India Nepal Relations: भारत के करीब आए प्रचंड तो नेपाल में मच गया बवाल
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के हालिया भारत दौरे के बाद एक बार फिर नेपाल में भारत विरोध बनाम भारत समर्थन की राजनीति सुर्खियों में है। गौरतलब है कि प्रचंड ने 31 मई से 3 जून तक भारत का आधिकारिक दौरा किया था

हाल ही में अपने भारत दौरे में नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल "प्रचंड" ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात की और कई लंबित द्विपक्षीय समझौते और परियोजनाओं पर हस्ताक्षर भी किये। कृषि, ऊर्जा, संस्कृति, आवागमन, आपसी व्यापार और सुरक्षा से जुड़े ये समझौते निश्चित रूप से दोनों देशों के व्यापक हित में हैं। इसमें खास तौर से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की बात, धार्मिक समझौते के तहत रामायण सर्किट से संबंधित परियोजनाओं का पूरा किया जाना अहम है। ट्रांजिट समझौतों, रेल संपर्क बढ़ाने और विद्युत व्यापार जैसे अहम समझौतों के अलावा तेल पाइपलाइन का विस्तार और दोनों देशों के बीच वित्तीय संपर्क को आसान बनाने की प्रक्रिया शामिल है, जोकि निस्संदेह दोनों देशों के हित में है।
इसके बावजूद नेपाल के लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा प्रचंड की भारत यात्रा की जोरदार आलोचना की जा रही है। विपक्षी दल प्रचंड के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। वे प्रचंड पर नेपाल को भारत के हाथों पूरी तरह से 'बेचने' का आरोप लगा रहे हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (यूएमएल), राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी), राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (एनआईपी) और नेपाल मजदूर किसान पार्टी (एनएमकेपी) सहित विपक्ष ने नेपाली संसद (प्रतिनिधि सभा) तक को चलने नहीं दिया। यह विरोध तब है जब प्रचंड के दौरे से पूर्व ही नेपाल के विदेश विभाग ने यात्रा के उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया था। उसने अपने बयान में कहा था, 'यात्रा दोनों देशों के सदियों पुराने बहुमुखी और सौहार्दपूर्ण संबंध को और मजबूत करेगी। द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने और व्यापार, ऊर्जा, कृषि संस्कृति, हवाई सेवा से जुड़ी चर्चा भारतीय नेताओं के साथ उनकी (प्रचंड की) बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।'
सवाल है कि जब दौरे में कोई भी विवादित या एकपक्षीय समझौता हुआ ही नहीं, तो नेपाल की विपक्षी पार्टियां इतना तीखा विरोध क्यों कर रही हैं? जब बातचीत के एजेंडा में सीमा विवाद जैसे कड़वे मुद्दे शामिल ही नहीं थे तो नेपाली विपक्षी पार्टियां सीमा विवाद का सवाल क्यों खड़ा कर रही हैं? इस प्रश्न का जवाब खोजने के लिए हमें नेपाल की अंदरुनी राजनीति को समझना होगा।
एक जमाना था जब भारत के प्रति रुझान की भावना नेपाली राजनीति और जनमत का अभिन्न हिस्सा थी। लेकिन अब नेपाल की राजनीति में भारत विरोध और भारत समर्थन की दो समांतर धाराएं चलती हैं। बीते वर्षों में नेपाली जनता के एक बड़े समूह में भी भारत विरोधी भावना स्थापित की जा चुकी है। वैसे अब भी मधेश और तराई क्षेत्र के नेपाली लोग भारत के साथ किसी प्रकार का कटु संबंध पसंद नहीं करते हैं।
लेकिन दुष्प्रचार के दम पर कम्युनिस्ट पार्टियों के समर्थकों के मन में बीते वर्षों में यह धारणा बना दी गई है कि भारत नेपाल पर अपना अनावश्यक प्रभुत्व थोपता है। यही कारण है कि प्रचंड समेत अन्य कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि वाले प्रधानमंत्रियों ने हमेशा यह जताने की कोशिश की है कि वे भारत की अपेक्षा चीन के साथ नजदीकी रखना चाहते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने कार्यकाल में सीमा विवाद का मुद्दा बार-बार उछाला। भगवान राम के जन्म को लेकर सवाल खड़े किए। विदेशी महिलाओं की शादी उपरांत नागरिकता से संबंधित कानून को बदल दिया था। इतना ही नहीं, कई प्रधानमंत्रियों ने अपनी प्रथम विदेश यात्रा के लिए चीन का चयन किया जोकि परंपरा के विपरीत था।
