BJP Ministers: लोकसभा चुनावों में भी मोदी शाह करेंगे नए चेहरों का प्रयोग
BJP Ministers: नये साल पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नए मुख्यमंत्री और उनके साथ प्रदेश की नई कैबिनेट ने आकार ले लिया है। इन तीन राज्यों में सिर्फ भाजपा की नई सरकार का गठन ही नहीं हुआ है, बल्कि राजनीति की पूरी पीढ़ी बदल दी गई है।
देखा जाए तो यह मोदी की शैली के अनुरूप ही है कि असली आश्चर्य चुनावों के दौरान नहीं, उनके बाद आते है। मोदी और शाह की राजनीति में स्थापित सियासतदानों का एक पूरा तबका अपना मूल्य गंवा बैठा है।

मोदी और शाह ने टकसाल से सीधे ढलकर आए नए चेहरों की राजनीतिक खेप को शीर्ष पदों पर बैठा दिया है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं कैबिनेट में भी ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जो गुमनामी से निकलकर सामने आये हैं।
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल खुद पहली बार के विधायक हैं। भजनलाल की टीम में 22 मंत्री में से 17 नए चेहरे हैं। दोनो उपमुख्यमंत्री भी दूसरी बार के विधायक है। राजस्थान की बात करें तो भजनलाल मंत्रिमंडल में 12 कैबिनेट मंत्रियों में 9, स्वतंत्र प्रभार वाले 5 राज्य मंत्रियों में 4 और राज्य मंत्री बनाए गए 5 मंत्रियों में से चार पहली बार मंत्री बने है। अगर मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रीयों को मिला लिया जाए तो 25 में से 20 पहली बार के मंत्री है।
राजस्थान में मुख्यमंत्री चयन से लेकर कैबिनेट चुनने तक केन्द्रीय नेतृत्व ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वसुंधरा की सलाह कहीं नहीं ली गई। वसुंधरा के खास कालीचरण सर्राफ, श्रीचंद कृपलानी जैसे उनके कट्टर समर्थकों को सरकार से बाहर रखा गया है। अब यह भी तय है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में टिकट वितरण भी केन्द्रीय नेतृत्व तय करेगा। उसमें वसुंधरा राजे या राजस्थान के किसी अन्य नेता का कोई योगदान नहीं होगा।
मध्य प्रदेश के साथ साथ राजस्थान को लेकर भी हाईकमान ने साफ संदेश दे दिया है कि अनुभव पद की गारंटी नहीं है। राजस्थान में 8वीं बार के विधायक व मंत्री रहे कालीचरण सर्राफ, 7वीं बार के विधायक व मंत्री प्रताप सिंह सिंघवी, दो बार के सांसद और चौथी बार के विधायक श्रीचंद कृपलानी, सिद्धि कुमारी जैसे दिग्गज मंत्री नहीं बन पाए। ऐसा माना जा रहा था कि जिन इलाकों में पार्टी का बुरा प्रदर्शन रहा है वहां से मंत्री बनाकर लोकसभा को साधने की कोशिश की जाएगी लेकिन ऐसा भी हुआ नहीं।
शेखावटी में भाजपा का खराब प्रदर्शन रहने के बाद भी सिर्फ एक मंत्री झाबर सिंह खर्रा को बनाया गया है। हनुमानगढ़ श्रीगंगानगर से सिर्फ एक सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी को मौका दिया गया। इसके अलावा बांसवाड़ा, बारां, भीलवाड़ा, डूंगरपुर, झालावाड़, राजसमंद और जालौर जिले से भी किसी को मंत्री नही बनाया गया है। जातिगत समीकरण को देखे तो जाट समाज से 4, जट सिख 1, एससी और एसटी के तीन तीन, राजपूत समाज के तीन, ब्राम्हण समाज के सीएम सहित 2, अति दलित समाज के 2 मंत्रियों को भी जगह दी गई है। इसके अलावा ओबीसी के 6 चेहरे भी शामिल हैं।
मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल गठन में भी जातिगत समीकरणों का केन्द्रीय नेतृत्व ने पूरा ध्यान रखा था। मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के ओबीसी मुद्दे का जवाब देते हुए भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्री मिलाकर 13 ओबीसी मंत्री, 5 दलित, 5 आदिवासी और 8 सवर्ण को जगह दी है। मध्य प्रदेश में भी पहली बार विधायक बने 7 चेहरों को भी मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। पहली बार मंत्री बनने वाले मध्य प्रदेश में 17 विधायक हैं। मध्य प्रदेश में हर तीसरा मंत्री ओबीसी है। मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत के 22 दिन बाद और मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के 12 दिन बाद बने मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी 16 फीसदी है। मतलब 5 महिलाओं को कैबिनेट में जगह दी गई है।
