North vs South: कितनी जायज है कांग्रेस प्रायोजित उत्तर बनाम दक्षिण की जंग?
North vs South: तेलंगाना के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले रेवंत रेड्डी ने एक विवादित तुलना कर दी। उन्होंने कहा कि उनका डीएनए तेलंगाना का है। केसीआर की तरह उनका डीएनए बिहारी का नहीं है। असल में 10 साल तेलंगाना के मुख्यमंत्री रहे के. चंद्रशेखर राव बिहार में कुर्मी जाति से आते हैं जिनके पूर्वज तेलंगाना में बस गये थे। इसलिए रेवंत रेड्डी ने बिहारी का ताना मारकर एक बार फिर उत्तर दक्षिण का बंटवारा पैदा करने का प्रयास किया है।
रेवंत रेड्डी ने अपनी जीत पर जो कहा है बाकी तीन राज्यों में अपनी हार पर भी कांग्रेस यही कहने की कोशिश कर रही है कि उत्तर के लोगों की राजनीतिक समझ ही कम है इसलिए वो कांग्रेस को वोट नहीं दे रहे हैं। इसलिए कांग्रेस इको सिस्टम द्वारा तेलंगाना की जीत के बहाने यह स्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि विंध्य पर्वत से उत्तरी इलाके के लोगों की सोच सांप्रदायिकता और जातिवाद के इर्द-गिर्द ही घूमती है। जबकि दक्षिण के लोग राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा सचेत, प्रगतिशील और परिपक्व हैं। कांग्रेस इसके जरिए यह जताने की कोशिश कर रही है कि उसके नेता राहुल गांधी की सोच वक्त से आगे की है। चूंकि दक्षिण के लोगों की सोच ज्यादा परिपक्व है, इसलिए वे राहुल की बातों पर भरोसा कर रहे हैं। कांग्रेस के अनुसार कर्नाटक और तेलंगाना की जीत इसकी ही परिचायक है।

नैरेटिव के बहाने उत्तर बनाम दक्षिण की जंग करने-कराने का अपने यहां लंबा इतिहास रहा है। उत्तर में अपेक्षाकृत गोरी और साफ चमड़ी वाले लोगों को लेकर कहा जाता रहा है कि विंध्य के उत्तर वाले लोग विदेशी धरती से आए आर्य लोगों की संतान है। माना जाता रहा कि विंध्य के दक्षिण वाले लोग बुनियादी रूप से भारत के ही लोग हैं। हालांकि दयानंद सरस्वती जैसे लोग इस वैचारिकी का विरोध करते रहे हैं। आज के दौर के आक्रामक राजनेता सुब्रमण्यम स्वामी हों या फिर मानवशास्त्री, सबका मानना है कि चाहे उत्तर के लोग हों या दक्षिण के नागरिक, वे बुनियादी रूप से एक ही हैं।
उत्तर और दक्षिण का विभाजन आठवीं सदी तक भी तेज था। शंकराचार्य ने पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में शंकराचार्य पीठ स्थापित करके एक तरह से देश की इस विभाजनकारी सोच पर लगाम लगाने की कोशिश की थी। भारत सरकार अधिनियम के तहत जब 1937 में राज्यों में चुनाव हुए, तब से ईवी रामास्वामी पेरियार की अगुआई में शुरू हुआ हिंदी विरोध भी उत्तर बनाम दक्षिण की ही जंग का विस्तार है। आजादी के बाद जब राजनीतिक कारणों से चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सरदार पटेल ने राष्ट्रपति नहीं बनने दिया, तब भी उत्तर बनाम दक्षिण की वैचारिक जंग को हवा दी गई। संविधान सभा की मंजूरी के बावजूद हिंदी अगर व्यवहारिक रूप से राजभाषा नहीं बन पाई, तो इसके पीछे भी उत्तर बनाम दक्षिण वाली सोच भी कहीं न कहीं रही है।
उत्तर के राज्यों की गरीबी और जन पलायन और दक्षिण के आर्थिक उत्थान के पैमाने पर भी उत्तर और दक्षिण के बीच की जंग चलती रही है। वैसे भी देश को बांटने और किसी क्षेत्र विशेष के लोगों को हंसी का पात्र बनाने की परंपरा देश में लंबे समय से है। हिंदी की मुंबइया फिल्मों ने इस सोच को बढ़ावा ही दिया है। उत्तर भारत में निजी स्कूल पहले खुलते थे तो स्कूल मालिक बड़े-बड़े पोस्टर लगाते थे कि अंग्रेजी पढ़ाने के लिए दक्षिण भारतीय अध्यापक नियुक्त किए जा रहे हैं। यानी अंग्रेजी जानना सिर्फ दक्षिण के लोगों का विशेषाधिकार रहा। भले ही अंग्रेजी पढ़ाने वाले बेहतर अध्यापक स्थानीय स्तर पर क्यों ना मौजूद हों।
