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Bihar Politics: बिहार में जाति आधारित राजनीति के सौ साल

आज 2023 में जब जाति आधारित जनगणना को सार्वजनिक किया गया है तब संयोग से बिहार में जातिवादी राजनीति के भी सौ साल पूरे हो रहे हैं। आज से ठीक सौ साल पहले बिहार में सीमित मताधिकार के विधानसभा चुनाव हुए थे उसी चुनाव में बिहार में जातिवादी राजनीति के बीज बोये गये थे जिसका परिणाम आज संपूर्ण जाति जनगणना के रूप में सामने आया है।

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के बाद सीमित मताधिकार के आधार पर 1923 में विधान पारिषद चुनाव हुए थे। उस समय चार अधिक लगान वाले, चार मध्यम लगान और नौ निम्न लगान वाले जिलों में चुनावों की प्रक्रिया शुरू हुई तो सभी लोगों को मताधिकार नहीं मिला था।

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जिले से जितना लगान मिलता था, उसके मुताबिक मताधिकार तय किया गया था। उच्च लगान मतलब 64 रुपये, मध्यम था 48 रुपये और निम्न लगान देने वाले रैयत 16 रुपये का लगान देते थे। इस तरह करीब पंद्रह एकड़ की जोत वाले छोटे किसान भी मतदाता बन गए थे। उस समय कुल पंजीकृत मतदाता 3,74,812 ही थे क्योंकि स्त्रियों को कोई मताधिकार नहीं मिला था।

इन चुनावों में कांग्रेस काउंसिल में जाने के सवाल पर "बदलाव के पक्षधर" (प्रो-चेंजर्स) और "बदलाव के विरोधी" (नो-चेंजर्स) में बंट गयी थी। जो बदलावों के पक्षधर थे वो देशबंधु चित्तरंजन दास के नेतृत्व में अलग स्वराज पार्टी गठित करके चुनावों में उतरे। इन दोनों धड़ों में मई 1923 को समझौता हो गया था जिसमें तय हुआ कि स्वराज पार्टी के उम्मीदवारों का विरोध करने के बदले कांग्रेस तटस्थ रहेगी। जब नवम्बर 1923 में चुनाव हुए तो स्वराज पार्टी विधानसभा की 12 में से आठ पर और प्रांतीय काउंसिल की 76 में से केवल 12 पर विजयी हुई।

थोड़े ही वर्षों में सभी कांग्रेसी काउंसिल प्रवेश के पक्षधर यानि प्रो-चेंजर हो गए थे। जब तक 1926 में चुनाव होते तब तक कुछ कांग्रेसियों ने अलग होकर इंडिपेंडेंट कांग्रेस पार्टी बना ली थी और इसके उम्मीदवार सरकारी और स्वराज पार्टी, दोनों के ही उम्मीदवारों के खिलाफ उतरे। जो जातियों की संरचना काउंसिल की थी, उस पर जे.ए. हब्बल ने इंडियन स्टेट्युटरी कमीशन को एक रिपोर्ट भेजी थी। उसके मुताबिक - बाभन (भूमिहार), वैद्य, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ जातियां कुल आबादी का 13 फीसदी थीं लेकिन परिषद के निर्वाचित सदस्यों में 65 प्रतिशत इन्हीं जातियों के लोग थे।

चुनाव प्रचार में इस दौर में रैयतों (किसानों) का पक्ष लेना जरूरी हो गया था, क्योंकि मतदाता तो अधिकाँश रैयत ही थे। इसका नतीजा हुआ इसी दौर में स्वामी विद्यानंद की किसान सभा का उदय, जिसने चार सीटें ली, और इकलौती बड़ी जाति होने के कारण बिहार चुनावों में यादवों का मत महत्वपूर्ण हो गया। स्वराज पार्टी ने भी यादव नेताओं से समर्थन की मांग की थी और जमींदारों के खिलाफ रैयतों का समर्थन भी किया था।

इसी दौर में चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली भी शुरू हो गयी थी और सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 1923 के चुनावों में बड़े पैमाने पर बोगस मतदान हुआ था। इसके अलावा मतदाताओं को शराब और रुपये का लालच देना, सांप्रदायिक और जातिय उन्माद भड़काना, मतदाताओं को गाड़ी में बिठाकर मतदान केन्द्रों तक पहुंचाना, सब कुछ सौ साल पहले से बिहार में हो रहा है। चुनावों के खर्चे में भी ये दिख जायेगा क्योंकि 1920 में एक उम्मीदवार का औसत चुनावी खर्च जहां 325 रुपये बताया गया था, वहीँ 1923 में ये बढ़कर 550 रुपये, और 1926 में 1140 रूपए पर जा पहुंचा था। माना जा सकता है कि असली खर्च बताये गए खर्चे से कहीं अधिक रहा होगा, लेकिन सिर्फ बताये गए खर्च को भी देखें तो पांच वर्षों में ये करीब चार गुना बढ़ा दिखता है।