लोकसभा की दृष्टि से देखा जाए तो मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से 23 सीटों के विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। यह कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में प्रदेश के 52 जिलों में से 26 जिलों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका है। जिन जिलों को छोड़ा गया है उसमें गुना, बालाघाट, छिंदवाड़ा, धार, खरगोन और खंडवा के अतंर्गत आने वाली 6 लोकसभा सीटों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका। राजस्थान के मंत्रिमंडल को देखें तो राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों को ही राज्य मंत्रिमड़ल में प्रतिनिधित्व मिला है। 7 लोकसभा सीटों से किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया है। बारां, झालावाड़, दौसा, बांसवाड़ा, डुंगरपुर, करौली, धौलपुर, चुरू, झुंझुनूं और भीलवाडा लोकसभा क्षेत्र से कोई मंत्री नहीं है।
मोदी और शाह ने दोनों राज्यों के स्थापित नेताओं को साफ संदेश दे दिया है कि भाजपा पुरानी पीढ़ी और तपे तपाए नेताओं से बाहर निकल रही है। अब सभी राज्यों में और 2024 में केन्द्र में बनने वाली मोदी सरकार में वरिष्ठ नेताओं को नए नेताओं के लिए जगह खाली करने के लिए तैयार रहना होगा। भाजपा संगठन के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी और संघ के बड़े नेता का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान सासंदो में से 40 प्रतिशत सांसदों के टिकट कटना लगभग तय है।
भाजपा के 17 मौजूदा सांसद 75 बरस पार हैं और 42 सांसद 70 बरस से ऊपर की उम्र के हो चुके हैं। पार्टी का मानना है कि कई कार्यकालों के बाद लोकप्रिय और लब्ध प्रतिष्ठित सांसदों के मामले में भी थकान का एक पहलू विकसित हो जाता है इसलिए बदलाव ही हकीकत है। तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों की जीत से पार्टी का यह भरोया पुख्ता हुआ है कि ये बदलाव कारगर हैं और पार्टी के भले के लिए है। तजुर्बे और चुनावी हारों ने बीजेपी को समझाया है कि जातिगत समीकरणों का ध्यान रखना और अधबीच सुधार करना व्यावहारिक राजनीति की अहम कवायद है।
जो पैटर्न मध्य प्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में टिकट बंटवारे के साथ सरकार गठन में दिखा, लगभग वैसा ही पैटर्न 2024 के लोकसभा चुनाव के टिकट बंटवारे ओर मोदी सरकार के गठन में दिखेगा। इस बात की पूरी संभावना है कि लगातार चार बार सांसद रहे नेताओं का टिकट कटना तय है। तीन बार के सांसदों में से 50 प्रतिशत सांसदों के टिकट काटे जाएंगे और दूसरी बार के सांसदों में से 30 प्रतिशत के टिकट काटने का मन पार्टी हाईकमान ने बनाया है।
मोदी शाह लोकसभा चुनाव में टिकट से वंचित होनेवाले वरिष्ठ सांसदों को उनके गृह प्रदेश में संगठन में सक्रिय कर सकते हैं। प्रदेश के बड़े नेताओं को दिल्ली लाने की रणनीति भी बन रही है। इसमें शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया, रमन सिंह के साथ साथ कई ऐसे चौंकाने वाले नाम भी हो सकते हैं जो वर्तमान में प्रदेश के संगठन या प्रदेश की सरकार में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और शाह के मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर लिए गए निर्णय बताते है कि अब केन्द्र और राज्य में राजनेताओं की पूरी पीढ़ी बदलने का पार्टी ने मन बना लिया है। तपे तपाए और आजमाए हुए नेताओं को किनारे करके नये लोगों पर दांव लगाया जाएगा। यही आम चुनाव के लिए चौतरफा मोदी शाह के दबदबे की पटकथा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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