Kaveri River: तमिलनाडु और कर्नाटक की राजनीति को पानी पिलाती कावेरी
भारत के सबसे पुराने जल विवाद ने इस वर्ष पुनः कर्नाटक और तमिलनाडु सरकारों को पानी पिलाने का काम शुरू कर दिया है। लगभग डेढ़ दशक पुराना 'कावेरी जल विवाद' पुनः तूल पकड़ता दिख रहा है। तमिलनाडु को पानी देने के विरोध में कल कर्नाटक बंद का आह्वान किया गया था जिसका व्यापक असर देखने को मिला।
असर हो भी क्यों न जब जल संकट से जूझ रहे दोनों राज्यों की आम जनता जल के महत्व को समझ रही है। हर बार की तरह इस बार भी इस बंद को कन्नड़ समाज और किसान गुटों का पूरा समर्थन मिला। बंद के कारण कैम्पेगौड़ा एयरपोर्ट पर कुल 44 उड़ानें रद्द कर दी गईं।

वहीं राज्य परिवहन निगमों ने भी खास तौर पर मांड्या, मैसुरु, चामराजनगर आदि कावेरी बेसिन जिलों में अपनी कई बस सेवाएं रद्द कर दी। एहतियातन कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई।
एक रिपोर्ट के हिसाब से 12 घंटे के इस बंद में कर्नाटक को लगभग 4,000 करोड़ का नुकसान हुआ है। अच्छी खबर यह रही की कई बार की तरह इस बार इस जल विवाद में बुलाये गए बंद में जान माल की हानि देखने को नहीं मिली।
इस जल विवाद को समझने के लिए कावेरी नदी, इसकी सहायक नदियों और इन पर बने बांधों की स्थिति समझना जरूरी है। कर्नाटक में कावेरी नदी की सहायक नदियों हरंगी और हेमावती पर बांध का निर्माण किया गया है। इन दो बांधों के डाउनस्ट्रीम पर कृष्णा राजा सागर बांध का निर्माण कर्नाटक में मुख्य कावेरी नदी पर किया गया है। कर्नाटक में काबिनी जलाशय कावेरी नदी की सहायक नदी काबिनी पर बनाया गया है, जो कृष्णा सागर जलाशय में मिलता है। वहीं मेट्टूर बांध का निर्माण तमिलनाडु में कावेरी की मुख्य धारा पर किया गया है।
केंद्रीय जल आयोग ने कावेरी के साथ काबिनी और मेट्टूर बांध के संगम के बीच मुख्य कावेरी नदी पर कोलेगल और बिलीगुंडुलु नाम से दो 'जी एंड डी' स्थापित किए हैं। जी का अर्थ 'गेज़' और डी का अर्थ 'डिस्चार्ज'। जल विज्ञान में जलाशयों पर गेजिंग स्टेशनों का निर्माण किया जाता है। ये जल स्टेशन किसी भी वाटर बॉडी के तय बिंदु पर उसके स्तर अर्थात गहराई या लेवल पर तय समय में प्रवाहित हुए जल के बीच का संबंध बताते हैं। बिलीगुंडुलु जी एंड डी साइट मेट्टूर बांध से लगभग 60 किमी नीचे है जहां कावेरी नदी कर्नाटक और तमिलनाडु के साथ सीमा बनाती है।
इसी मेट्टूर बांध से बिलीगुंडुलु जी एंड डी साइट में पानी छोड़ने का आदेश अमूमन दिया जाता है। 1881 से शुरू हुआ यह विवाद अस्तित्व में तब आया जब तत्कालीन मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) ने कावेरी नदी पर बांध बनाने का फैसला किया। लेकिन मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) ने इस पर आपत्ति जताई। 1924 में ब्रिटिश राज में एक समझौता हुआ। समझौते के तहत कर्नाटक को कावेरी नदी का 177 टीएमसी अर्थात थाउजेंड मीटर क्यूबिक और तमिलनाडु को 556 टीएमसी पानी देने का फैसला लिया गया। परन्तु ज़ाहिर तौर पर फैसले पर सहमति नहीं दिखाई गई। 1972 में केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कावेरी नदी के पानी के चारों दावेदारों (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पुडुचेरी) के बीच पानी का बंटवारा किया गया।
1976 में एक समझौता किया गया परन्तु पुनः सहमति बनती नहीं दिखी और 2 जून 1990 को कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल (CWDT) की स्थापना की गई। ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक को सालाना 270 टीएमसी और तमिलनाडु को 419 टीएमसी पानी दिया। केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी देने का फैसला किया। बरसात और पानी के बहाव के आधार पर किसी ख़ास महीने में चार बराबर किस्तों में चार सप्ताहों में पानी छोड़ा जाता है। यदि किसी सप्ताह में पानी की निर्धारित मात्रा को नहीं छोड़ा जा सकता है तो फिर अगले हफ़्तों में इसकी भरपाई की जाती है। तमिलनाडु ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया और बाद में कर्नाटक भी कोर्ट पहुंच गया।
