Mahua Moitra: लोकसभा ने फिर से 2005 दोहरा दिया
आखिरकार लोकसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करके महुआ मोइत्रा को लोकसभा से बर्खास्त कर दिया। सब कुछ 2005 की तरह दोहराया गया, तब भारतीय जनता पार्टी ने यह कहते हुए वाकआउट कर दिया था कि सांसदों को दी जा रही सजा उनके अपराध की तुलना में ज्यादा है।
इस बार विपक्ष पूरी तरह कन्फ्यूज था कि वह महुआ मोइत्रा का बचाव करे या न करे, क्योंकि महुआ मोइत्रा एक इंटरव्यू में खुद अपना अपराध कबूल कर चुकी थी कि उसने लोकसभा की वेबसाईट का अपना लॉग-इन पासवर्ड उद्योगपति दर्शन हीरानन्दानी को दे रखा था।

विपक्ष का पूरा जोर इस बात पर था कि महुआ मोइत्रा को अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया जाए। लेकिन स्पीकर ने उसी तरह उन्हें मौक़ा नहीं दिया जैसे 2005 में आरोपी दस सांसदों को नहीं दिया गया था। भाजपा के बहुमत को देखते हुए इंडी एलायंस के सभी सदस्यों ने वोटिंग से पहले वाकआउट कर दिया। वाकआउट करने और बाद में मीडिया के सामने कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी भी मौजूद थी, जिन्होंने 2005 में लोकसभा के दस सांसदों और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता समाप्त करने को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था।
2005 में जो कुछ हुआ, सदन और आचरण कमेटी ने वही दोहराया। फर्क सिर्फ इतना था कि तब स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने दस सांसदों के आचरण की जांच का काम पवन बंसल की रहनुमाई में बनाई गई विशेष कमेटी को सौंपा था, जबकि मौजूदा स्पीकर ने महुआ मोइत्रा के मामले में जांच का काम सदन की आचरण कमेटी को सौंपा था।
2005 में कोबरापोस्ट डॉट काम नाम की एक वेबसाइट ने सांसदों का स्टिंग आपरेशन किया था। कोबरापोस्ट डॉट काम के दो पत्रकारों ने सांसदों को अपने जाल में फंसाने के लिए उनसे मुलाक़ात की और उनकी दिलचस्पी वाले विषयों पर कुछ सवाल दिए, उन्होंने सांसदों को कुछ पैसे डोनेशन के रूप में भी दिए थे। यह सारी प्रक्रिया स्टिंग आपरेशन का हिस्सा थी, जो भी बातचीत हो रही थी, उसे गुप्त कैमरों से रिकार्ड कर लिया गया था।

कोबरापोस्ट के लोगों ने सांसदों को 15 हजार से लेकर 1,10, 000 रूपए तक दिये थे। कुछ सांसदों ने लिफाफा लेने से इंकार भी किया था, लेकिन उन्हें जबरदस्ती लिफाफा थमाया गया था। यानी सब कुछ उन्हें फंसाने के लिए प्रायोजित किया गया गेम था। इन सांसदों में से सिर्फ एक सांसद सत्ताधारी कांग्रेस का था, जबकि बाकी सारे सांसद विपक्षी दलों के थे, जिनमें सबसे ज्यादा लोकसभा के छह सांसद भाजपा के थे, भाजपा का ही सातवाँ सांसद राज्यसभा से था, लोकसभा के दो सांसद बसपा और एक सांसद राष्ट्रीय जनता दल का था।
कोबरापोस्ट डॉट काम ने गुप्त कैमरों से रिकार्डिंग किए गए वीडियो इंडिया टुडे को बेच दिए थे, जिसने इस स्टिंग आपरेशन को संसद सत्र के दौरान 12 दिसंबर 2005 को आजतक न्यूज चैनल पर चलाया था। क्योंकि संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था, इसलिए सदन में खूब हंगामा हुआ। इस पर उसी दिन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने चंडीगढ़ के कांग्रेस सांसद पवन बंसल की अध्यक्षता में एक विशेष जांच कमेटी का गठन किया। राज्यसभा ने भी अपने एक सांसद पर फैसला करने के लिए वही तरीका अपनाया, दोनों कमेटियों को सिर्फ दस दिन में रिपोर्ट देने को कहा गया था।
इन दस दिनों के अंदर कमेटी ने कोबरापोस्ट डॉट काम के मालिक अनिरुद्ध बहल ने इंडिया टुडे के संपादक और सभी दस सांसदों को भी तलब करके उनका पक्ष सुना। इंडिया टुडे ने स्वीकार किया था कि उसने प्रसारित किए गए वीडियो कोबरापोस्ट से 48 लाख में खरीदे थे। आजतक ने वे सभी वीडियो संसदीय समिति को सौंप दिए थे, जो अब संसदीय रिकार्ड का हिस्सा है।
