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Crimes in Bihar: बद से बदतर होती बिहार की कानून व्यवस्था

जब जब लालू परिवार बिहार में सत्ता का हिस्सा होता है, बिहार की कानून व्यवस्था की हालत खराब होने की खबरें बाहर आने लगती हैं। क्या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी होती है या सचमुच बिहार में हालात खराब हो रहे हैं?

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Crimes in Bihar: कानून व्यवस्था की स्थिति कैसी है? किसी राज्य को लेकर आम तौर पर व्यवसायी, निवेशक, कामकाजी मध्यम वर्ग और गवर्नेंस का मूल्यांकन करने वाली एजेंसियों के लिए यह प्रमुख मानदंड होता है। चुनाव के अवसरों पर विपक्षी पार्टियों के लिए भी यह बड़ा मुद्दा बन जाता है। ऐसा भारत में ही नहीं कमोबेश पूरी दुनिया में होता है। लेकिन बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहां आम से लेकर खास, हरेक आदमी सरकार के इकबाल को इसी पैमाने पर मापते हैं।

यही वह मुद्दा है जिसने पिछले 18 वर्षों से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बनाए रखने में सर्वाधिक सहायता की है। अपने प्रथम कार्यकाल में उन्होंने 'सुशासन बाबू' की अपनी जो छवि बनाई थी, उसका लाभ उन्हें अब तक मिलता आया है। लेकिन यह भी सच है कि जब-जब नीतीश कुमार भाजपा को छोड़ राजद के साथ सरकार बनाते हैं, प्रदेश में 'जंगल राज रिटर्न्स' की चर्चा गर्म होने लगती है। महागठबंधन सरकार बनने के बाद यह चर्चा पिछले छह-सात महीनों से आम है। लगभग हर दिन भाजपा के कोई न कोई नेता राज्य में जंगल राज होने का आरोप लगाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में यह विपक्षी पार्टियों का राजनीतिक शिगूफा मात्र है या इसमें कोई सच्चाई है?

बिहार विशाल आबादी वाला राज्य है। आज भी राज्य में गरीबी है और कई सुदूर इलाके पुलिस थाने से काफी दूर हैं। इसलिए अपराधिक घटना स्वभाविक है। लेकिन हाल के समय में जो गंभीर अपराध हो रहे हैं, उसे जस्टीफाई करना मुश्किल है। राजधानी पटना के पास बस पार्किंग को लेकर कहासुनी पर 50 राउंड गोली चलना, घरों, वाहनों को आग के हवाले कर देना, तीन लोगों की मौत हो जाना, एक मुखिया द्वारा निर्दोष युवकों को घर में बांधकर तालिबानी अंदाज में लाठी-रॉड से मौत के मुंह में पहुंचा देना, बलात्कार की कोशिश में विफल रहने पर पीड़िता को मां के साथ घर में बंद कर जलाने की कोशिश करना, गांवों तक में सुपारी किलिंग की प्रवृत्ति आम होना.... ये सब रुटीन क्राइम की घटना नहीं कही जा सकती। लेकिन हाल के दिनों में यह सब हो रहा है और लगातार हो रहा है।

अपराध की यह प्रवृत्ति जितनी चिंताजनक है, उससे कहीं अधिक चिंताजनक है पुलिस के इकबाल में कमी का संकेत। बीते एक महीने में बिहार पुलिस पर 16 बार हमले हो चुके हैं। सीतामढ़ी का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है। इसमें लोगों की भीड़ लाठी-डंडा, बंदूक से पुलिस बल पर हमला करते दिख रही है। पुलिस ड्राइवर कभी गाड़ी बैक कर रहा है तो कभी आगे ले जा रहा है। भीड़ भी गाड़ी के साथ-साथ दौड़ती और हमला करती दिख रही है। इस हमले में 3 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इससे पूर्व समस्तीपुर में 2 बार, जमुई में 3 बार, बांका में 2 बार, सहरसा में 2 बार, अररिया में 2 बार और पटना में 4 बार पुलिस पिट चुकी है।

