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NCRB Report: डरानेवाले हैं हत्या, अपराध और आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ें

NCRB Report: एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट आ गयी है। रिपोर्ट में अपराध के हर क्षेत्र में आंकड़ें डरा ही रहे हैं। क्या गांव क्या शहर, क्या महिला अपराध क्या बाल अपराध, क्या भाजपा की सरकार और क्या कांग्रेस की सरकार हर जगह, हर क्षेत्र में, हर पार्टी के शासन में अपराध का ग्राफ बढ़ता ही दिखाई दे रहा है।

एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2021 की तुलना में साल 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), बच्चों के खिलाफ अपराध, साइबर क्राइम और राज्य के खिलाफ (यानी सरकार के खिलाफ) अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। क्राइम की ये सालाना रिपोर्ट और ADSI यानी 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड रिपोर्ट समाज और प्रशासन दोनों की कलई खोलते नज़र आ रहे हैं।

NCRB Report about increasing figures of murder, crime and suicide are scary

भारत में हर घंटे तीन से अधिक लोगों की हत्या हो रही है। 'क्राइम इन इंडिया-2022' शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल भारत में 2022 में कुल 28,522 हत्या के मामले दर्ज किए गए हैं जिससे स्पष्ट है कि हर दिन करीब 78 लोगों की हत्या हुई है। पूरी रिपोर्ट में सुकून वाली बात यह है कि यह आंकड़ा पिछले दो सालों से थोड़ी गिरावट दर्ज़ दिखा रही है। सबसे ज्यादा एफआईआर उत्तर प्रदेश में दर्ज़ है तो राहत यह भी है कि महिलाओं के प्रति हुए अपराध में दोषियों को दंड दिलाने में भी उत्तर प्रदेश ही अव्वल राज्य है।

यह रिपोर्ट समाज के लिए भी आइना का काम करती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार शादी के लिए अपहरण की घटनाएं बढ़ रही हैं। बीते वर्ष 9,598 मामले दर्ज किए गए हैं और आबादी के हिसाब से बिहार में इसकी दर सबसे ज्यादा है। उसके बाद उप्र का नंबर आता है। इस तरह के विवाह को पकडुवा विवाह कहते हैं जिसमें "कमाऊ पूत" को जबरदस्ती उठाकर हथियार के दम पर उसकी अपने परिवार की लड़की से शादी करा दी जाती है और कुछ दिन बंधक बना कर रखते हैं ताकि उनके बीच सम्बन्ध स्थापित हो जाए और कतिपय कारणों से लड़का लड़की को छोड़ नहीं पाए। एक तरफा प्रेम प्रसंग के मामलों में लड़कियों के भी अपहरण होते हैं और ऐसे ही जबरन विवाह किये जाते हैं पर समाज के तौर पर यह देखने की जरुरत है कि जबरदस्ती की ऐसी शादियों का हश्र क्या होता होगा या क्या हो सकता है? अभी हफ्ते भर पहले ही पटना न्यायालय ने एक ऐसे ही विवाह की मान्यता 7 साल बाद रद्द कर दी है।

ऐसे ही आंकड़ें बताते हैं कि प्रेम प्रसंग में की गयी हत्याएं भारत में हत्या के कारणों में तीसरे नंबर पर आती हैं। इसमें ऑनर किलिंग, एकतरफा प्यार, विवाहोत्तर संबंध प्रमुख कारण हैं। परन्तु प्रेम जैसी विशद्ध भावना जिसे हम ईश्वरीय अनुभूति मानते हैं वहां हत्या जैसे जघन्य अपराध का शामिल होना सभ्य समाज के काले पक्ष को उजागर करता है। बच्चों ने अपनी पसंद से विवाह कर लिया तो माता-पिता उन्हें मारने में नहीं हिचकिचाते तो कहीं माता-पिता विवाह में रोड़ा बने तो कलियुगी संतान उनको काँटा मान रास्ते से हटाने में हिचकिचाते नहीं हैं। प्रेम में माता-पिता का दम्भ बच्चों को मार देता है और बच्चों की जिद्द माता-पिता की जान ले लेती है।

लॉ एंड आर्डर की स्थिति को समझने के लिए दंगों के आंकड़ें बहुत सटीक जानकारी देते हैं। चुस्त दुरुस्त लॉ एंड आर्डर का हुंकार भरने वाली भाजपा सरकारें यहाँ असफल होती दिख रही हैं। भाजपा शासित महाराष्ट्र में 2022 में कुल 8,218 दंगे के मामले दर्ज किए गए, जिनसे 9,558 लोग प्रभावित हुए। वहीं 28 मामले सांप्रदायिक एवं धार्मिक और 75 मामले राजनीतिक हिंसा के दर्ज हुए, जबकि 25 अन्य मामले जाति संबंधित संघर्षों से जुड़े दर्ज हुए। दंगों के मामले में 4,736 केस के साथ बिहार दूसरे स्थान पर है जहाँ केंद्र में विपक्षी पार्टी कांग्रेस सरकार में शामिल है। जबकि 4,478 केस के साथ पुनः भाजपा शासित उत्तर प्रदेश देशभर में तीसरे स्थान पर है। यह एक ऐसा ग्रे एरिया है जहाँ पक्ष विपक्ष सब काले ही नज़र आ रहे हैं।