इसकी तुलना जब उस दौर के लगान (16 से 64 रुपये) से करेंगे तो साफ पता चल जायेगा कि चुनावों में जाति और पैसे का असर कितना था। ऐसे बिहार में जब करीब सौ साल बाद फिर से जातीय जनगणना हुई है तो करीब-करीब वही नतीजे दिख रहे हैं, जिनका बिहार के लोगों को पहले ही पता था।

इनमें जो विवाद या समझने लायक बातें हैं, उन्हें सबसे पहले देखें तो सबसे पहले तथाकथित सवर्णों की बात करनी पड़ेगी। इनकी कुल आबादी 15 प्रतिशत के आस पास बताई जा रही है और जब बांटकर देखा जाता है तो ब्राह्मण 3.65 प्रतिशत, राजपूत 3.45 प्रतिशत, भूमिहार 2.86 प्रतिशत और कायस्थ केवल 0.06 प्रतिशत ही दिखते हैं। ये पूरा मिलाकर तो दस-ग्यारह प्रतिशत होता हुआ ही दिखता है, ऐसे में सवाल है कि बाकी चार फीसदी कहाँ से आया? असल में सवर्ण और पिछड़ा केवल हिन्दुओं की जातियों में नहीं होता, न ही आरक्षण केवल हिन्दुओं को मिलता है। मुहम्मडनों की शेख (3.82), पठान (0.75) और सैयद (0.22) बिरादरी भी सवर्णों में आती है।

बहुत से दूसरे मुहम्मडेन समुदायों की तरह न तो इनका जाति प्रमाणपत्र बनता है, न ही इन्हें ओबीसी कोटे में आरक्षण मिलता है। जब ओबीसी श्रेणी यानि अन्य पिछड़ी जातियों की बात होती है तो वहाँ भी बिहार की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में अलग है। जातियता के आधार पर हुए इस जनगणना के नतीजे देखते ही शायद ध्यान चला गया होगा कि पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 27.12 फीसदी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की आबादी 36.01 फीसदी के लगभग बताई जा रही है। अगर राजनैतिक प्रतिनिधित्व की बात करें तो इसमें से पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व आपको विधानसभा में दिखेगा, मगर अत्यंत पिछड़ा वर्ग शायद ही नजर आये। अकेले यादव बिरादरी के 52 सदस्य अभी की विधानसभा में मौजूद हैं। लोकसभा और विधानसभा में केवल पांच जातियों (यादव, राजपूत, भूमिहार, चमार, दुसाध) की स्थिति बता देती है कि राजनैतिक प्रतिनिधित्व किसे मिला।

कुल 40 लोकसभा सीटों में से 5 यादव, 7 राजपूत, 3 भूमिहार, 1 चमार, 4 दुसाध के पास हैं जो कुल लोकसभा सीटों का आधा यानी 20 बैठता है। इसी तरह बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में यादवों के पास 52, राजपूत के पास 28, भूमिहार के पास 21, चमार के पास 13, दुसाध के पास 13 यानी कुल मिलाकर 127 सीटें हैं।

थोड़े से इतिहास के साथ इन आंकड़ों को देखने के बाद संभवतः ये स्पष्ट हो पाया होगा कि बिहार में जाति आधारित जनगणना के नतीजे उतने सरल नहीं हैं जितना कई तथाकथित विश्लेषक बताने का प्रयास कर रहे हैं। साधारण उदाहरणों से इसे समझने के लिए आप बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों पर एक नजर डाल सकते हैं। बिहार में निषाद कहलाने वाली जातियां आपको रिपोर्ट के अत्यंत पिछड़ा वर्ग में दिखेंगी। केवट (0.71%) और मल्लाह (2.6%) नामों से ये नजर आती हैं और "सन ऑफ मल्लाह" नाम से खुद को प्रचारित करने वाले मुकेश सहनी वीआईपी नाम की पार्टी बनाकर चुनावों में उतरे थे और कुछ सीटें भी जीत ली थीं।

उचित प्रतिनिधित्व मांगने पर तथाकथित सामाजिक न्याय की पैरोकारी करने वालों से लेकर समाजवाद की वकालत करने वालों तक ने उनके साथ जो व्यवहार किया, वो किसी से छुपा नहीं है। पिछड़ा वर्ग से आने वाले यादव-कुर्मी जातियों ने राजनैतिक प्रतिनिधित्व पाया है लेकिन अत्यंत पिछड़ा वर्ग जो कि 36 प्रतिशत से अधिक है, उन्हें उतना राजनैतिक प्रतिनिधित्व मिला ही नहीं है। अब ये वर्ग 27 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग से अपना हिस्सा माँगना भी शुरू करेगा जो बिहार के सियासी समीकरणों पर असर डालेगा।

इसलिए बिहार की जाति जनगणना का असर 2024 तक ही सीमित करके नहीं देखना चाहिए। इसका दूरगामी असर होगा और ऐसा हो सकता है जो आज इसके सबसे मुखर समर्थक हैं उन्हें ही भविष्य में इसका सबसे अधिक नुकसान भी उठाना पड़े।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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