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India Europe Corridor: भारत ही नहीं आसियान देशों के लिए भी अवसर

India Europe Corridor: आज की पीढ़ी को शायद यह आश्चर्यजनक लगे लेकिन 1957 से 1976 तक लंदन से कलकत्ता तक एक बस चलती थी। 20,000 किलोमीटर का सफर तय करने वाली यह बस लंदन से कोलकाता के बीच बेल्जियम, पश्चिम जर्मनी, ऑस्ट्रिया, यूगोस्लाविया, बुल्गारिया, तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से गुजरती हुई पश्चिमी भारत में प्रवेश करती थी। वहां से दिल्ली, आगरा, बनारस होते हुए कलकत्ता तक जाती थी। एक बार फिर भारत-अरब-यूरोप कॉरीडोर के रूप में एक नया रूट शुरु होने वाला है, जिसमें माल भेजने के लिए जहाजों के अलावा रेलवे मार्ग का उपयोग भी किया जाएगा।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और भारत की अध्यक्षता में हुए G20 सम्मेलन में इस नए इकोनॉमिक कॉरिडोर को बनाने पर सहमति हो गई है। G20 की इस घोषणा से भारत-जीसीसी-यूरोप इकनोमिक कॉरिडोर से भारत ही यूरोप से नहीं जुड़ेगा, बल्कि भारत आसियान देशों का अगुवा बन पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया क्षेत्र को भी GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) कॉरिडोर के माध्यम से दुनिया से जोड़ेगा।

India Europe Corridor also Opportunity for ASEAN countries with India

यह कॉरिडोर एशिया और यूरोप दोनों महाद्वीपों में समृद्धि तो लाएगा ही लाएगा तेल की आय खोने के भय से परेशान अरब देशों के लिए संजीवनी का काम करेगा। इस कॉरिडोर से आर्थिक सामाजिक राजनैतिक और सांस्कृतिक बदलाव आपको भारत से अधिक अरब देशों में देखने को मिलेंगे। भारत, यूएई, सऊदी अरब, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय यूनियन सहित कुल 8 देशों के इस प्रोजेक्ट का फायदा इजरायल और जॉर्डन के साथ साथ अमेरिका को भी मिलेगा जिसके कारण अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी इस प्रोजेक्ट को लेकर काफी उत्साहित दिखे। यह कॉरिडोर चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विकल्प होगा, जो 6 हजार किमी लंबा होगा जिसमें सड़क मार्ग के साथ साथ 3500 किमी समुद्र मार्ग भी शामिल है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसके तैयार होने के बाद भारत से यूरोप तक सामान पहुंचाने में लगभग 40 फीसदी समय की बचत होगी। यूरोप तक इंटरकनेक्टेड रेल और शिपिंग के माध्यम से सीधी पहुंच के कारण भारत से विदेशी व्यापार सस्ता और आसान होगा। इस प्रोजेक्ट के कारण भारत और अमेरिका पहली बार मिडिल ईस्ट में साझेदार बने हैं। मध्य एशिया से जमीनी कनेक्टिविटी के मामले में पाकिस्तान सबसे बड़ी बाधा था, जिसका तोड़ अब मिल गया है।

इस पूरे रास्ते में मुख्य भूमिका रेलमार्ग और समुद्री जलमार्ग की होगी, जिनके जरिए एशिया से यूरोप तक परिवहन किया जाएगा। इस कॉरिडोर के जरिए भारत में बना सामान पहले समुद्र के रास्ते यूएई जाएगा फिर वहां से सऊदी अरब, जॉर्डन होते हुए रेलमार्ग से इजरायल के हाइफा बंदरगाह तक पहुंच सकेगा। इसके बाद समुद्री मार्ग से यूरोप तक पहुंचेगा। यह प्रोजेक्ट पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट जिसे PGII कहते हैं, का हिस्सा होगा जो कि जी-7 देशों का प्रयास है। इसके तहत विकासशील देशों में बुनयादी ढांचा खड़ा करने के लिए फंडिंग दी जाती है। इस प्रकार इस योजना से दो महाद्वीपों के देश ही नहीं कनेक्ट हुए जी 20 और जी 7 दो समूहों के प्रोजेक्ट भी साझा उद्देश्यों के तहत जुड़ गए हैं।

जो जानकारी सामने आ रही है उसके मुताबिक इस कॉरिडोर में रेल लिंक के साथ-साथ एक इलेक्ट्रिसिटी केबल, एक हाइड्रोजन पाइपलाइन और एक हाई-स्पीड डाटा केबल होगा। इस प्रोजेक्ट को महाद्वीपों और सभ्यताओं के बीच हरित और डिजिटल पुल भी बताया जा रहा है।