लेकिन सोच के स्तर पर उत्तर और दक्षिण के राज्यों को बांटने की मौजूदा कोशिश बाकी कोशिशों से अलग है। स्वाधीनता आंदोलन की कोख से निकली कांग्रेस ने खुलकर कभी इस तरह की विभाजनकारी सोच को हवा नहीं दी। कांग्रेस की संस्कृति और राजनीतिक परंपरा भारत को जोड़ने की रही है, तोड़ने की नहीं। उसकी अखिल भारतीय पहचान और उसकी यह सोच ही रही कि ताजिंदगी कांग्रेसवाद के विरोधी रहे समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने आखिरी लेख में कांग्रेस को देश की एकता का प्रतीक बताया था। लेकिन लगता है कि कांग्रेस के आज के कर्णधार और उनके सलाहकारों को कांग्रेस की इस प्रकृति की जानकारी नहीं हैं।
एक बारगी मान भी लें कि कांग्रेस का नैरेटिव सही है। जिसके मुताबिक दक्षिण के लोग उत्तर के मुकाबले राजनीतिक रूप से परिपक्व हैं। तो हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि भारतीय इतिहास के काला अध्याय के रूप में स्थापित इंदिरा गांधी का आपातकाल काला नहीं, इतिहास का सुनहरा अध्याय था। इसकी वजह यह है कि आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस को 154 लोकसभा सीटें मिलीं थीं। जिनमें से 89 सीटें दक्षिण भारत के चार राज्यों में मिलीं। उत्तर भारत में कच्छ से कोलकाता तक कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। सिर्फ राजस्थान में नागौर और मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट पर उसे जीत मिली थी।
हर चुनाव सत्ताधारी राजनीतिक दल की नीतियों के संदर्भ में एक तरह से लोकमत संग्रह भी होता है। तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि 1977 में दक्षिण में मिले कांग्रेस को अपार समर्थन का मतलब आपातकाल को लेकर कांग्रेस को दक्षिण का समर्थन था? निश्चित तौर पर कांग्रेस भी इस तथ्य को स्वीकार नहीं करेगी। अगर वह इसे स्वीकार नहीं करती तो फिर सवाल यह है कि आखिर वह उत्तर बनाम दक्षिण को लेकर ऐसा नैरेटिव क्यों फैला रही है? वह क्यों सोच के नाम पर दक्षिण बनाम उत्तर की जंग कराना चाहती है? क्या ऐसी सोच के विस्तार के बाद देश में नए तरह के अलगाववाद की आशंका नहीं पैदा होती?
तमिलनाडु में तो कांग्रेस 1971 के विधानसभा चुनावों से जो गायब हुई तो अब तक गायब ही है। अगर वह कभी दिखती है तो उसे द्रविड़ मुनेत्र कषगम् की कभी बैसाखी की जरूरत पड़ती है तो कभी अन्नाद्रमुक की। तो क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस को न चुनने वाला तमिल मानस संकुचित है और वह विकास और मुद्दों पर ध्यान नहीं देता। केरल में दो विधानसभा चुनावों से कांग्रेस सत्ता से दूर है। यानी केरल के लोगों की सोच छोटी है। इसी तरह आंध्र प्रदेश की सत्ता से भी कांग्रेस दो चुनावों से दूर है। यानी वहां के भी लोगों की सोच छोटी है।
आज के दौर की राजनीति की बुनियाद नैरेटिव बन गया है। हर राजनीतिक दल अपने हिसाब से अपने फायदे की राजनीति के लिए नैरेटिव गढ़ सकता है। लेकिन इस प्रक्रिया में उसे देखना होगा कि उससे देश का मानस ना बंटे। लगातार बढ़ती सड़क और रेल के साथ ही संचार सुविधाओं ने देश के एक इलाके के प्रति बरते जाने वाले संकुचित व्यवहार को लगातार कम किया है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह भी इसी प्रक्रिया को बढ़ावा दे, विभाजन की सोच को लगाम लगाएं, क्योंकि विभाजनकारी सोच गहरे तक पैठ गई तो आखिरकार उसका खामियाजा समूचे देश और देश के रूप में भारत के समाज को भुगतना पड़ेगा। स्वाधीनता आंदोलन की पार्टी रही कांग्रेस को इस तथ्य को संजीदगी से समझना होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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