यह बात अलग है कि इन सब कवायदों के बावजूद नेपाल को चीन से ऐसा कोई सहयोग नहीं मिला जिससे उसकी व्यवहारिक आवश्यकताएं पूरी हों। आयात-निर्यात से लेकर, तकनीक, शिक्षा, आवागमन, ऊर्जा, पेट्रोलियम समेत लगभग हर दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नेपाल आज भी भारत पर आश्रित है। ऐसे में भारत से संबंध को मैत्रीपूर्ण बनाए रखना नेपाल की मजबूरी है।
परंतु विरोध को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टियों को प्रचंड द्वारा उज्जैन में महाकाल की पूजा-अर्चना करना भी पच नहीं रहा है। गौरतलब है कि प्रचंड माओवादी विचारधारा के नेता रहे हैं। जिस माओवादी विद्रोह ने नेपाल में हजारों लोगों की जान ली, उसके वे सर्वेसर्वा रहे हैं। उनकी पार्टी हिंदुत्व का प्रबल विरोध करती रही है। माओवादी विद्रोह के दौरान नेपाल में कई हिंदू विरोधी अभियान चलाए गए थे। स्वयं प्रचंड कभी भी नेपाल स्थित प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर नहीं गए। अब जब प्रचंड भगवा वस्त्र पहनकर महाकाल मंदिर में मंत्रोचार कर रहे हैं तो कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को यह बात हजम नहीं हो रही है। यह बात अलग है कि कोई बड़े विरोधी नेता खुलकर इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, लेकिन नेपाल में स्थानीय स्तर के नेता इसका तीव्र विरोध कर रहे हैं।
विरोध को देखकर प्रचंड ने भी बचाव में अपना सुर बदल लिया है। यात्रा से लौटने के तुरंत बाद उन्होंने समझौते को ऐतिहासिक महत्व का बताया। लेकिन अब वे कहने लगे है कि सीमा विवाद का मुद्दा भारत के साथ नेपाल के द्विपक्षीय संबंध का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। गौरतलब है कि नेपाल ने साल 2020 में एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा हो गया था। नेपाल के नक्शे में तीन भारतीय क्षेत्र लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल के हिस्से के रूप में दिखाया गया था। इसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रचंड का यह दौरा उनके विगत की दो राजनयिक यात्राओं से अधिक सकारात्मक रहा। वार्ता के एजेंडे व्यवहारिक थे। स्वयं प्रचंड ने यात्रा से पूर्व यह संकेत देने की पूरी कोशिश की कि वे भारत के साथ मधुर संबंधों को बनाए रखने के लिए तत्पर हैं। उल्लेखनीय है कि प्रचंड ने अपनी यात्रा के महज कुछ घंटे पूर्व विवादित नेपाली नागरिकता कानून को संशोधित करने का विधेयक राष्ट्रपति से मंजूर करवाया। भारत शुरू से इस कानून में संशोधन की मांग करता रहा है। उन्होंने वैचारिक दबाव के बावजूद हिंदुत्व के प्रति अपनी नजदीकी दिखाने की कोशिश की। आखिर क्यों?
कई विश्लेषकों का मानना है कि प्रचंड यह सब व्यक्तिगत कारणों से कर रहे हैं। दरअसल, 16 साल पहले नेपाल में हिंसक माओवादी आंदोलन का अंत हुआ, जिसमें 17 हजार लोग मारे गए थे। इसके बाद भारत की मध्यस्थता से माओवादियों और लोकतंत्र समर्थक दलों के बीच समझौता हुआ था। 2006 में हुए शांति समझौते में कहा गया था कि मानवाधिकार उल्लंघन की जांच होगी और दोषियों को दंडित किया जाएगा। अब इस जांच को आगे बढ़ाने की मांग उठ रही है। इस बात की पूरी संभावना है कि जांच होने पर प्रचंड समेत कई माओवादी नेता इसकी चपेट में आकर जेल जा सकते हैं। नेपाली सुप्रीम कोर्ट भी प्रचंड की भूमिका की जांच कर रहा है। चूंकि यह समझौता संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय की उपस्थिति में हुआ था, इसलिए प्रचंड भारत से सहयोग चाहते हैं।
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संभव है कि ये सब बातें महज कयास हों, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान की नजर में प्रचंड की कोई खास विश्वसनीयता नहीं रही है। अगर वे अपनी विश्वसनीयता को मजबूत करना चाहते हैं, तो हालिया समझौते पर उन्हें दृढ़ता दिखानी होगी। विरोध के बावजूद अगर उन्होंने अपना स्टैंड और बयान नहीं बदला तो निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच संबंध अधिक मजबूत होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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