बीजेपी के लिए कुछ नयी उम्मीदें भी हैं
BJP: इसे विडंबना कहें या कुछ और, संसद का नया भवन बनवाने वाले प्रधानमंत्री की अगुआई में जब अठारहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसके साथियों की संख्या घट चुकी होगी। मोदी समर्थकों और बीजेपी के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के लिए यह नजारा कष्टदायक होगा। किंचित वे निराश भी होंगे, यह बात और है कि लोकसभा में उनका सबसे बड़ा दल होगा, इसलिए वे अपनी निराशा को झटककर आगे निकलने की कोशिश करेंगे।
भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने कमजोर प्रदर्शन की मीमांसा जरूर करेगा, कमजोर कड़ियों को दुरूस्त करने की कोशिश भी करेगा। दस साल पहले मोदी की अगुआई वाली सरकार का आधार भले ही बीजेपी को मिला बहुमत था, फिर भी वह गठबंधन की सरकार थी। सरकार में शिवसेना, जनता दल यूनाइटेड, शिरोमणि अकाली दल शामिल थे।

चूंकि बीजेपी का बहुमत था, इसलिए वह अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने से पीछे नहीं हटती थी। लेकिन अब उसके लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा।
सत्ता के इस तनाव से बचने के लिए वह सोच भी रही होगी। फिर भी कुछ संभावनाएं हैं, जिनके घटित होने की उम्मीद की जा सकती है।
राजनीति में किसी भी दल की भूमिका और प्रदर्शन का पूर्ण विराम नहीं होता। अगर ऐसा होता तो 1984 में दो सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में शासन का तीसरा कार्यकाल हासिल नहीं कर पाती। 2014 में महज 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस 99 की संख्या नहीं हासिल कर पाती। इसीलिए राजनीति को संभावनाओं और आशंकाओं का खेल कहा जाता है।
चूंकि बीजेपी पिछले दो कार्यकाल की तुलना में राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर हुई है, इसलिए उसके लिए कुछ संभावनाएं जरूर बनती हैं। इन संभावनाओं की सबसे ज्यादा गुंजाइश महाराष्ट्र में बनती है। पहली संभावना यह नजर आती है कि महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना का बीजेपी में विलय हो जाए। इसकी कोशिश शिंदे या बीजेपी, किसी भी ओर से हो सकती है। ऐसा होने से शिंदे की ताकत भी बढ़ सकती है और बीजेपी की भी।
महाराष्ट्र में इसी साल के आखिर में विधानसभा का भी चुनाव होना है। अगर बीजेपी को सत्ता की केंद्रीय धुरी बने रहना है तो उसे अपनी ताकत बढ़ानी होगी। इसके लिए सबसे सहज और संभाव्य विकल्प यही लगता है कि शिंदे की पार्टी का बीजेपी में विलय हो जाए। चूंकि उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना के लिए केंद्रीय सत्ता पांच साल दूर है, इसलिए उनके लिए इतने दिन सत्ता से दूर रहना आसान नहीं होगा। भारतीय जनता पार्टी की स्वाभाविक सहयोगी शिवसेना रही है। अगर शिंदे की शिवसेना का बीजेपी में विलय हो जाता है तो उद्धव के लिए भी बीजेपी के साथ खड़ा हो जाना आसान होगा।
महाराष्ट्र में एक और संभावना राजनीति की पारखी नजरें देख सकती हैं। मराठा क्षत्रप शरद पवार अपनी आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं। अजित पवार अलग होकर कोई खास करामात नहीं दिखा सके हैं। वैसे कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उनको साथ लाने का ही नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ा है।
जो बीजेपी अजीत पवार को साढ़े तीन सौ करोड़ के सिंचाई घोटाले का कर्णधार बताती रही, वही उन्हें साथ लेकर आई। इससे बीजेपी का प्रतिबद्ध कार्यकर्ता पसोपेश में पड़ गया तो आम मतदाता भी चिढ़ गया। शरद पवार उन्हें सबक सिखाने की भी सोचेंगे। फिर शरद पवार की ख्याति सत्ता से दूर न रहने वाले नेता की है। दस साल से वे सत्ता से दूर हैं। जीवन के आखिरी दौर में और पांच साल सत्ता से दूर रहना आसान नहीं होगा। इसलिए शरद पवार किसी बहाने से बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए की सत्ता को समर्थन देने के लिए आगे आ सकते हैं।
