Indian Democracy: लोकतंत्र में शुचिता के लिए जरूरी तीन मुद्दे
Indian Democracy: राजनीति में लोकतंत्र और शुचिता के लिए तीन अहम मुद्दे देश के सामने हैं| ये तीनों ही मुद्दे पहली बार सामने नहीं आए, इससे पहले भी इन तीनों मुद्दों पर कई बार बहस हो चुकी है| सुप्रीमकोर्ट के सामने भी ये तीनों मुद्दे कई बार आ चुके हैं| पहला मुद्दा है राज्यपालों की मनमानी का, दूसरा मुद्दा है स्पीकरों की मनमानी का और तीसरा मुद्दा है चुने हुए मुख्यमंत्रियों की मनमानी का| तीनों मुद्दे इस समय सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है| अब वक्त आ गया है कि इन तीनों मुद्दों पर अंतिम फैसला हो जाए|
सबसे पहले हम राज्यपालों की मनमानी और केंद्र सरकार की ओर से राज्यपालों के राजनीतिक दुरूपयोग पर बात करते हैं| 1994 के एसआर बोम्मई मामले में सुप्रीमकोर्ट के एतिहासिक फैसले के बाद केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रपति राज लगाने की मनमानी पर तो नकेल लग गई है| लेकिन राज्यपालों की ओर से चुनी हुई सरकारों के कामकाज में संवैधानिक बाधाएं पैदा करने की घटनाएं बढ़ गई हैं| हाल ही में पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को सुप्रीमकोर्ट ने इस बात के लिए डांट पिलाई है कि वह चुनी हुई विधानसभा से पारित बिलों पर लंबे समय से कुंडली मार कर बैठे हैं|

अब सुप्रीमकोर्ट ने केरल और तमिलनाडु के संबंध में केंद्र सरकार और राज्यपाल कार्यालयों को नोटिस जारी किया है| संविधान के अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के पास तीन ही विकल्प हैं, या तो वह बिल पर दस्तखत करें, या राष्ट्रपति को भेज दें, या अनुमति रोक लें| सवाल यह है कि राज्यपाल अपने पास कितने दिनों तक बिलों को पेंडिंग रख सकते हैं| सुप्रीमकोर्ट ने अटार्नी जनरल से पूछा है कि क्या राज्यपाल अनिश्चित काल के लिए बिलों को पेंडिंग रख सकता है|
तमिलनाडु के 12 बिल राज्यपाल के पास लंबे समय से लंबित पड़े हैं| जैसे ही 10 नवंबर को सुप्रीमकोर्ट ने पंजाब के राज्यपाल को डांट पिलाई, तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने दो बिल तो राष्ट्रपति को भेज दिए, बाकी दस बिल नामंजूर करके सरकार को भेज दिए| सरकार ने तुरंत विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया और 18 नवंबर को वे सभी 10 बिल जस के तस फिर से पास करवा कर भिजवा दिए|

जब विधानसभा दूसरी बार पारित करके बिल भेजती है, तो वह बिल मनी बिल के बराबर हो जाता है| राज्यपाल के पास उसे पारित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता| हां अगर उस बिल से उच्च न्यायालय के अधिकारों में कटौती हो रही हो, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को भेज सकते हैं| अब सुप्रीमकोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल को समय दिया है कि वह उन दस बिलों पर दस दिन में फैसला लें|
केरल सरकार की याचिका में कहा गया है कि राज्यपाल के पास 8 बिल लंबित हैं, जिनमें से कुछ तो दो साल से लंबित हैं| मजेदार बात यह है कि केरल के तीन अध्यादेशों को राज्यपाल ने मंजूरी नहीं दी, जबकि वे तीनों बाद में विधानसभा से बिलों के रूप में पास भी हो गए| इनमें से कुछ बिल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति से संबंधित हैं| केरल सरकार ने राज्यपाल को कुलाधिपति पद से हटाने का बिल पास किया है|
परंपरा के मुताबिक़ सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल होते हैं| वह इसलिए ताकि विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो| लेकिन गैर भाजपा सरकारों के राज्यपालों की ओर से कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर मनमानियों के चलते सरकारों और राज्यपालों में टकराव हुआ| टकराव के चलते पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और केरल विधानसभाओं ने राज्यपालों को कुलाधिपति पद से हटाने के बिल पास किए हैं|
राज्यपाल ही कुलाधिपति होंगे, ऐसा कोई संवैधानिक प्रावाधान नहीं है| इसलिए राज्य सरकारों को पूरा अधिकार है कि वह इस संबंध में क़ानून बना कर संशोधन कर सके| लेकिन किसी भी राज्यपाल ने इन बिलों को मंजूरी नहीं दी है| इस संबंध में सुप्रीमकोर्ट को निर्णायक फैसला लेना होगा कि अगर राज्यपाल कुलाधिपति रहता है, तो कुलपतियों की नियुक्ति में उसकी कितनी भूमिका होगी या नहीं होगी| वैसे इस संबंध में यूजीसी ने 2018 में एक नियमावली बना दी थी, उसी नियमावली के मुताबिक़ ही कुलपतियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है|
दूसरा प्रमुख मुद्दा स्पीकरों की मनमानी का है| दलबदल क़ानून के अंतर्गत फैसला करने का अंतिम अधिकार सदन के स्पीकरों का था| 1994 में सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अदालत को स्पीकर के फैसले की समीक्षा करने का अधिकार है| एक अन्य फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि अगर स्पीकर के खिलाफ ही अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया हुआ हो, तो स्पीकर दलबदल पर कार्रवाई की लंबित याचिका पर फैसला नहीं कर सकता|
