Mainpuri after Mulayam: मैनपुरी उपचुनाव तय करेगा मुलायम के बाद की समाजवादी राजनीति
Mainpuri after Mulayam: उत्तर प्रदेश में मैनपुरी लोकसभा एवं रामपुर विधानसभा के लिये 5 दिसंबर को उपचुनाव है। समाजवादी पार्टी और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी दोनों के लिये यह प्रतिष्ठा का चुनाव है।

इन सीटों पर हार या जीत से सत्ता का कोई समीकरण नहीं बदलेगा, लेकिन परिणाम तय करेगा कि मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद सपा का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? रामपुर एवं आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्रों में सपा की हार के बाद मैनपुरी का सियासी महत्व भी बढ़ गया है।
मैनपुरी लोकसभा सीट सपा संरक्षक रहे मुलायम सिंह यादव के निधन से रिक्त हुई है, जबकि रामपुर विधानसभा सीट सपा विधायक आजम खान को कोर्ट से तीन साल की सजा मिलने के बाद खाली हुई है। यह भी इत्तेफाक है कि यह दोनों सीटें सपा का मजबूत गढ़ रही हैं तो भाजपा की दुखती रग। भाजपा अपने स्थापनाकाल से लेकर अपने उत्कृष्ट दौर में भी दोनों सीटों पर खाता नहीं खोल पायी है। भाजपा को दोनों सीटों पर पहली जीत का इंतजार है।
भाजपा जब 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की सियासत के सबसे शानदार दौर में थी, तब भी उससे मैनपुरी लोकसभा सीट दूर रह गई। भाजपा राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों में 79 सीटों पर कभी ना कभी जीत हासिल कर चुकी है, लेकिन मैनपुरी सीट कभी उसके कब्जे में नहीं आई। मैनपुरी यूपी की एकमात्र सीट है, जिस पर भाजपा का भगवा झंडा कभी नहीं लहरा पाया।
मैनपुरी लोकसभा सीट पहले कांग्रेस, बाद में जनता पार्टी और फिर मुलायम सिंह के उदय के बाद समाजवादियों का गढ़ बन गई। 1996 से इस सीट पर लगातार सपा का कब्जा है। 1998 एवं 99 में सपा से बलराम यादव के जीतने के बाद 2004 से यह सीट सैफई के यादव परिवार के ही किसी सदस्य के पास रही है। इस सीट से मुलायम सिंह यादव, धर्मेंद्र यादव एवं तेज प्रताप यादव सांसद रह चुके हैं।
उपचुनाव में भी सैफई परिवार की बहू एवं अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव सपा से उम्मीदवार हैं। बसपा एवं कांग्रेस के उपचुनाव से किनारा करने के बाद सीधी लड़ाई सपा एवं भाजपा के बीच सिमटती दिख रही है। भाजपा ने भी अपने पत्ते खोल दिये हैं जातीय समीकरण के अनुसार रघुराज सिंह शाक्य को अपना उम्मीदवार बना दिया है।
भाजपा की रणनीतिक परेशानी का एक कारण प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव का रवैया है। भाजपा शिवपाल की नाराजगी में अपनी जीत के लिये संभानाएं तलाश रही थी, लेकिन मुलायम के निधन के बाद वह अखिलेश के नजदीक नजर आ रहे हैं। हालांकि गोरखपुर में उन्होंने इशारे इशारे में अखिलेश के रवैये को लेकर तल्खी दिखाई, लेकिन अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
अब यह तय है कि शिवपाल मैनपुरी से उम्मीदवार नहीं उतारेंगे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह डिम्पल यादव को अपना समर्थन देंगे? यह सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण और लाजिमी है कि मैनपुरी लोकसभा सीट अंतर्गत उनकी जसवंतनगर विधानसभा सीट भी है। इस सीट से वह बीते छह चुनावों से लगातार जीतते आ रहे हैं। इस सीट पर शिवपाल सिंह यादव की मजबूत पकड़ है।
