कर लड़ रही है।
छोटे और क्षेत्रीय दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा है गठजोड़ का। किस दल के साथ हाथ मिलाना है और किस दल से किनारा करना है, यह निर्णय छोटे दलों के लिए कठिन हो सकता है। वर्तमान में अलग-अलग चुनाव होते हैं तो उनके पास अवसर की विविधता भी होती है, लेकिन एक देश एक चुनाव के बाद उन्हें किसी एक बरगद के नीचे ही जाना होगा।
बहरहाल छोटे और क्षेत्रीय दलों की तुलना में कांग्रेस पार्टी एक देश एक चुनाव के विरोध में अधिक मुखर है। वर्ष 1957 में कांग्रेस के एकाधिकार और वर्चस्व को तोड़कर सत्ता में आई कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को बर्खास्त करने वाली, आपातकाल के दौरान संसद का कार्यकाल 5 साल से बढ़कर 6 साल कर देने वाली कांग्रेस पार्टी इसे संघीय ढांचे का अतिक्रमण बता रही है।
उम्मीद की जा रही थी कि हैदराबाद में बैठी कांग्रेस कार्य समिति एक देश एक चुनाव के मसले पर कोई ठोस प्रस्ताव लेकर आएगी लेकिन संसद का विशेष सत्र शुरू होने के पहले ही कांग्रेस कार्य समिति ने एक देश एक चुनाव के विचार को खारिज करते हुए इसे संविधान और देश के संघीय ढांचे पर हमला बताकर फिर से अपरिपक्व सोच का उदाहरण ही प्रस्तुत किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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