आम तौर पर दलबदल सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में होता है, और स्पीकर भी सत्ताधारी पक्ष का होता है| इसलिए या तो वह अयोग्यता की याचिका पर कुंडली मार कर बैठ जाता है या सत्ताधारी दल के पक्ष में फैसला दे देता है| इस मामले में सुप्रीमकोर्ट की राय आई थी कि स्पीकर को यथाशीघ्र फैसला करना चाहिए। जनवरी 2020 में तीन जजों की बेंच ने कहा कि स्पीकर को याचिका दाखिल होने के तीन महीनों के भीतर फैसला करना होगा|
जब स्पीकर ने तीन महीनों में भी फैसला नहीं किया, तो तीन महीने बाद सुप्रीमकोर्ट ने दलबदल करके मंत्री बने दो विधायकों को मंत्री पद से हटा दिया था और कोर्ट के अगले फैसले तक उन्हें विधानसभा में प्रवेश पर भी रोक लगा दी थी| लेकिन कर्नाटक के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने कोई समय सीमा तय करने से इंकार कर दिया था| कोर्ट ने कहा था कि समय सीमा तय करने का काम संसद का है, सुप्रीमकोर्ट क़ानून नहीं बना सकती|
जबकि अभी अक्टूबर में उसी सुप्रीमकोर्ट ने महाराष्ट्र के स्पीकर को कहा कि 31 दिसंबर तक मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और गुट के विधायकों और एनसीपी के अजीत गुट के विधायकों पर दलबदल क़ानून के अंतर्गत दाखिल याचिकाओं पर फैसला करें| एक अन्य फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि संसद को दलबदल पर कार्रवाई का अधिकार स्पीकर से वापस लेकर किसी अन्य प्राधिकरण को सौंपना चाहिए| अब वक्त आ गया है कि सुप्रीमकोर्ट निर्णायक फैसला करे और ससंद दलबदल क़ानून की विसंगतियों को खत्म करने के लिए नया बिल लाए|
तीसरा मुद्दा है मुख्यमंत्रियों की मनमानियों का| वे भ्रष्टाचार एवं अन्य मामलों में गिरफ्तार अपने मंत्रियों को बर्खास्त नहीं कर रहे| जिससे लोकतंत्र कलंकित हो रहा है| ऐसे उदाहरण हाल ही में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और दिल्ली में देखने को मिले| महाराष्ट्र में जब तक उद्धव ठाकरे की सरकार गिर नहीं गई, उसके दो मंत्री जेल में थे, जिनमें एक तो महाराष्ट्र का गृह मंत्री था|
मुख्यमंत्री अक्सर अपने गिरफ्तार मंत्री का विभाग किसी अन्य मंत्री को देकर उसे बिना विभाग का मंत्री बना देते हैं| लेकिन दिल्ली में तो जेल मंत्री ही लंबे समय तक जेल में रहा, वह जेल में रहते हुए भी जेल मंत्री बना रहा| कई महीनों बाद उसने तब इस्तीफा दिया, जब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री ने जेल में पहुंचते ही इस्तीफा दे दिया, हालांकि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने उन्हें बर्खास्त नहीं किया था| अब तो आम आदमी पार्टी खुलेआम धमकी दे रही है कि अगर शराब घोटाले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया, तो वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे, बल्कि जेल से ही सरकार चलेंगे|
सवाल यह भी है कि क्या केंद्र सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ केन्द्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग कर रही है| जैसे केन्द्रीय एजेंसियों ने शराब घोटाले में शराब मंत्री मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार कर लिया, उसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को भी गिरफ्तार कर ले| लेकिन बाद में केन्द्रीय एजेंसियां अदालत में दोनों के खिलाफ आरोप साबित न कर सके, तो उन दोनों के राजनीतिक भविष्य को बर्बाद करने के लिए कौन जिम्मेदार होगा| इस लिए यह भी नियम कायदा बनना चाहिए कि संविधान की शपथ लेने वाले किसी पदाधिकारी को केन्द्रीय एजेंसियां तब तक गिरफ्तार नहीं करेंगी, जब तक वह अदालत को संतुष्ट न कर दे, और अदालत से वारंट हासिल न कर ले|
तमिलनाडु के गिरफ्तार मंत्री सेंथिल बालाजी की पहले राज्यपाल की ओर से बर्खास्तगी और फिर बहाली का मामला सुप्रीमकोर्ट में पहुंच गया है| मुख्यमंत्री ने उनका विभाग किसी अन्य को देकर सेंथिल को बिना विभाग का मंत्री बनाए रखने की सिफारिश की थी| जबकि राज्यपाल ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर उन्हें बर्खास्त कर दिया था, लेकिन कानूनी सलाह लेने के बाद रात को ही बहाल कर दिया| क्योंकि राज्यपाल को बिना मुख्यमंत्री की सिफारिश के किसी मंत्री को बर्खास्त करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है|
यहां सवाल यह खड़ा हुआ है कि बर्खास्त मंत्री को राज्यपाल बिना दुबारा शपथ दिलाए बहाल कैसे कर सकते हैं| उनकी बर्खास्तगी के लिए केस हाईकोर्ट में दाखिल हुआ था, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार नहीं की, तो यह मामला अब सुप्रीमकोर्ट में है| सुप्रीमकोर्ट अगर इस मामले में विस्तृत सुनवाई करके फैसला देती है, तो वह आगे के लिए नजीर बन जाएगी| लोकतंत्र में लोकलाज के लिए जरूरी है कि गिरफ्तार होते ही मंत्री इस्तीफा दें या बर्खास्त हो|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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