सभी दस सांसद लोकसभा की विशेष कमेटी के सामने पेश हुए थे, जिन्होंने कोबरापोस्ट डॉट काम के मालिक अनिरुद्ध बहल से आमना सामना करवाने की मांग की थी, लेकिन बंसल कमेटी ने उनकी मांग अस्वीकार कर दी थी। कमेटी ने दी गई समय सीमा दस दिन में अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंप दी थी, और अगले दिन 23 दिसंबर को रिपोर्ट सदन में रखी गई, आधा घंटा रिपोर्ट पर बहस हुई।
भाजपा के वाकआउट के दौरान सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर के लोकसभा के सभी दस सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी गई थी। विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवानी ने वाकआउट से पहले कहा था कि अपराध के मुकाबले सजा ज्यादा है । सोनिया गांधी ने बाद में पवन बंसल को रेल मंत्री बना दिया था, जिसे बाद में उनके भांजे पर रिश्वतखोरी के आरोप में मंत्रीमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था।
महुआ मोइत्रा के मामले में फर्क यह था कि उनके एक्स ब्वायफ्रेंड जय अनंत देहाद्राई ने भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे से मिलकर उन्हें बताया था कि महुआ मोइत्रा किस तरह एक उद्योगपति दर्शन हीरानन्दानी के हाथों में खेल रही है। उन्होंने बाकायदा लिखकर दिया कि वह किस तरह विदेश यात्राओं की टिकट, होटलों के बिल और महंगे गिफ्ट लेकर दर्शन हीरानन्दानी के स्वार्थ वाले सवाल पूछ रही हैं। जबकि सांसद के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में अपने लोकसभा क्षेत्र के बारे में एक भी सवाल नहीं पूछे।
इस पर निशिकांत दुबे ने जय अनंत हीरानन्दानी की चिठ्ठी समेत लोकसभा स्पीकर को शिकायत भेजी। लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने सोमनाथ चटर्जी की तरह स्पेशल कमेटी बनाने के बजाए, सदन की आचरण कमेटी को मामला सौंपा। आचरण कमेटी ने वही प्रक्रिया अपनाई, जो पवन बंसल कमेटी ने अपनाई थी। दर्शन हीरानन्दानी ने हल्फिया बयान में उन सब आरोपों की पुष्टि की, जो जय अनंत देहाद्राई और निशीकांत दुबे ने लगाए थे। बल्कि अपने हल्फिया बयान में महुआ मोइत्रा की विदेश यात्राओं और होटलों के बिलों का खर्चा उठाने की पुष्टि की।
दर्शन ने यह भी कहा कि महुआ मोइत्रा ने लोकसभा की वेबसाईट का लॉग-इन और पासवर्ड भी उन्हें दे दिया था, जिस पर वह खुद ही उनकी तरफ से लोकसभा में पूछे जाने वाले सवाल अपलोड करते थे। जबकि किसी भी सांसद को जब लॉग-इन पासवर्ड दिया जाता है, तो उससे दस्तखत करवाए जाते हैं कि वह अपने लॉग-इन पासवर्ड को किसी के साथ शेयर नहीं करेगा। जय अनंत देहाद्राई और निशीकांत दुबे ने भी उसी तरह कमेटी के सामने पेश होकर अपनी गवाही दी, जैसे अनिरुद्ध बहल और आजतक के संपादक ने गवाही दी थी।
2005 में सिर्फ दस दिन में सांसदों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया खत्म कर दी गई थी, जबकि महुआ मोइत्रा के मामले में दो महीने का समय लगा, क्योंकि उनके खिलाफ शिकायत सत्रावसान के दौरान मिली थी। आठ दिसंबर को जब आचरण कमेटी की रिपोर्ट सदन में रखी गई, और सांसदों को उसे पढ़ने के लिए सिर्फ दो घंटे का समय दिया गया तो इस पर विपक्ष ने कड़ा एतराज किया। लेकिन लोकसभा स्पीकर और सत्ताधारी दल के पास अपने बचाव के लिए 2005 का उदाहरण था।
जो कुछ तब कांग्रेस और मौजूदा इंडी एलायंस के दलों ने किया था, वही अब दोहराया जा रहा था। उस समय प्रणब मुखर्जी सदन के नेता थे, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लोकसभा के सदस्य नहीं थे। मनमोहन सिंह राज्यसभा में और प्रणब मुखर्जी लोकसभा में सदन के नेता थे। विपक्ष ने जब सांसदों को पक्ष रखने देने की मांग की थी, तो प्रणब मुखर्जी ने दलील दी थी कि उन्हें कमेटी के सामने अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया गया था।
