Madhya Pradesh BSP: क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस का खेल खराब करेगी बसपा?
Madhya Pradesh BSP: चुनावों से महीनों पूर्व प्रत्याशियों की घोषणा करने वाली बसपा में इस समय सन्नाटा छाया हुआ है। कांग्रेस के प्रयासों के चलते इंडिया गठबंधन में शामिल होने की बची-खुची संभावनाओं के बीच मायावती की ओर से उत्तर प्रदेश में प्रत्याशी चयन को लेकर खामोशी यह इंगित करती है कि बसपा में अभी कुछ भी ठीक नहीं है।
जिस राज्य में मायावती 4 बार मुख्यमंत्री रही हों और लोकसभा चुनाव में पार्टी के सांसद भी जीतते रहे हों, वहां 80 लोकसभा सीटों में से अब तक मात्र 13 प्रत्याशियों की घोषणा करना कहीं न कहीं राज्य में बसपा के राजनीतिक पतन की कहानी कह रहा है।

हालांकि मध्य प्रदेश के परिपेक्ष्य में ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगा क्योंकि भाजपा और कांग्रेस अपने जिन नेताओं को पार्टी अधिकृत प्रत्याशी नहीं बनाती है, वे सपा-बसपा के टिकट पर अपनी राजनीतिक पारी को आगे बढ़ाते हैं। कई बार इस कवायद में उन्हें सफलता मिलती है तो अधिकांश चुनावों में ये प्रत्याशी किसी न किसी की जीत का गणित बिगाड़ देते हैं।
मध्य प्रदेश में बसपा ने ऐसा कई बार किया है और इस बार भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं क्योंकि कई लोकसभा सीटों पर आयातित नेताओं ने हाथी के सहारे अपनी चाल चलने की तैयारी कर ली है। सपा, कांग्रेस और भाजपा में रह चुके तथा अलग विंध्य प्रदेश की मांग का नेतृत्व करने वाले पूर्व विधायक नारायण त्रिपाठी ने बसपा का दामन थाम लिया और पार्टी ने भी बिना देर किए उन्हें सतना लोकसभा सीट से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है।
इसके अलावा खजुराहो से कमलेश पटेल, सीधी से पूजनराम साकेत, मंडला से इंदर सिंह उईके, छिंदवाड़ा से उमाकांत बंदेवार, मंदसौर से कन्हैयालाल मालवीय और बैतूल से अशोक भलावी को बसपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है। हालांकि पहली सूची के अनुसार, इन सभी में नारायण त्रिपाठी ही किला लड़ाने की क्षमता रखते हैं क्योंकि भाजपा-कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के प्रत्याशी उतारकर सतना में ब्राह्मण और क्षत्रियों को एकजुट होने का अवसर दे दिया है।
दलबदलू छवि के बाद भी नारायण त्रिपाठी लड़ाकू नेता माने जाते हैं और अलग विंध्य प्रदेश की मांग के आंदोलन ने उन्हें बड़ी प्रसिद्धि दी है। यदि वे सतना में चमत्कार कर दें तो बसपा के लिए वर्तमान परिदृश्य में बड़ी बात होगी।
विंध्य और चंबल क्षेत्र में चौंकाती रही है बसपा
एक समय समाजवादियों का गढ़ रहा विंध्य क्षेत्र बसपा की दलित राजनीति की पहली प्रयोगशाला बना था। रीवा संसदीय सीट पहली ऐसी सीट थी जिसने देश में बसपा का पहला सांसद दिया था। 1991 के लोकसभा चुनाव में रीवा लोकसभा सीट से बसपा प्रत्याशी भीम सिंह पटेल ने विंध्य के सफेद शेर कहे जाने वाले दिग्गज कांग्रेसी नेता श्रीनिवास तिवारी को हराया था।
1996 में बुद्धसेन पटेल और 2009 में देवराज पटेल भी रीवा से बसपा सांसद बनने में सफल रहे थे। इसके बाद बसपा का ग्राफ इस क्षेत्र में अप्रत्याशित रूप से गिरा जिसका सीधा लाभ भाजपा को हुआ। वर्तमान में बसपा यहां दूसरे या तीसरे नंबर की पार्टी है और इसके प्रत्याशी किसी भी राजनीतिक दल का गणित बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।
रीवा से ही लगी सतना लोकसभा सीट पर भी बसपा अपना परचम लहराने में सफल रही है। 1996 के लोकसभा चुनाव में बसपा के सुखलाल कुशवाहा ने भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा और कांग्रेस से टूट कर बनी तिवारी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को हराकर देशवासियों को अचंभित कर दिया था।
