Krishna Janmashtami: हाथ थामकर जीवन की दिशा दिखाते कृष्ण
Krishna Janmashtami: भारत में ईश्वर का हर अवतार पूजनीय है पर कृष्ण तो मानो हर घर के सदस्य से लगते हैं। अपने से और अपनेपन से भरे भाव से कुछ सिखाते-समझाते से। भगवान कृष्ण सम्पूर्ण संसार के लिए शिक्षक जैसे हैं। जीवन से जुड़े हर पहलू, हर परिस्थिति के लिए पथ प्रदर्शक। यही वजह है कि सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में सारथी की भूमिका में रहने वाले कृष्ण एक सच्चे हितैषी कहे जाते हैं।
कैसा सुंदर ईश्वरीय अवतार कि उनका चरित्र निर्माण, ध्वंस, क्रोध, करुणा, आध्यामिकता के ही नहीं साहित्य और कला के रंग भी लिए हैं। मानवता के प्रतिनिधि और लोक कल्याण के मार्गदर्शक कहे जाने वाले कृष्ण जीवन में आनंद और प्रेम को भी उतना ही ज़रूरी मानते हैं जितना विश्वास और मर्यादा की डोर को थामे रहना। उनका जीवन जितना रोचक उतना ही मानवीय और मर्यादित भी। इसीलिए आम इंसान को सहजता से बहुत कुछ सिखाता समझाता है नंदगांव के कन्हैया से लेकर भगवदगीता के श्रीकृष्ण तक उनका चरित्र। जीवन जीने के अर्थपूर्ण संदेश संजोये कृष्ण के जीवन से जुड़ी बातें और उपदेश हमारे बचपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक हर विषय से जुड़े सारगर्भित सूत्र लिए हैं।

विज्ञान और तकनीकी तरक्की के इस दौर में भी उनके दिए संदेश बहुत व्यावहारिक से लगते हैं। जमीनी धरातल पर जीवन को साधने की हर सीख परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र तक हर मोर्चे पर जरूरी लगती है। असल में इंसान के विचार और व्यवहार स्वयं अपनी ही नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं। कृष्ण के सन्देश इन दोनों पक्षों के परिष्करण पर बल देते हैं। कृष्ण एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो। समस्याओं से जूझने की ललक लिए हो। गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं।
महान दार्शनिक श्री अरविंदो ने कहा था कि 'भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है।' दुनिया के जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा है कि 'श्रीकृष्ण के उपदेश अतुलनीय हैं।' कृष्ण से जुड़ी हर बात हमें जीवन के प्रति जागृत होने का सन्देश देती है।
मानव मन और जीवन के कुशल अध्येता कृष्ण यह कितनी सरलता और सहजता से बताते हैं कि जीवन जीना भी एक कला है। अवसाद, अपराध और आत्महत्या के बढ़ते आंकड़ों के दौर में लगता है कि हम जीवन जीने की कला ही तो भूल रहे हैं। बनाने-जुटाने और सबको पीछे छोड़ देने के फेर में हर आयुवर्ग के लोग मन-जीवन को बिखरते देख रहे हैं। हालिया बरसों में हम प्रेम और प्रकृति से इस प्रकार दूर हुए हैं कि संवेदनाएं ही सूख गई हैं।
आज, सूखती संवेदनाओं के परिवेश में कृष्ण का चरित्र यह समझाता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है जो कृष्ण ने जिया। ऐसा भाव जिसमें सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम किया जाए। यही अलौकिक प्रेम हम सबको को आत्मीय सुख दे सकता है। मनुष्यों ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों के लिए उनका एकात्म भाव देखते ही बनता है। इसी जुड़ाव में जन कल्याणकारी चेतना भी समाई है।
कृष्ण का जीवन प्रकृति के बहुत समीप रहा है। प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व रहा वह परिवेश और पर्यावरण के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है। कदम्ब का पेड़ और यमुना का किनारा उनके लिए बहुत विशेष स्थान रखते थे। दरकते पहाड़, दमघोटू होती हवा और विलुप्त होते वन्यजीवों और वनस्पतियों के इन हालातों में प्रकृति से जुड़ा यह स्नेहभाव हमें आत्मावलोकन की राह सुझाता है। वहीं प्रकृति के बीच पलते उनके इस रूप का स्मरण ही उनके विलक्षण चरित्र को आनन्द और उल्लास का प्रतीक बनाता है। संभवतः यह भी एक कारण है कि कान्हा का नाम लेने से ही मन में उल्लास और उमंग छा जाती है।
वस्तुतः सम्पूर्ण प्रकृति की चेतना से जुड़ना ही सच्ची मानवता है। कान्हा का गायों की सेवा और पक्षियों से प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित करती है, पोषित करती है। सच में कभी कभी लगता है कि हम सबमें इस चेतन तत्व का विकास होगा तभी तो आत्म तत्व जागृत हो पायेगा। प्रकृति से जुड़ा सरोकार का यह भाव मानवीय सोच को साकार करने वाला है। मनुष्यों ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों के लिए उनका एकात्म भाव देखते ही बनता है। समझना कठिन नहीं कि विचार, व्यवहार और अपनत्व का यह भाव आज के जद्दोजहद भरे जीवन में सबसे ज़रूरी है।
कर्म के समर्थक कृष्ण सही अर्थों में जीवन गुरु है। कर्म ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। वर्तमान समय में मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर भी समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने वाला बड़ा कारक है। ज्ञात हो कि कर्म की प्रधानता श्रीकृष्ण के संदेशों में सबसे ऊपर है। यही वजह है कि वे ईश्वरीय रूप में भी आम लोगों से जुड़े से दिखते हैं। किसी परिजन के समान हमारा हाथ थामकर जीवन से जुड़े पढ़ाते से लगते हैं। हर उलझन में सही दिशा दिखाने, सार्थक निर्देश देने की भूमिका में दिखते हैं। उनके मार्गदर्शन की सूची में सबसे पहला सबक निरत कर्मशील रहने का ही है।
कर्मशीलता का सिद्धांत कहता है कि व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र-समाज। अधिकतर समस्याओं का हल देश के नागरिकों के विचार और व्यवहार पर ही निर्भर है। ऐसे में कृष्ण कर्मशील होने का सन्देश सृजन की राह सुझाता है। संकल्प की शक्ति देता है। कर्मठता का भाव पोषित करता है। यही शक्ति हर नागरिक के लिए अधिकारों की सही समझ और कर्तव्य निर्वहन के दायित्व की सोच की पृष्ठभूमि बनती है।
कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या पैदा करने की नहीं बल्कि समाधान ढूँढने की बात करती है। तभी तो भाग्य की बजाय कर्म करने पर विश्वास करने की सीख देने वाला मुरली मनोहर का दर्शन आज के दौर में सबसे अधिक प्रासंगिकता रखता है। कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा मार्ग ही समझते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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