Indian Economy: ऊंची विकास दर की आशा के बाद भी निराशा का माहौल क्यों?
Indian Economy: पूर्व के सारे अनुमानों को पीछे धकेलते हुए वित्तीय वर्ष 2022-23 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.2% आंकी गई है। भारतीय रिजर्व बैंक ने इस वर्ष 8% की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया है, हालांकि दो दिन पहले रेटिंग एजेंसी मूडीज ने 6.3% की दर से बढ़ने का अनुमान व्यक्त किया है। खुदरा महंगाई दर पिछले 26 महीने के निचले स्तर 4.25 प्रतिशत पर आ गई है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के मुताबिक औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर पिछले महीने के 1.6 प्रतिशत से बढ़कर 4.2% हो गई है।
चालू महीने में रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह के साथ-साथ वित्त वर्ष 2023-24 के एक अप्रैल से 17 जून के बीच भारत के प्रत्यक्ष कर संग्रह में भी जोरदार उछाल दर्ज किया गया है। प्रत्यक्ष कर संग्रह लगभग 12% की वृद्धि के साथ 3 लाख 79 हजार 760 करोड़ रूपया हो गया है। मौजूदा प्राइस के लिहाज से भारत की जीडीपी 3737 अरब डॉलर यानी 3.75 ट्रिलियन की हो गई है जोकि वर्ष 2014 में मात्र 2 ट्रिलियन की थी। कह सकते हैं कि आंकड़ों की नजर में भारतीय अर्थव्यवस्था की बल्ले-बल्ले है। लेकिन सरकार द्वारा ही जारी किए गए प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता के लगातार कम होने के आंकड़े तथा निर्माण क्षेत्र की सुस्ती के चिंताजनक धब्बे चांद की खूबसूरती वाले नहीं हैं बल्कि बेहतरीन बुर्के के पीछे छिपी झुर्रियों का दर्द उजागर करने वाले हैं।

वित्तीय वर्ष 2023 के जीडीपी के आंकड़े बता रहे हैं कि प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता मात्र 2.8% की दर से ही बढ़ी है, जो बहुत निराशाजनक है। प्रथम दृष्टया यह आंकड़ा इस बात को इंगित करता है कि कोरोना के बाद अब भी समाज का हर तबका आर्थिक विकास की पटरी पर नहीं लौट पाया है। वहीं दूसरी तरफ 7.2% की विकास की दर और प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता के आंकड़े को साथ लेकर चलें तो यह तस्वीर इस बात को स्पष्ट कर देती है कि देश में आर्थिक-सामाजिक असमानता तेजी से बढ़ रही है।
अमीरों की बढ़ी हुई क्रय क्षमता के कारण अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप से अधिकाधिक बढ़ोतरी देखी गई है। होटल, पर्यटन, परिवहन और सेवा क्षेत्र के कुछ अन्य हिस्सों में दर्ज की गई बढ़ोतरी दरअसल अमीर तबके की बढ़ी हुई क्रय क्षमता का परिणाम है। दुरुह ब्याज नीति का असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ा है। वर्ष 2023 में निर्माण क्षेत्र की विकास दर मात्र 1.3% हो गई है जबकि वित्त वर्ष 2021-22 में यह 11% से अधिक थी। भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में निर्माण की दर का गिरना चिंताजनक है।
ऐसे में एक सबसे बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि अब चूंकि भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है तथा इस कारण आने वाले वर्षों में समाज के गरीब तबके को आर्थिक विकास की मुख्यधारा में ले चलने के लिए आर्थिक नीतियों को अलग तरह से बनाना ही होगा, नहीं तो धीरे-धीरे चुनौतियां इससे भी गंभीर होती जाएंगी। भारत की ज्यादातर आबादी निम्न मध्यवर्गीय है और उसमें भी ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत बहुत अधिक है। पिछले वित्त वर्ष में महंगाई ऊंचे स्तर पर थी, जिसके चलते समाज का यह वर्ग बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ था। देश की प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता 2.8% मापी गई है, इसलिए वर्तमान की 7.2% की विकास दर भविष्य के अनुमानों के प्रति बहुत अधिक सकारात्मक रूप प्रस्तुत नहीं कर पा रही है। पिछले वित्त वर्ष में अधिक महंगाई की दर को नियंत्रित करने के चक्कर में आरबीआई द्वारा एक लंबे अरसे के बाद ब्याज दरों को बहुत अधिक नियंत्रित किया गया जिसके अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़े।
