India China Border: पहले गलवान और अब तवांग जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार आखिर कौन है?
चीन के साथ संबंधों में यदि समय रहते दूरदर्शिता दिखाई गयी होती तो आज भारतीय सीमा वास्तव में तिब्बत से लगती, न की चीन से और मैकमोहन सीमा रेखा पर विवाद भी खड़े नहीं होते।

India China Border: भारत और चीन की सेनाएं गलवान के बाद कुछ दिनों पहले तवांग में आमने-सामने आ गईं। कुछ महीनों के अंतराल में यह दूसरी घटना है। हालांकि, इसबार भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को जिस तरह से पीछे हटाया उसके वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए। मगर यहां एक बात ध्यान देने की है कि आखिर ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है?
हम सभी जानते हैं कि चीन हमारा पड़ोसी देश है और वैश्विक रूप से एक बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। जिसे हम चाहते हुए भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह ठीक है कि ऐसी घटनाओं के कारण कुछ समय के लिए आपसी रिश्तों में खटास अथवा गतिरोध बन जाये लेकिन आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल को देखते हुए लम्बे समय तक इसे कायम रखना बिलकुल भी अनुकूल नहीं है।
अब सवाल पैदा होता है कि आखिर कहां ऐसी गलती हुई कि हर बार चीन और भारत के बीच कोल्डवॉर जैसे हालात बनने लग जाते हैं? दरअसल, यह सारी समस्या मैकमोहन रेखा से जुड़ी है। आसान भाषा में समझे तो मैकमोहन रेखा एक अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो भारत और तिब्बत को एक-दूसरे से अलग करती थी।
मैकमोहन रेखा 1914 में अस्तित्व में आई थी। इसे तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सरकार और एक स्वायत्त देश के नाते तिब्बत द्वारा आपसी सहमति से स्वीकार किया गया। हालाँकि, तब भी कुछ ऐसे इलाके थे जिन पर तिब्बत को आपत्तियां थीं लेकिन उनका व्यावहारिक समाधान संभव था। मगर जब 1947 में भारत को स्वाधीनता और 1949 में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन स्थापित हुआ तो इस सीमा रेखा को लेकर एक नयी तरह की समस्या पैदा हो गयी।
यह समस्या थी, चीन का तिब्बत पर कब्जा। इस प्रकार जो रेखा भारत और तिब्बत का सीमा निर्धारण करती थी, वह कथित रूप से भारत और चीन के बीच की सीमारेखा बन गयी। इधर वामपंथी चीन का गठन होने के साथ-साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नये सिरे से चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने की पहल शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने केएम पणिक्कर को चीन में भारत का पहला राजदूत बनाकर भेजा।
प्रधानमंत्री नेहरू के निजी सचिव रहे एमओ मथाई अपनी पुस्तक 'नेहरू युग जानी-अनजानी बातें' में लिखते हैं कि प्रधानमंत्री नेहरू मैकमोहन रेखा पर चीन से चर्चा करना चाहते थे लेकिन पणिक्कर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। पणिक्कर को यह लगता था कि चीनी कम्युनिस्ट कभी भी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा बनाई गयी मैकमोहन रेखा को स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को समय आने पर इस मुद्दे को छेड़ने का अनुरोध किया। प्रधानमंत्री ने उनके इस सुझाव को मान भी लिया।
यह एक तरह से चीन के सामने समर्पण था क्योंकि इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने इस मसले पर कभी चीन से बातचीत करना उचित नहीं समझा। यहां तक कि जब चाऊ-एन लाई 1954 में भारत के चार दिवसीय दौरे पर थे, तब भी सीमा रेखा तय करने जैसे अति-गंभीर सामरिक विषय के समाधान की बजाए पंचशील जैसे एकतरफा समझौते को अहमियत दी गयी। इसके नाम पर दोनों देशों विशेषकर भारत ने चीन के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का फैसला ले लिया।
अब प्रधानमंत्री स्वयं यह मानकर चलने लगे कि हिंदी-चीनी भाई-भाई हैं और मैकमोहन सीमा जैसा कोई विवाद है ही नहीं। जबकि चीन ने न सिर्फ तिब्बत को हथिया लिया बल्कि वह उसके आगे भी जाने के लिए तैयार बैठा था। फिर भी, एक लंबे समय तक भारत की चीन के प्रति नीति बिना किसी ठोस बातचीत के एक ऐसे विश्वास पर चल रही थी, जो वास्तव में कभी कायम ही नही हुआ था।
जल्दी ही, चीन ने अपने असली तेवर दिखाने का क्रम शुरू कर दिया तो उसके जवाब में प्रधानमंत्री नेहरू ने भी बातों को छुपाने का लंबा सिलसिला कायम कर लिया। जब पंचशील समझौते के तुरंत बाद वे कॉमनवेल्थ प्रतिनिधियों की बैठक में हिस्सा लेने लंदन गए तो वहां उन्होंने बताया कि चीन के साथ हमारा समझौता हो गया है और अगर चीन इस विश्वास को तोड़ेगा तो गलती चीन की मानी जायेगी।
यह भारत की सामरिक नीति थी जो अपने हितों को मजबूती से सामने रखने की बजाय स्कूली बच्चों की तरह सही-गलत खेल रही थी। इस बीच, 1959 में नेफा में चीन की घुसपैठ की खबरों से भारत के अखबारों के पन्ने भरने शुरू हो गए। लगभग यही वह दौर था जब लद्दाख में भी चीनी सेना की घुसपैठ ने हलचल मचानी शुरू कर दी थी।
नेफा को आज अरुणाचल प्रदेश के नाम से जानते है। पिछले दिनों इसी प्रदेश के तवांग इलाके में चीनी घुसपैठ और भारतीय सेना द्वारा उनके प्रतिकार के कुछ वीडियो सामने आये थे। 1959 में जब खबर आई कि चीन वहां घुसपैठ की कोशिश में है तो शुरू में इस मामले को ही झुठलाने के भरसक प्रयास किये गये। मामला थोड़ा और बिगड़ा तो प्रधानमंत्री को 1961 में वहां की स्थितियों का स्वयं अवलोकन करने के लिए जाना पड़ा। फिर भी उन्होंने देश के सामने वास्तविक स्थिति को नही रखा।
विडंबना यह थी कि जब चीन और भारत एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध के मुहाने पर आ गए थे तब जाकर उन्होंने पहली बार कहा कि "चीनी आक्रमण चिंता का विषय है और चीनी सेना कई मील अन्दर तक भारतीय सीमा में घुस चुकी है।" यह सितम्बर 1962 में प्रेस के सामने दिया उनका अधिकारिक बयान था। 1962 के युद्ध में नेफा सहित तवांग को चीन ने हड़प लिया था। वो तो भारतीय सेना का पराक्रम था कि बाद में पूरे इलाके को चीनी कब्जे से मुक्त करवा लिया गया।
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वास्तव में, आज इतिहास के इन किस्सों का पुनरावलोकन और विश्लेषण करने की जरूरत है क्योंकि उस दौर में अगर समय रहते दूरदर्शिता दिखाई गयी होती तो आज भारतीय सीमा वास्तव में तिब्बत से लगती, न की चीन से और यह मैकमोहन सीमा जैसे विवाद भी इसी के साथ नगण्य हो जाते।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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