व्हाइट हाउस ने जो बयान जारी किया है उसके मुताबिक इसमें दो कॉरिडोर होंगे। पहला ईस्ट कॉरिडोर होगा, जो भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ेगा और दूसरा नॉर्दर्न कॉरिडोर होगा जो अरब की खाड़ी को यूरोप से जोड़ेगा। जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक भारत से माल यूएई के फुजैराह बंदरगाह तक पहुंचेगा, फिर यहां से सऊदी अरब। वहां से यह रेलमार्ग से जॉर्डन तक फिर इजरायल तक पहुंचेगा। 1850 किलोमीटर का लंबा रेलमार्ग पहले ही सऊदी अरब और जॉर्डन के बीच है। इजरायल के हाइफा बंदरगाह तक सामान पहुंचाने के लिए आगे के हिस्से पर काम किया जाएगा। ग्रीन ब्रिज का नाम इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि ट्रैक पर चलने वाले रेल इंजन को सोलर एनर्जी से चलाने का प्लान है।

G20 में हुई इस घोषणा से GCC भारत के लिए पड़ोस का सबसे ख़ास और महत्वपूर्ण रणनीतिक संगठन बन गया है। पहले भी यह भारत के एक बड़े हिस्से के लिए मनीआर्डर इकॉनमी का श्रोत रहा है। अरब देश रोजगार और तेल के अलावा एक निवेशक के रूप में भारत के लिए अवसरों का द्वार भी हैं। जीवाश्म ईंधन के प्रचुर भंडार के कारण इस सदी में जीसीसी देशों ने अकूत दौलत कमाई जो अभी भी कइयों के पास सरप्लस के रूप में हैं। धन की मात्रा हमेशा निवेश के विकल्प खोजती है। उनकी भौगोलिक परिस्थिति ऐसी नहीं है कि वहां बहुत ज्यादा निर्माण के कारखाने लग सकते हैं क्योंकि वहां का ज्यादातर एरिया रेगिस्तान है। तेल और गैस से कमाए गए उनके अकूत धन को एक मुफीद इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन की दरकार है।

इससे पहले कि उनसे लगा हुआ यूरोप या पुराना साझेदार अमेरिका या भारत का प्रतिद्वंदी चीन अथवा पाकिस्तान, या फिर बांग्लादेश और वियतनाम उनके निवेश को अपनी तरफ खींचे भारत को प्रोएक्टिव होकर पहले ही पहल करते हुए खाड़ी देशों के इस धन को भारत की तरफ मोड़ना चाहिए। इसीलिए जी 20 के आयोजन के बाद सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान एक अतिरिक्त दिन भारत की राजकीय यात्रा पर रहे और द्विपक्षीय वार्ताएं की। स्वाभाविक है वो भारत में बेहतर व्यावसायिक निवेश की संभावना तलाश रहे हैं।

मेसोपोटामिया और मिस्र की प्राचीन सभ्यता के समय से ही भारतीय क्षेत्र से उस क्षेत्र का व्यापारिक जुड़ाव रहा है। आसपास के खाड़ी देशों में हजारों साल के सम्बन्ध के कारण हिंदुस्तान को लेकर उनके यहां एक कड़ी पहले से मौजूद है। सामाजिक तौर पर हमारा और उनका संपर्क है ही, आर्थिक तौर पर भी पहले से है। मसालों का व्यापार हो या अनाज का या श्रम निर्यात का, और अब तेल गैस खरीद का, हम आर्थिक तौर पर भी एक दूसरे को जानते हैं। ऐसे में यदि इस कॉरिडोर के कारण उन्हें अपने पैसों के निवेश के लिये भारत मिलता है तो वह ख़ुशी ख़ुशी आना चाहेंगे।

इस तरह यह प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरीडोर न केवल भारत और अरब देशों के लिए अवसर है बल्कि आसियान देशों के लिए एक आर्थिक अवसर है। इस तरह पश्चिम की ओर व्यावसायिक संभावना खोलते हुए भारत पूरब के देशों को आर्थिक रूप से अपने साथ जोड़ सकता है। यह न केवल आर्थिक रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी बल्कि पूर्वी एशिया में चीन के विस्तार को भी रोकने में मददगार साबित होगी। इस प्रोजेक्ट के जरिए न सिर्फ भारत का व्यापार यूरोप और खाड़ी देशों तक पहुंचेगा बल्कि आसियान देशों समेत नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों का व्यापार भी बढ़ेगा जो सड़क मार्ग से भारत से जुड़े हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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