Khalistan and Amritpal: कितनी बड़ी है 'अमृतकाल' में 'अमृतपाल' की चुनौती?
सुरक्षा एजंसियों ने अमृतपाल के समर्थकों पर कार्रवाई शुरु कर दी है।एक ओर जहां विदेशी समर्थकों को गिरफ्तार किया जा रहा है,वहीं उसके हथियारबंद समर्थकों का लाइसेंस रद्द किया जा रहा है।

पंजाब पुलिस के प्रमुख गौरव यादव ने स्वीकार किया है कि "पंजाब के हालिया हिंसक घटनाक्रम के पीछे पाकिस्तान में बैठे खालिस्तान समर्थक आकाओं का मन और धन काम कर रहा है"। अब सवाल यह उठता है कि क्या जिस तरह इंदिरा गांधी ने प्रारंभ में भिंडरावाले को पाला पोसा था, अमृतपाल ठीक उसी तरह का कोई सियासी किरदार तो नहीं? हालांकि प्रशासन ने अमृतकाल में उभरे अमृतपाल की चुनौती को गंभीरता से लेना शुरु कर दिया है और छिटपुट कार्रवाई भी शुरु कर दी है। फिर भी खालिस्तान के खतरे को देखते हुए जिस व्यापक स्तर पर कार्रवाई की दरकार है, उसका अभाव दिखता है।
पिछले महीने 23 फरवरी को अमृतसर के अजनाला के थाने पर हिंसक हमला कर थाने में बंद अपने साथी को छुड़ाकर अमृतपाल विजय जुलूस की शक्ल में स्वर्ण मंदिर तक गया, तब भी पुलिस ने उससे कोई पूछताछ करने की जहमत नहीं उठाई। अब वह खालिस्तान की मांग करते हुए दिल्ली द्वारा किए जा रहे 'अन्याय' 'अत्याचार' को रेखांकित कर भटके हुए युवाओं को गोलबंद कर रहा है। इस बात के ठोस सबूत हैं कि खालिस्तान के नाम पर देशद्रोही ताकतें इस कुचक्र की बाकायदा फंडिंग करती रही हैं।
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि भारत की जांच एजेंसियां छिटपुट गिरफ्तारी से आगे बढ़कर फाइनेंसियल सर्विलांस मेकेनिज्म के जरिए इनके वित्तीय स्रोतों पर प्रहार क्यों नहीं करती? यहां यह भी विचारणीय है कि हाल में न्यूयॉर्क के स्वामीनारायण मंदिर और आस्ट्रेलिया के इस्कॉन मंदिरों पर खालिस्तान के समर्थन में पोस्टर चिपकाने, भारत विरोधी नारे लगाकर हिंदू और सिखों में मतभेद पैदा करने तथा ठीक उसी समय पंजाब में हिंसक वारदातों को अंजाम देने और खालिस्तान के नाम पर युवाओं को उकसाने की घटनाओं के बीच कोई साम्य है, क्या इनके तार आपस में जुड़े हैं?
दरअसल इसे समझने के लिए हमें खालिस्तान के लिए उठने वाली मांग के इतिहास को खंगालना होगा। खालिस्तान आंदोलन की कहानी 1929 से शुरु होती है। कांग्रेस के लाहौर सेशन में मोतीलाल नेहरु ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा था। इस दौरान तीन तरह के समूहों ने प्रस्ताव का विरोध किया था।
पहला, मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग, दूसरा समूह दलितों का था जिनकी अगुवाई डॉक्टर भीमराव अंबेडकर कर रहे थे। अंबेडकर दलितों के लिए अधिकारों की मांग कर रहे थे और तीसरा गुट मास्टर तारा सिंह की अगुवाई में शिरोमणि अकाली दल का था। तारा सिंह ने पहली बार सिक्खों के लिए अलग राज्य की मांग रखी। 1947 में यह मांग आंदोलन में बदल गई जिसका नाम दिया गया "पंजाबी सूबा आंदोलन"। शिरोमणि अकाली दल भारत में ही भाषाई आधार पर एक अलग सिख प्रदेश की मांग कर रहा था। स्वतंत्र भारत में बने राज्य पुनर्गठन आयोग ने यह मांग मानने से इंकार कर दिया।
पूरे पंजाब में 19 वर्षों तक अलग सिख सूबे के लिए आंदोलन, प्रदर्शन होते रहे। आखिरकार 1966 में इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला किया। सिक्खों की बहुलता वाला पंजाब, हिंदी भाषा बोलने वालों के लिए हरियाणा और तीसरा हिस्सा चंडीगढ था। राज्य के कुछ पर्वतीय इलाकों को हिमाचल प्रदेश में मिला दिया गया। इस बंटवारे का सर्वाधिक लाभ शिरोमणि अकाली दल को प्राप्त हुआ। वर्ष 1967 और 1969 में शिरोमणि अकाली दल की राज्य में सरकार बनी। सन 1972 के चुनाव में मिली करारी हार के बाद 1973 में अकाली दल ने राज्य के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग "आनंदपुर साहिब प्रस्ताव" के जरिए उठाई। इस प्रस्ताव के पक्ष में सिक्खों का समर्थन लगातार बढ़ता गया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सिख समुदाय भारत की शान है। राष्ट्र की सुरक्षा में सिख समुदाय का अहम योगदान रहा है। जिन थोड़े से लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए सिखों के लिए भारत से अलग राष्ट्र की मांग उठाई और पूरी कौम को बदनाम करते रहे उनमें जगजीत सिंह चौहान का नाम सबसे पहले आता है। जगजीत ने आनंदपुर साहिब में 12 अप्रैल 1980 को तथाकथित काउंसिल आफ खालिस्तान बनाई थी और अपने आपको उसका राष्ट्रपति घोषित किया था।