इस बार कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ वकील सांसद मनीष तिवारी को महुआ मोइत्रा के बचाव में उतारा था। लेकिन उनकी सारी दलीलों की काट 2005 में दस सांसदों की बर्खास्ती प्रक्रिया में मौजूद थी। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने महुआ मोइत्रा का बचाव करने के बजाए रिपोर्ट पढ़ने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिए जाने का सवाल उठाया। कांग्रेस की तरफ से मनीष तिवारी की भी पहली दलील यही थी कि आधे घंटे में इतनी लंबी रिपोर्ट कैसे पढ़ी जा सकती है। महुआ मोइत्रा का बचाव करने के बजाए उनकी दूसरी दलील यह थी कि महुआ मोइत्रा को सदन में अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया जाए।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुदीप बंदोपाध्याय की भी यही मांग थी, लेकिन स्पीकर ने यह कहते हुए महुआ मोइत्रा को सदन में अपना पक्ष रखने का मौक़ा नहीं दिया कि 2005 में लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सदन में मौजूद दस सांसदों को अपना पक्ष रखने का मौक़ा नहीं दिया था, क्योंकि आरोपी सांसद को कमेटी में अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया गया था। स्पीकर ओम बिड़ला ने सुदीप बंधोपाध्याय को याद दिलाया कि 2005 में वह इसी सदन में मौजूद थे।
उन्होंने मनीष तिवारी की इस दलील को भी ठुकरा दिया कि सदन इस समय अदालत की तरह काम कर रही है, इसलिए सभी राजनीतिक दलों की ओर से व्हिप जारी किया जाना गलत है। स्पीकर ने उन्हें टोकते हुए कहा कि सदन अदालत नहीं है, अदालत का काम कमेटी ने किया था, सदन कमेटी की रिपोर्ट पर विचार कर रहा है, यह अदालत नहीं है। मनीष तिवारी की सारी दलीलों का जवाब 2005 के घटनाक्रम में था।
ओम बिड़ला ने मनीष तिवारी की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 105 के अनुसार सदन को महुआ मोइत्रा के आचरण पर फैसला लेने का अधिकार नहीं है, अपनी दलील के पक्ष में उन्होंने सुप्रीमकोर्ट के एक निर्णय का भी हवाला दिया। मनीष तिवारी के बाद जब भाजपा की महाराष्ट्र की सांसद हीना विजय गोवित बोल रही थी, तो उन्होंने 2005 के सभी उदाहरण देकर मनीष तिवारी की दलीलों को काटा। उसी समय स्पीकर ओम बिड़ला ने मनीष तिवारी पर चुटकी लेते हुए कहा की उस समय अनुच्छेद 105 संविधान में नहीं था !
हीना गोवित ने सदन के सामने बहुत ही गंभीर सवाल रखा कि महुआ मोइत्रा के कारण देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में भारत की संसद और सांसदों की बदनामी हो रही है कि भारत के सांसद उद्योगपतियों से पैसे लेकर सदन में सवाल पूछते हैं, उनके लिए दलाली करते हैं। छवि यह बन रही है कि भारत के सांसद किसी के लिखे सवाल और भाषण पढ़ते है, इसलिए दोषी सांसद को बर्खास्त करके हमें दुनिया को संदेश देना चाहिए कि भारत की संसद ऐसे सांसदों को बाहर निकालने की हिम्मत रखती है, जो संसद की गरिमा को नुकसान पहुंचाते है।
आचरण कमेटी की सदस्य अपराजिता सारंगी ने यह कहते हुए महुआ मोइत्रा पर कड़े प्रहार किए कि महुआ ने कमेटी के सदस्यों और अध्यक्ष के साथ बदतमीजी की, जबकि उनसे वही सवाल किए गए थे, जो दर्शन हीरानन्दानी ने अपने हल्फिया बयान में कहे थे। उन्होंने सभी दलों के सांसदों को संबोधित करते हुए कहा कि सभी सांसद संविधान को सामने रख कर अपने दिल पर हाथ रख कर बताएं कि महुआ मोइत्रा ने जो कुछ किया वह सही है या गलत। इस खरी बात को सुनते ही विपक्ष वाकआउट कर गया। सदन के बाहर सोनिया गांधी ने महुआ मोइत्रा के साथ खड़े होकर विपक्ष की प्रतिबद्धता दिखाई। ममता बनर्जी ने भी इस मामले में चुप्पी तोड़कर महुआ मोइत्रा का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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