फरवरी 2008 में, कोर्ट ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) और कावेरी जल नियामक समिति (सीडब्ल्यूआरसी) के गठन का आदेश दिया था। अदालत ने अगले 15 सालों के लिए एक फैसला दिया जिसके अनुसार कर्नाटक बिलिगुंडलू डैम से तमिलनाडु के लिए 177.25 टीएमसी फिट पानी छोड़ेगा। हालांकि कोर्ट ने तमिलनाडु को मिलने वाले पानी में 14.75 टीएमसी की कटौती की है। यानी अब उसे पहले से 5% कम पानी मिलेगा। वहीं, कर्नाटक के कोटे में 14.75 टीएमसी का इजाफा किया है। यानी उसे अब पहले से 5% ज्यादा पानी मिलेगा।
कावेरी वाटर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी CWMA ने 13 सितंबर को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार कर्नाटक को अगले 15 दिनों तक रोज़ाना 5 हज़ार क्यूसेक पानी तमिलनाडु को देना था। हालांकि कर्नाटक सरकार कमजोर मॉनसून का हवाला देते हुए पहले ही कह चुकी है कि वो तमिलनाडु को 5 हज़ार क्यूसेक पानी देने की स्थिति में नहीं है। दोनों राज्यों में मुख्य रूप से उत्पन्न यह विवाद अकेला जल विवाद नहीं है। दक्षिण भारत की दूसरी सबसे बड़ी नदी कृष्णा के बंटवारे को लेकर भी विवाद है। यह विवाद सुलझा लिया गया था परन्तु आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद नवीन राज्य तेलंगाना के निर्माण के बाद यह विवाद फिर से उभर गया है।
दक्षिण की गंगा और पौराणिक तमिल साहित्य में पोन्नी नाम से प्रसिद्द कावेरी नदी कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों के लिए जीवनदायिनी है। दोनों ही राज्य पीने के पानी के लिए इस नदी का आसरा देखते हैं। ये नदी लगभग 40 लाख एकड़ ज़मीन को सींचती है और दक्षिण भारत के 3 करोड़ किसान कावेरी के पानी पर ही निर्भर हैं। दोनों राज्यों में भूमिगत पानी का स्तर खपत की तुलना में बहुत कम है। बैंगलोर, मैसूर, चेन्नई जैसे शहर पर आईटी सेक्टर के गढ़ के रूप में आबादी का अतिरिक्त बोझ भी है।
इन शहरों के लोग पानी की किल्लत को बखूबी समझते और झेलते भी हैं। कई रिपोर्ट्स ने ये खुलासे किये हैं कि अगर पीने के पानी की किल्लत और भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने और जल संचय की पर्याप्त सुविधाएं नहीं की गई तो अगले डेढ़ दशक में बैंगलोर आबादी का बोझ सह नहीं पाएगा और रहने लायक नहीं रह जाएगा। यह स्थिति कर्नाटक के कई गांवों और तमिलनाडु के भी कई क्षेत्रों पर लागू होती है। ऐसे में राज्यों के हितों के लिए उनकी सरकारें प्रतिबद्ध भी दिखाई देती हैं और मजबूर भी। सवाल यह भी उठता है कि लगभग डेढ़ दशक पुराने इस विवाद के केंद्र में जब सिंचाई और पीने के पानी की किल्लत ही है तो इसके वैकल्पिक उपायों पर काम क्यों नहीं किया गया?
कावेरी जल विवाद गहरा रहा है और अबकी यह दो राज्यों के हितों से भी आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट हुए विपक्षी दलों के लिए भी बड़ा सिरदर्द बन सकता है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कहा है कि कर्नाटक में राज्य सरकार लोगों के लिए कोई स्टैंड नहीं ले रही है। राज्य सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति का भी आरोप लग रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कावेरी जल विवाद पर राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है।












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