यह वही जगजीत सिंह चौहान था जिसे 1971 में पाकिस्तान के तानाशाह जनरल याहिया खान ने पाकिस्तान आने का आमंत्रण दिया था। उसी वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने जनरल याहिया खान के साथ मिलकर खालिस्तान आंदोलन को हवा देने का षड्यंत्र रचा था। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि पाकिस्तान की आईएसआई और अमेरिका की सीआईए दोनों की खालिस्तान आंदोलन को बढ़ावा देने में अहम भूमिका थी।
विदेशों में बसे सिखों से मिलकर जगजीत चौहान ने आंदोलन के लिए भारी मात्रा में धनराशि एकत्र की तथा न्यूयॉर्क टाइम्स में स्वतंत्र सिख राष्ट्र के लिए विज्ञापन छपवाया। चौहान के एक साथी बलवीर सिंह सिद्धू ने स्टाम्प और खालिस्तानी डॉलर चलाने का भी प्रयास किया। इन लोगों ने कनाडा, अमेरिका और जर्मनी में भी खालिस्तान आंदोलन को गति दी। भिंडरावाले को खालिस्तान का बड़ा चेहरा बनाया गया। आईएसआई द्वारा भेजे गए अवकाश प्राप्त पाकिस्तानी सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश की और खालिस्तान आंदोलन को चरम पर पहुंचाया।
सन 1982 में भिंडरावाले ने शिरोमणि अकाली दल से हाथ मिला लिया। यही आंदोलन आगे चलकर सशस्त्र विद्रोह में बदल गया। इस दौरान जिसने भी भिंडरावाले का विरोध किया वह उसकी हिट लिस्ट में आ गया। भिंडरवाले ने पंजाब की धरती से हिंदू आबादी को खत्म करने के लिए सिखों को उकसाया।
बताया जाता है कि अकाली दल का राजनीतिक प्रभाव कम करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी ने भिंडरावाले का समर्थन किया। इस दौरान भिंडरवाले स्वर्ण मंदिर में जा घुसा तथा अकाल तख्त पर काबिज हो गया। इसकी अंतिम परिणीति के लिए सेना को बुलाना पड़ा और ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया गया।
भारत के बाहर कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जहां सिख समुदाय का अच्छा प्रतिनिधित्व है, वहां से खुले तौर पर आंदोलन की फंडिंग होती है। वहां की सरकारें देश के कानून का हवाला देकर ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। आज पूरी दुनिया में सिख समुदाय की आबादी ढाई करोड़ से ऊपर है जिनमें 90% भारत में रहते हैं बाकी अन्य देशों में बसे हुए हैं। कनाडा में 7.72 लाख, इंग्लैंड में 5.2 लाख, अमेरिका में 4.73 लाख तथा आस्ट्रेलिया में 2.10 लाख सिख रहते हैं। भारत में सबसे अधिक सिखों की आबादी पंजाब में 58% है।
खालिस्तानियों ने प्रस्तावित खालिस्तान की भौगोलिक सीमा भी तय कर रखी है। गत दिनों पंजाब के तरनतारन में हथियार लहराते हुए अपने समर्थकों के साथ अलग खालसा राज की मांग करते हुए अमृतपाल ने महाराजा रणजीत सिंह के समय का भी उल्लेख किया, जब हिमाचल, हरियाणा और कश्मीर भी पंजाब के ही हिस्से हुआ करते थे। अब खालिस्तान के तथाकथित नक्शे में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्से जोड़े गए हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से खालिस्तान आंदोलन को नए सिरे से संगठित किए जाने की खबरें भी आती रही है।
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने खालिस्तान लिबरेशन फोर्स और बब्बर खालसा इंटरनेशनल जैसे समूहों को पंजाब में आतंकी गतिविधियां चलाने और यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में कट्टरपंथियों के साथ संपर्क बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। सवाल है कि सीमा पार से भारत की एकता अखंडता एवं संप्रभुता पर घात करने वाले नापाक तत्वों के इरादे से निपटने के लिए भारत को क्या करना चाहिए?
हालांकि वर्ष 2021 में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने ब्रिटेन, इटली और कनाडा स्थित अलगाववादी गुटों से जुड़े खालिस्तानी समूहों को बेअसर करने में बहुत हद तक सफलता हासिल की है लेकिन दुश्मन ताकतें जिस तरह से भारत को अस्थिर करने की फिराक में हैं उससे निपटने के लिए जांच एजेंसियों को और अधिक चाक चौबंद होकर कड़े कदम उठाने होंगे। तथा देश में चल रहे अमृतकाल के दौरान यदा-कदा सिर उठाते अमृतपालों को देश के कड़े कानून का अमृत चखाकर कठोर कार्रवाई का संदेश दिया जाना चाहिए।












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