हाल में ही बेगूसराय में एक युवक की हत्या के बाद भीड़ स्थानीय थाना पर हमला करने पहुंच गई। हाथ में लाठी-डंडे और कुदाल लेकर बच्चे, युवा और महिलाएं भगवानपुर थाने घुस गए। इसके बाद जिसे जो मिला उसे तोड़ा। भीड़ ने इस दौरान बाजार में कुछ पुलिस वाले दिखे तो उन्हें भी दौड़ा-दौड़कर पीटा। बांका में पुलिस पर पथराव एवं झड़प का एक वीडियो सामने आया है। घटना 17 फरवरी की है। जहां टाउन थाना की पुलिस बालू माफियाओं के खिलाफ छापेमारी करने गई थी। इस दौरान पुलिस से बदमाशों ने हाथापाई की। माफिया पुलिस के चुंगल से बालू लदी ट्रैक्टर छुड़ाकर फरार हो गए। पथराव से बचने के लिए पुलिस को मौके से भागना पड़ा। अब इसका वीडियो सामने आया है। अपराधियों का मनोबल किस कदर बढ़ चुका है इसका अंदाज कुछेक महीने पहले की एक चर्चित गोलीबारी से लगाया जा सकता है। पटना में उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के अपने ममेरे भाई और पूर्व राजद सांसद सुभाष यादव के बेटे पर गोली चला दी गई।

कानून व्यवस्था की स्थिति कितनी चिंताजनक होती जा रही है, इसका एक नमूना सोशल मीडिया और लोकल म्यूजिक मीडिया में भी देखने को मिलता है। धड़ल्ले से ऐसे वीडियो प्रसारित हो रहे हैं, जिसमें कोई व्यक्ति दूसरी जाति को सामूहिक रूप से गंदी गाली दे रहा होता है। कथित गायकों की एक बड़ी टोली उभर आई है, जो जातीय गाली से भरे गाने और एल्बम रीलिज कर रहे हैं। इस पर लगाम लगाने की बात वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कई बार कर चुके हैं, लेकिन यह सब कम होने के बजाय बढ़ता ही प्रतीत होता है।

यह और बात है कि सत्ताधारी दल के नेता 'जंगल राज रिटर्न्स' के आरोप को भाजपा का दुष्प्रचार कहते रहे हैं। तेजस्वी यादव कई बार कह चुके हैं, 'जब भाजपा सत्ता में होती है, तो मंगल राज होता है, जब वह सत्ता से बाहर जाती है तो जंगल राज का प्रचार किया जाता है।' इसी तरह के जवाब जद-यू और राजद के अन्य नेता भी देते हैं। लेकिन हाल की घटनाओं के बाद सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं ने इस पर खामोशी ओढ़ ली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी 44 दिनों की समाधान यात्रा में कभी भी कानून व्यवस्था की चुनौती पर कोई टिप्पणी नहीं की।

पुराने अनुभव बताते हैं कि बिहार में कानून व्यवस्था की आखिरी लगाम राजनीतिक नेतृत्व के पास ही रहती है। इसी बात को रेखांकित करते हुए वर्षों पूर्व पटना उच्च न्यायालय ने तत्कालीन राजद सरकार को आड़े हाथों लेते हुए 'जंगल राज' की टिप्पणी की थी। और इसके साथ ही तत्कालीन लालू सरकार पर जंगल राज का ठप्पा लग गया। 2005 के बाद एनडीए की सरकार ने कानून-व्यवस्था को पहली प्राथमिकता दी थी और कुछ ही वर्षों में हालात में अविश्वनीय परिवर्तन दिखने लगे थे। अब सवाल है कि क्या वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के लिए कानून व्यवस्था पहली प्राथमिकता है?

तीन महीने पहले जब अपराध नियंत्रण के लिए प्रसिद्ध आईपीएस राजविंदर सिंह भट्टी को राज्य सरकार ने डीजीपी बनाया था, तो प्रदेश के लोगों को एक उम्मीद बंधी थी। पद संभालने के बाद, भट्टी ने कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस अधिकारियों के साथ ताबड़तोड बैठकें, योजना आदि की शुरुआत भी की थी। लेकिन उन उपायों के बाद भी जमीन पर कानून व्यवस्था की स्थिति दिन-प्रतिदिन क्यों खराब होती जा रही है, इसका उत्तर किसी के पास नहीं है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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