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में देश में 13,000 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें 18 वर्ष से कम उम्र के 10,000 से अधिक आत्महत्या के मामले शामिल हैं, जबकि 2,000 से अधिक छात्रों के लिए परीक्षा में असफलता आत्महत्या का कारण थी। छात्रों की आत्महत्या एक बेहद गंभीर विषय है।

हमने कैरियर को हौव्वा बनाकर रखा है। कोचिंग संस्थानों के अलावा अभिभावक भी अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ बच्चों पर डाल देते हैं। पूरे समय शिक्षित बनाने की कवायद चलती है जिसमें किताबी ज्ञान को रट्टा मरवाया जाता है तथा हाई स्कोर की अपेक्षा रखी जाती है। इसके दबाव में कई बार नौजवान या किशोर छात्र आत्महत्या का रास्ता अपना लेते हैं।

भारत में आकस्मिक मौतों की संख्या पिछले पांच वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़कर 4.3 लाख पहुँच गई है। आकस्मिक मौतों की दो श्रेणी है- 'प्राकृतिक आपदा' में बिजली गिरने, गर्मी/धूप, बाढ़, भूस्खलन आदि से होने वाली मौतें वहीं अन्य कारणों से होने वाली मौतों में यातायात दुर्घटनाएं, जानवरों द्वारा मौत, नकली शराब का सेवन और फैक्टरी में होने वाली दुर्घटनाओं को शामिल किया गया है।

2022 में अचानक होनेवाली मौतों की संख्या में 12% की वृद्धि हुई है। इन मौतों में लगभग 57% हार्ट अटैक के कारण हुई थीं। आकस्मिक मौतें जिनमें हार्ट अटैक और ब्रेन हैमरेज शामिल हैं कोविड के बाद से बहुत बढ़ गई हैं मगर अभी तक स्वास्थ्य विभाग ने ऐसी मौतों के वैक्सीन के साथ किसी भी संबंध से इंकार ही किया है। तथापि स्वास्थ्य मंत्री ने ग्रसित लोगों को सलाह दी है कि ऐसे लोग एक्सरसाइज और वर्कआउट करते समय ज्यादा परिश्रम न करें और कुछ समय के लिए ज्यादा मेहनत वाला काम भी न करें।

NCRB रिपोर्ट के अनुसार 4.3 लाख में से 8060 मृत्यु प्राकृतिक आपदा के कारण हुई हैं बाकी अन्य कारणों से दर्ज की गई हैं। प्राकृतिक आपदा में सबसे ज्यादा मृत्यु बिजली गिरने के कारण हुई है जो 36% है। प्राकृतिक आपदाओं से सबसे ज्यादा भयाक्रांत 5 राज्य या केंद्रशासित प्रदेश ही बिजली गिरने से हुई मौतों में अव्वल स्थान पर हैं। मध्य प्रदेश में 496, बिहार में 329, ओडिशा में 316 , उत्तर प्रदेश में 301 और झारखंड में 267 लोग मारे गए।

NCRB रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में 4,46,768 सड़क हादसे दर्ज किए गए। इसमें 4,23,158 लोग घायल हुए और 1,71,100 लोगों की मौत हो गई। कुल सड़क हादसों की बात करें तो इसमें ओवर स्पीडिंग का बड़ा हिस्सा रहा। ओवर स्पीडिंग की वजह से 62.6% सड़क हादसे हुए, जिसमें 1,00,726 लोगों की जान गई और 2,71,661 लोग घायल हुए। इसके बाद खतरनाक तरीके से ड्राइव कर सड़क हादसों की हिस्सेदारी 24.7 फीसदी रही, जिसमें 45,161 लोगों की मौत हुई और 1,00,901 लोग घायल हुए।

देश में पिछले साल 9.1 फीसदी एक्सीडेंटल मौतें हीट और सनस्ट्रोक की वजह से हुई हैं, जबकि 8.9 फीसदी लोग ठंड से मर गए। मृत्यु के ऐसे कई कारणों पर अंकुश लगाया जा सकता है मगर इसमें प्रशासन और लोगों की लापरवाही साफ़ नज़र आती है। सड़क दुर्घटनाओं के मामले में सरकार सिर्फ चालान काटकर जन चेतना नहीं ला सकती। वहीँ बाढ़ की स्थिति में समय रहते विस्थापित करके या रेल दुर्घटना के तकनीकी और मानवीय कारणों से लापरवाही कारणों परभी अंकुश लगाया जा सकता है।

ऐसे कई अपराध हैं जो समाज के तौर पर हम नागरिकों को असफल बताते हैं तो वहीं कई ऐसे अपराध हैं जो असफल प्रशासन को रेखांकित करते हैं। हम भले विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था बन गए हों मगर सुरक्षित देश बनने के मामले में बहुत पीछे हैं। जब तक समाज और सरकार इस बात पर ध्यान नहीं देगी रामराज्य की परिकल्पना अधूरी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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