हालांकि बसपा इस जीत को कायम नहीं रख सकी और उसका जनाधार सतना लोकसभा में सिकुड़ता चला गया। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिन सुखलाल कुशवाहा ने सतना में बसपा का खाता खोला था, इस बार उनका पुत्र सिद्धार्थ कुशवाहा कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर भाजपा के गणेश सिंह से मुकाबला करते दिखेगा।
विंध्य क्षेत्र की ही सीधी और शहडोल लोकसभा सीट पर भी बसपा प्रत्याशी कई बार कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बने हैं जिसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा को मिलता है। हालांकि इन दोनों लोकसभा सीटों पर बसपा का खाता अभी तक नहीं खुला है।
इसी प्रकार उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे चंबल क्षेत्र में भी बसपा ने कई बार भाजपा-कांग्रेस का सियासी गणित बिगाड़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मुरैना लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा के सामने कांग्रेस के कद्दावर नेता डॉ. गोविंद सिंह लड़ रहे थे। इस लोकसभा सीट पर जातिवाद हावी है अतः ब्राह्मण और क्षत्रिय दो खेमों में बंट गए थे। ऐसे में बसपा ने क्षत्रिय समाज के ही वृन्दावन सिकरवार को उतारकर डॉ. गोविंद सिंह की हार सुनिश्चित कर दी। कांग्रेस के डॉ. गोविंद सिंह तीसरे स्थान पर रहे।
इस बार अभी तक बसपा ने इस सीट के लिए अपने प्रत्याशी का एलान नहीं किया है किंतु कांग्रेस की सांसें इस सीट पर अटकी हुई हैं। यही कारण है कि कांग्रेस बसपा के प्रत्याशी की घोषणा के बाद ही अपना प्रत्याशी उतारेगी। अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित भिंड सीट पर मामला और रोमांचक है। मध्य प्रदेश में बसपा के हाथी को पहचान दिलाने वाले पूर्व बसपा प्रदेश अध्यक्ष फूल सिंह बरैया अब कांग्रेस के साथ हैं और भिंड से भाजपा की संध्या राय के सामने मजबूती से खड़े हो गए हैं। यानी 2019 का लोकसभा चुनाव जो संध्या राय के लिए आसान था, वह अब मुश्किल हो गया है क्योंकि फूल सिंह बरैया को कांग्रेस के साथ ही बसपा के कोर वोटर का भी समर्थन मिलता दिख रहा है।
यहां अभी बसपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं और संभवतः फूल सिंह बरैया से मायावती के संबंधों के चलते भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हो। यहां गौर करने वाली बात है कि उत्तर प्रदेश से ही सटे मप्र के बुंदेलखंड वाले हिस्से में आने वाली लोकसभा सीटों पर साइकिल ने हमेशा ही हाथी की चाल को पस्त किया है। सागर, टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह लोकसभा सीटों पर बसपा मात्र प्रतीकात्मक रूप से ही अपने प्रत्याशी उतारती है जबकि उसके हाथ कुछ नहीं लगता।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशियों की घोषणा में देरी का कारण भी कहीं न कहीं बसपा फैक्टर है क्योंकि दोनों ही दल जाति-वर्ग आधारित राजनीति करते हैं और दोनों का कोर वोटर भी लगभग एक सा है। हां, नरेंद्र मोदी ने बसपा के बड़े वोट बैंक को अपनी ओर मोड़ा है किंतु अभी भी उसका कोर उससे छिटका नहीं है। यानी कांग्रेस को विंध्य, चंबल और बुंदेलखंड की लोकसभा सीटों पर बसपा से बड़ा खतरा है क्योंकि यदि वोट बंटता है तो उसका लाभ भाजपा को होना निश्चित है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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