ज्ञात हो कि आठ विभिन्न क्षेत्र मिलकर अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर का निर्माण करते हैं, जिसमें कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी, उर्वरक, स्टील, सीमेंट और बिजली शामिल है। इस कोर सेक्टर ने 7.6% की वृद्धि दर हासिल की है। समाज में आधारभूत ढांचे के विकास में कोयले के अलावा बिजली, स्टील और सीमेंट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन सबमें सबसे अधिक 15% की बढ़ोतरी कोयला के क्षेत्र में देखने को मिली है, बाकी बचे तीन सेक्टरों में भी 8% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि आधारभूत संरचनाओं का विकास भारत में तेजी से हो रहा है।
इन सब के बावजूद पिछले वित्त वर्ष में निर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर के कम रहने के दो कारण दिखाई देते हैं। पहला, पिछले वर्ष ऊंची महंगाई से उनकी उत्पादन लागत लगातार बढ़ती रही। दूसरा, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज नीतियों के नियंत्रण के चलते प्रभावित हुई प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता से उसके मुनाफे में कमी हुई। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। इस क्षेत्र की कम विकास दर निश्चित रूप से बेरोजगारी दर को बढ़ाएगी। जीडीपी आंकड़ों के विश्लेषण में सकारात्मक बात यह है कि भारत में कृषि क्षेत्र ने अप्रत्याशित रूप से अच्छी विकास दर हासिल कर ली है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022-23 के लिए कृषि क्षेत्र की विकास दर 4% रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष में महज 3.5% थी। वर्ष 2022-23 की चारों तिमाहियों में यह क्रमशः 2.4% 2.5% तथा अंतिम तिमाही में यह अधिकतम 5.5% दर्ज की गई।
दूसरी तरफ सेवा क्षेत्र भी भारत की अर्थव्यवस्था की बागडोर को पिछले तीन दशक से संभाले हुए हैं। उसकी विकास दर चालू वित्त वर्ष में 28.3% है जो पिछले वर्ष से अधिक है। इसमें गौर करने वाली बात यह है कि होटल, परिवहन, संचार क्षेत्र में तथा रियल स्टेट में बहुत वृद्धि हुई है, जिसके अच्छे परिणाम आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था में देखने को मिलेंगे।
केंद्र सरकार का शुरू से ही निर्माण क्षेत्र के विकास पर जोर रहा है। वर्ष 2014 में इसी उद्देश्य के लिए मेक इन इंडिया कार्यक्रम घोषित किया गया। इस योजना का उद्देश्य था कि भारत अपने आयातों को नियंत्रित करें तथा अपनी आवश्यकता की पूर्ति घरेलू उत्पादों से करें, और उसका निर्यात भी करें। निर्माण क्षेत्र को और अधिक प्रोत्साहित करने के लिए महामारी के दौरान उसे सरकार की आत्मनिर्भर भारत योजना के साथ भी जोड़ा गया। वित्त वर्ष 2020 में सरकार ने निर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए पीएलआई जैसी अति महत्वाकांक्षी वित्तीय योजना भी शुरू की, जिसमें निर्माण क्षेत्र को उसके प्रदर्शन के आधार पर वित्तीय फायदे मिलने लगे।
लेकिन केंद्र सरकार द्वारा लगातार निर्माण के क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलने के बावजूद पिछले 9 वर्षों में निर्यात के आंकड़ों में मात्र 7.5% की वृद्धि हुई है जबकि आयात 20% से अधिक बढ़ चुका है और इसी के फलस्वरूप व्यापार घाटा तकरीबन 47% से अधिक हो चुका है। पिछले वित्त वर्ष में मंहगाई नियंत्रित करने के चक्कर में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की गई मौद्रिक नीतियों में बदलाव में प्रति व्यक्ति क्रय क्षमता को बहुत कम किया जिसके चलते जीडीपी की 7.2% विकास दर भी भविष्य के लिए निश्चिंत नहीं करती।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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