Modi and Pasmanda Muslims: भाजपा की हार के लिए मोदी की पसमांदा नीति जिम्मेवार नहीं
कर्नाटक में भाजपा की हार के लिए एक वर्ग मोदी की पसमांदा नीति को जिम्मेवार ठहरा रहा है। ऐसा आरोप लगाने वालों के पास कोई ठोस तथ्य नहीं है।

Modi and Pasmanda Muslims: पिछले कुछ सालों में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने मुस्लिम तुष्टिकरण का विरोध करने के लिए एक नई रणनीति के तहत काम शुरु किया। इसके कारण सांप्रदायिक आधार पर एकमुश्त मुस्लिम वोटिंग अप्रभावी होने लगी। तथाकथित सेकुलर और सामाजिक न्याय वाली पार्टियां जो भाजपा का डर दिखा कर मुस्लिमों का ध्रुवीकरण कर एक मुश्त वोट लेती रही हैं, वो मुस्लिम विमर्श की बात करने से कतराने लगी।
लेकिन कर्नाटक में भाजपा मोदी जी की इस नई नीति को ढंग से क्रियान्वित करने में चूक गई। भाजपा अशराफ के चक्रव्यूह को भेदने में नाकाम रही जहां मात्र 9% ही मुस्लिम आबादी है। दूसरी ओर अशराफ वर्ग ने भाजपा के विरुद्ध अपनी पुरानी रणनीति यानी सांप्रदायिक आधार पर समाज के ध्रुवीकरण को ही आजमाया। अशराफ उलेमा, अशराफ बुद्धिजीवी और अशराफ के गैर सरकारी संगठनो ने आम और पसमांदा मुसलमानों में भाजपा को इस्लाम और मुस्लिम विरोधी बताकर यह खौफ पैदा किया कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो हमारी बच्चियों के सिर से हिजाब नोच लेगी, आरएसएस और बजरंगदल के लोग हमारे घरों में घुस कर हमारी बहू बेटियों को अपमानित करेंगे आदि-आदि।
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कई जगह से ऐसी भी खबरें सुनने में आई कि मस्जिदों के भाषणों में इस तरह की अपील भी की गई कि भाजपा को हराने के लिए एकजुट होकर कांग्रेस को वोट करना है। कुल मिला कर अशराफ वर्ग आम और पसमांदा मुसलमानों को सांप्रदायिक आधार पर कांग्रेस के पक्ष में सफल ध्रुवीकरण कर ले गए। इसके फलस्वरूप जहां जनता दल सेकुलर को सीटों का भारी नुकसान उठाना पड़ा, तो भाजपा के हाथ से सत्ता खिसक गई। यहां यह ध्यान रहे कि अधिकतर आम और पसमांदा मुसलमानों की पहली पसंद पिछले कई चुनावों से जनता दल सेकुलर ही रहा है।
कर्नाटक बीजेपी ने सारे मुस्लिम समाज को एक समरूप समाज मान कर ही अपनी रणनीति तय की थी। मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय या पसमांदा विमर्श के दृष्टिकोण से कोई नीति नहीं बनाई। बीजेपी के कर्नाटक यूनिट ने पसमांदा को जोड़ने की कोई कोशिश नहीं की। यहां तक कि ओबीसी आरक्षण के 4% कैटिगरी वाला आरक्षण (एक्सक्लूसिव मुस्लिम आरक्षण) जिसका फायदा अशराफ वर्ग उठा रहा था जिससे 90% आबादी वाले पसमांदा मुसलमानों की हकमारी हो रही थी, समाप्त करने के ऐतिहासिक निर्णय को भी चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया। इस आधार पर कुल मुस्लिम के 90% आबादी वाले देशज पसमांदा को जोड़ने का प्रयास तक पार्टी के किसी छोटे बड़े नेता ने नहीं किया। जबकि इसी आरक्षण के मुद्दे को अशराफ वर्ग और तथाकथित सेकुलर मीडिया ने मुसलमानों के आरक्षण समाप्ति का झूठा प्रोपेगेंडा कर साधारण हिन्दू और पसमांदा को भ्रमित कर अपने फेवर में कर लिया। जबकि सच्चाई यह भी है राज्य में पसमांदा के 19% ओबीसी और 7% एसटी आरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ा है।
भाजपा ने पसमांदा समाज से आने वाले एक मात्र मंत्री से चुनाव प्रचार तक करवाना उचित नहीं समझा। इसके उलट देखा जाय तो उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में भाजपा ने मोदी जी की पसमांदा नीति को ढंग से आजमाया। मंत्री दानिश को पसमांदा समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी दी जिसका निर्वहन उन्होंने बड़ी ईमानदारी एवं श्रम के साथ किया और पहली बार इतनी बड़ी संख्या में देशज पसमांदा समाज का वोट भाजपा के पक्ष में पड़ा। न सिर्फ बहुत से पसमांदा प्रत्याशी भाजपा टिकट पर विजयी हुए बल्कि पसमांदा बहुल क्षेत्र वाले मेयर की सीटों पर पसमांदा वोट निर्णायक साबित हुए और भाजपा के सभी मेयर प्रत्याशी विजयी घोषित हुए। विधान सभा उप चुनाव में आजम खान के नेतृत्व में अशराफवाद को उसके ही मजबूत गढ़ में जबरदस्त चुनौती मिली और पहली बार भाजपा गठबंधन का पसमांदा प्रत्याशी शानदार जीत दर्ज कर सका।
प्रधानमंत्री ने अपने पार्टी के विचारक पण्डित दीन दयाल उपाध्याय के अंत्योदय के कार्यक्रम के तहत बिना किसी वोट की राजनीति या लालच के मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय की बात करते हुए वंचित पसमांदा के उत्थान के लिए अपनी चिंता को जाहिर किया है। एक विशाल एवं विविधताओं वाले देश के प्रधानमंत्री होने के नाते यह उनका नैतिक कर्तव्य भी है। भाजपा के अंदर और बाहर के कुछ लोग निजी राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री की पसमांदा नीति की नकारात्मक आलोचना कर हिन्दू और पसमांदा समाज के साथ साथ भाजपा के रणनीतिकारों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश हित में उचित नहीं है।
एक सवाल यह भी किया जाता है कि पसमांदा के भाजपा से जुड़ने से उसका हिन्दू वोटर नाराज हो रहा है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। सामाजिक रूप से हिन्दू और पसमांदा के बीच सदियों से समरसता, सामंजस्य और समन्वय है। वो एक दूसरे के सुख दुख, रोजगार सहित जीवन के हर क्षेत्र में साथ साथ आगे बढ़ते हैं। अगर यही सामाजिक समरसता और समन्वय राजनैतिक रूप से चरितार्थ होती है तो शायद ही किसी हिन्दू को या किसी पसमांदा को कोई समस्या हो।
प्रधानमंत्री मोदी की पसमांदा नीति इसी सामाजिक समरसता का राजनीतिकरण करने का प्रयास है, जो अभी अपने शैशव काल में है। यूपी के निकाय चुनाव ने इसमें आशा का संचार किया है। यूपी की प्रयोगशाला में प्रधानमंत्री की पसमांदा नीति ने अपनी मंजिल की ओर एक सकारात्मक कदम बढ़ाया है। यदि बीजेपी और आरएसएस पर नजर डालें तो देखते हैं कि हिंदू समाज को सचेत करने में उसे कितना लंबा समय लगा। कितने बड़े बड़े और महान लोगों ने बिना किसी फल की चिंता किए और बिना निराश हुए कितने समर्पण के साथ काम किया है। समाज को जगाने में, बनाने में समय लगता है। ठीक इसी तरह हिन्दू और देशज पसमांदा के राजनैतिक एकता की शुरुआत हो चुकी है और इसे गंतव्य तक पहुंचना ही है। यूपी निकाय चुनाव ने प्रधानमंत्री मोदी जी की पसमांदा नीति पर अपनी मोहर लगा दी है।
मोदी जी की पसमांदा नीति से उन तथाकथित सेकुलर और सामाजिक न्याय वाली पार्टियों को अपना नुकसान होता दिख रहा है जो अब तक सांप्रदायिक आधार पर भाजपा का डर दिखा कर पूरे मुस्लिम समाज का एक मुश्त वोट लेकर सत्ता प्राप्त करती रहीं हैं। इसी कारण ये पार्टियां बजाय मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय की मांग का समर्थन करने के, मोदी की पसमांदा नीति का विरोध कर रहीं है जो इनके स्वार्थी और देशज पसमांदा विरोधी चरित्र को उजागर करता है।
बीजेपी की पसमांदा नीति पर पार्टी के अंदर के पसमांदा कार्यकर्ताओं और पार्टी के बाहर पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिन्हित कर उनके बीच समन्वय स्थापित कर युद्ध स्तर पर अभियान चलाने की आवश्यकता है। निश्चित ही इसका सकारात्मक फल मिलेगा। हर बात को वोट से नहीं नापा जा सकता है। मोदी दो बार बिना पसमांदा वोट के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। वह तीसरी बार भी बन जाएंगे। लेकिन यह मसला उससे भी आगे बढ़कर अंत्योदय का है। मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के लिए इसकी अति आवश्यकता है जिसकी प्रधानमंत्री मोदी लगातार चेष्टा कर रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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