बीजेपी इन संभावनाओं पर काम करती है तो पार्टी को सीधे शिंदे की शिवसेना की सात सीटों का साथ मिल जाएगा। फिर शिवसेना उद्धव ठाकरे और एनसीपी मिलाकर सोलह सीटों का बाहरी समर्थन मिल जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो तय है कि बीजेपी की जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू पर निर्भरता कम होगी।
साल 1998 और 1999 की अटल सरकार को चंद्रबाबू नायडू का बाहर से समर्थन था। इस समर्थन की कीमत नायडू अपने ढंग से अटल सरकार से वसूलते रहे। तब मुफ्त राशन की बजाय कोटे के राशन का जमाना था। नायडू हमेशा आंध्र के लिए ज्यादा वसूल लेते थे। वाजपेयी सरकार से तमाम योजनाएं आंध्र प्रदेश के नाम कर लेते थे। हैदराबाद और सिकंदराबाद को साइबराबाद बनाने की दिशा में उन्होंने कई योजनाएं चलाई थीं। जिनके लिए अटल सरकार पर समर्थन के एवज में दबाव बनाकर नायडू धन हासिल कर लेते थे।
इसलिए यह मानने का कोई आधार नहीं है कि लंबे समय बाद आंध्र की सत्ता में लौटे नायडू बदल गए होंगे। हालांकि बीजेपी ने उन्हें एनडीए का संयोजक बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसके बावजूद राजनीति में कुछ भी निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता। इसलिए महाराष्ट्र की संभावनाएं बीजेपी के लिए जरूरी बनती हैं।
केंद्रीय स्तर पर किंचित निराश करने वाले नतीजे के साथ ही बीजेपी के लिए उड़ीसा से उम्मीदजनक समाचार भी है। पार्टी ने राज्य की 21 लोकसभा सीटों में से 20 पर जीत हासिल की है। जबकि 1999 से सत्ता में रहे राज्य के बीजू जनता दल को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली है। बीजू जनता दल में नवीन पटनायक के बाद कोई दूसरी पंक्ति का नेतृत्व नहीं उभर पाया है। ऐसे में बीजू जनता दल के सामने अस्तित्व का संकट है। भाजपा इस अवसर का लाभ उठा सकती है।
आमतौर पर जिसकी सत्ता होती है, निर्दलीय उसी के साथ जाते हैं। इस बार सात निर्दलीय भी जीतने में कामयाब रहे हैं। उनमें से ज्यादातर का साथ बीजेपी को ही मिलने की संभावना है। क्योंकि सत्ता की मलाई मिले ना मिले, मलाई का साथ राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए टॉनिक का काम करता है। इस टॉनिक की चाहत में वे साथ आ सकते हैं।
2004 के आम चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल होने वालों की होड़ लग गई थी, किसी दिन अनवारूल हक शामिल हो रहे थे तो किसी दिन नागमणि, तो किसी दिन पीसी थॉमस तो किसी दिन कोई और। लगता था, जैसे वाजपेयी की अगुआई में लहर चल रही हो और उस लहर पर सभी सवार होना चाहते हैं। कुछ इसी अंदाज में इस बार भी ऐन चुनावों के पहले बीजेपी में विपक्षी दलों के लोग शामिल हो रहे थे। लेकिन 2004 में लहर नहीं चल पाई, उससे कुछ बेहतर स्थिति इस बार है, लेकिन वैसी लहर फिर नहीं चली।
इससे साबित होता है कि ऐन चुनावों के पहले दलों में आवाजाही को मतदाता पसंद नहीं कर रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि आवाजाही का खेल चुनावों के ऐन पहले नहीं, बल्कि काफी पहले हो तो शायद मतदाता इसे भूल जाए। वैसे भी दलबदल विरोधी कानून के चलते भी हर नेता अपनी सदस्यता का कार्यकाल पूरी कर लेना चाहता है, उसे गंवाना नहीं चाहता। बीजेपी को दो बार इसका नुकसान उठाना पड़ा है। इसलिए हो सकता है कि अब सीख लेकर ऐसे कदम उठाने के लिए वह ऐन चुनाव के पहले का वक्त ना चुने।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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