Bajrang Dal: बजरंग बली और बजरंग दली पर बेमतलब की खलबली

बजरंग दली होने का मतलब बजरंग बली होना नहीं होता। किसी देवी देवता के नाम पर बना कोई संगठन उस देवता का उत्तराधिकारी नहीं हो जाता। फिर जो किसी सरकारी रिकार्ड में दर्ज ही नहीं है उसको बैन करने की बात करने का क्या तुक है?

karnataka election 2023 congress ban bajrang dal controversy bajrangbali

Bajrang Dal: बात उस समय की है जब अयोध्या में विश्व हिन्दू परिषद की कारसेवा निर्णायक दौर में थी। 1984 में साधु संतों की सुरक्षा के लिए विश्व हिन्दू परिषद द्वारा जिस बजरंग दल का गठन किया गया था, उसके ग्रुप दिल्ली में भी बन चुके थे। ऐसे में बजरंग दल वालों का एक समूह कारसेवा के लिए रवाना होने से पहले अटल बिहारी वाजपेयी के आवास 6ए रायसीना रोड पर उनका आशीर्वाद लेने पहुंचा। अटल बिहारी वाजपेयी ने आशीर्वाद तो दिया लेकिन साथ में एक चेतावनी भी दी। "बजरंगदल वालों, अयोध्या जा रहे हो, लंका नहीं जा रहे, इस बात का ध्यान रखना।"

अटल बिहारी वाजपेयी ने संकेतों में अयोध्या और लंका में बजरंग बली की जिस भूमिका की ओर इशारा किया था, पता नहीं बजरंग दल वाले कितना समझ पाये। लेकिन नब्बे के दशक से बजरंग दल की चर्चा उसके उत्पात और हुड़दंग के कारण ही हुई है। 1993 में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा इसे विधिवत संगठन के रूप में गढ़ दिया गया लेकिन आज भी यह एक रजिस्टर्ड संस्था नहीं है। एक प्रकार से यह विश्व हिन्दू परिषद का ही हुड़दंग समूह जैसा है जो संस्कार के नाम पर उत्पात मचाने में विश्वास करता है।

कर्नाटक में अगर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसे बैन करने का वादा किया है तो इससे राजनीतिक हुड़दंग तो मच सकता है लेकिन व्यावहारिक रूप से कुछ किया नहीं जा सकता। बैन आप उसको करते हैं जिसका कोई रजिस्ट्रेशन हो, उसका एकाउण्ट हो या फिर उसका रजिस्टर्ड आफिस हो। बजरंग दल के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। वह विश्व हिन्दू परिषद के तहत कार्य करता है। ऐसे में बजरंगदल को बैन करने की बात करना ही हास्यास्पद है।

लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जानबूझकर बजरंग दल का नाम लिया है तो इसका राजनीतिक मकसद जरूर होगा। ऊपर से जैसा दिखाया और बताया जा रहा है वह सच नहीं है। बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का वादा करने के पीछे का मकसद मुस्लिम वोट जुटाना नहीं बल्कि उन शहरी इलिट वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करना है, जो बजरंग दल जैसे संगठनों से चिढ़ते हैं। जो इस बात को समझना चाहते हैं उन्हें कर्नाटक में बजरंग दल और श्रीराम सेने जैसे संगठनों का इतिहास खंगाल लेना चाहिए।

कर्नाटक में बजरंग दल की चर्चा मुस्लिम समुदाय के प्रति उपद्रव के कारण नहीं हुई कभी। वहां बजरंग दल के कार्यकर्ता ऐसे संस्कारी के रूप में जाने जाते हैं जो वेलेण्टाइन डे पर हुड़दंग या उत्पात मचाते हैं। कर्नाटक में बजरंग दल पर पहला विवाद सितंबर 2008 में हुआ था जब उसके बजरंगियों पर चर्च पर हमला करने का आरोप लगा था। हंगामा तो बहुत हुआ लेकिन जांच पड़ताल में कोई सबूत सामने नहीं आया।

बजरंग दल से नाराज होकर बनने वाली श्रीराम सेने पहली बार चर्चा में तब आयी जब जनवरी 2009 में मैंगलोर के एक पब पर हमला कर दिया और वहां कई लड़कियों को इसलिए पीट दिया क्योंकि वो पब में बैठकर दारू पी रही थीं। श्रीराम सेने जो कि बजरंग दल से ही नाराज होकर प्रमोद मुतल्लिक ने बनाया था, उसका नाम सामने आया। इस हमले में दो लड़कियों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था। श्रीराम सेने ने यह सब इसलिए किया क्योंकि पब में जाकर दारू पीने वाली लड़कियां भारतीय संस्कृति का मजाक उड़ा रही थीं।

प्रमोद मुतल्लिक और उसकी श्रीराम सेने से भाजपा सरकारों की भी नहीं पटी कभी। इसलिए इस पब वाली घटना के बाद भाजपा सरकार ने ही उसके मैंगलोर में घुसने पर रोक लगा दी। हालांकि बाद में उसने भाजपा से सुलह समझौता कर लिया था। 2014 के पहले भाजपा में भी शामिल हो गया था लेकिन भाजपा वालों ने ही उसका इतना विरोध किया कि उसे पार्टी से बाहर निकालना पड़ा।

कर्नाटक में कुछ ऐसे ही कारनामें बजरंग दल के नाम भी दर्ज हैं। हर साल वेलेन्टाइन डे पर बंगलौर में नौजवान लड़के लड़कियों के बीच जाकर हुड़दंग मचाना बजरंग दल वालों की खास पहचान बन गयी है। कर्नाटक से लेकर कानपुर तक बजरंग दल का नाम सामने आते ही कोई हुड़दंगी जमात सामने आ जाती है। यह बात सही है कि पीएफआई जैसे आतंकी संगठनों से उसकी तुलना नहीं की जा सकती लेकिन यह बात भी सही है कि उसे संस्कारी संगठन भी नहीं ठहराया जा सकता।

लेकिन यहां एक समस्या और है। अब क्योंकि बजरंग दल कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं है तो कोई भी हुड़दंगी समूह अगर हुड़दंग करने के बाद अपने आप को वीर बजरंगी कह दे तो बजरंग दल वाले साबित ही नहीं कर सकते कि वह उनका बजरंगी नहीं है। वैसे बजरंग दल वाले ऐसे हुड़दंगियों का स्वागत ही करते हैं जो गले में भगवा गमछा डाले उनका नाम रोशन करते हैं।

Recommended Video

    Congress ने Bajrang Dal Ban की बात कही क्या है उसकी कहानी | PM Modi On Bajrang Dal | वनइंडिया हिंदी

    जिन विनय कटियार को बजरंग दल का पहला मुखिया बनाया गया था वो अब अज्ञात जीव हो गये हैं। भाजपा से सांसद रह चुके विनय कटियार की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता कम ही रहती है। लेकिन उनके द्वारा पाले पोसे गये बजरंगी किसी न किसी बहाने चर्चा में बने रहते हैं। जैसे इस समय कर्नाटक में कांग्रेस के घोषणापत्र में नाम आने के कारण चर्चा में आ गये हैं। बजरंगी उतनी भी मोरल पुलिसिंग नहीं करते जितना उसके विरोधी उसका प्रचार कर देते हैं। यही बजरंगदल वालों की ताकत भी रही है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+