मैनपुरी लोकसभा अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में करहल एवं किशनी सीट सपा के पास हैं। करहल से अखिलेश यादव विधायक हैं। भोगांव एवं मैनपुरी सीट भाजपा के पास है। ऐसे में शिवपाल की जसवंतनगर सीट सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। यह सीट हार और जीत के बीच निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है। शिवपाल का समर्थन या विरोध सियासी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
यादव, शाक्य एवं क्षत्रिय बाहुल्य मैनपुरी सीट पर अखिलेश यादव ने कील-कांटे दुरुस्त करते हुए उपचुनाव से पहले देवेंद्र यादव को हटाकर भोगांव से तीन बार के विधायक रहे आलोक शाक्य को जिलाध्यक्ष बनाकर यादव-शाक्य के जिताऊ समीकरण को मजबूत किया है। आलोक के पिता रामऔतार शाक्य भी भोगांव से दो बार विधायक रह चुके हैं। भाजपा मुलायम परिवार के खिलाफ शाक्य प्रत्याशी उतारती आई है, लेकिन इस बार भाजपा को नये समीकरण तलाशने होंगे।
मैनपुरी सीट में 4.25 लाख यादव मतदाताओं के बाद 3 लाख शाक्य मतदाता हैं। क्षत्रिय मतदाताओं की संख्या 2.25 लाख तथा ब्राह्मण मतदाता 1.10 लाख है।अखिलेश ने यादव एवं शाक्य के जोड़ की आशा के साथ डिम्पल को उतारकर क्षत्रिय मतदाताओं को भी साधने का प्रयास किया है। डिम्पल भी उत्तराखंड की क्षत्रिय जाति से आती हैं। अब भाजपा के सामने ऐसा उम्मीदवार उतारने की चुनौती है, जो सपा के समीकरण में सेंध लगा सके।
भाजपा के लिये मैनपुरी सीट जीतना 2024 से पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने वाला होगा। योगी सरकार ने जन कल्याण योजनाओं और प्रदेश संगठन ने घर घर संपर्क अभियान से मैनपुरी में अपनी पकड़ मजबूत की है। इसका उदाहरण है कि 2014 में मुलायम सिंह यादव को 3.64 लाख मतों से जीत हासिल हुई थी, वहीं 2019 के चुनाव में यह मार्जिन 94 हजार तक पहुंच गया। मुलायम के निधन के बाद भाजपा इस अंतर को बदलने का प्रयास करेगी।
भाजपा ने केंद्रीय राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह को मैनपुरी लोकसभा सीट की कमान सौंपी है। योगी सरकार के साथ मैनपुरी भाजपा के नये अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी एवं संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह की प्रतिष्ठा का भी सवाल बनेगा। सियासी हलके में मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू अपर्णा यादव के नाम पर भी चर्चा है, लेकिन भाजपा ने अभी तक अपनी रणनीति का खुलासा नहीं किया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा इस उपचुनाव में सपा के इस अभेद किले को भेद पायेगी?
रामपुर विधानसभा के जातीय एवं धार्मिक समीकरण सपा के मुफीद रहे हैं। 50 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर भाजपा का खाता कभी नहीं खुला। यहां सपा के दिग्गज नेता आजम खान का दबदबा रहा है। वर्ष 1996 को छोड़कर 1980 से 2022 तक हुए 11 चुनावों में 10 बार रामपुर सीट आजम खान और उनके परिवार के पास रही है। आजम यहां से 9 बार तथा उनकी पत्नी एक बार विधायक चुनी जा चुकी हैं।
मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर समीकरण कभी भाजपा के मुफीद नहीं बैठे। ज्यादातर मुकाबला आजम खान और नवाब परिवार के बीच होता रहा है। भाजपा मुस्लिम वोटरों में पैठ बनाने के लिये नये सियासी समीकरण तैयार कर रही है। पसमांदा मुस्लिम सम्मेलन के जरिये मुसलमानों के जातीय समीकरण में भाजपा की सेंध लगाने की कोशिश जारी है। समीकरण अगर दुरुस्त बैठे तो भाजपा रामपुर में आजम के गढ़ में सेंध लगा सकती है।
यह भी पढ़ें: Assembly and MCD Election: गुजरात में कांग्रेस, दिल्ली में भाजपा निशाने पर
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications