Nehru Gandhi Surname: क्या है नेहरू-गांधी परिवार के सरनेम का इतिहास?
साल 1936 में जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा ‘माय ऑटोबायोग्राफी’ लिखी, जिसमें उन्होंने अपने परिवार के इतिहास पर चर्चा की है। सामान्यतः उनके द्वारा सार्वजनिक की गयी जानकारी को ही सभी पुस्तकों में शामिल किया गया है।

Nehru Gandhi Surname: जवाहरलाल नेहरू ने अपने खानदान की शुरुआत जम्मू और कश्मीर से उनके एक पूर्वज के पलायन से की है। दरअसल, 1707 में मुगल बादशाह औरंगज़ेब के निधन के समय कश्मीर में फारसी और संस्कृत के एक विद्वान हुआ करते थे जिन्हें पंडित राज कौल के नाम से जाना जाता था। औरंगज़ेब के बाद मुगल सल्तनत की गद्दी जब बादशाह फर्रुखसियर को मिली तो अपने एक कश्मीर दौरे पर उनकी नजर राज कौल पर पड़ी। मुगल बादशाह ने राज कौल को दिल्ली आकर बसने का न्यौता दे दिया। जिसके बाद, 1716 के आसपास राज कौल अपने परिवार के साथ दिल्ली आकर बस गए। बदले में उन्हें मकान और जागीर दी गयी। मकान नहर के किनारे स्थित था, इसलिए उन्हें नेहरू कहा जाने लगा। जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा के अनुसार, "कौल जो उनका खानदानी सरनेम था, वह बदलकर कौल-नेहरू हो गया और आगे चलकर कौल गायब हो गया और हम महज नेहरू रह गए।"
दिल्ली से आगरा फिर इलाहाबाद
मुगल साम्राज्य के विघटन के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में वर्चस्व होना शुरू हो चुका था। अपना प्रभुत्व जमाने के लिए कंपनी ने छोटी-मोटी जागीरों को हड़पना शुरू कर दिया। इन्ही में एक जागीर राज कौल की भी थी। जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा के अनुसार, "जब हम नेहरू के नाम से पहचाने जाने लगे तो एक ऐसा डांवाडोल जमाना आया कि जिससे हमारे कुटुंब के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आये, जिसमें वह जागीर भी तहस-नहस हो गयी।"
जब यह जागीर समाप्त हुई तो वहां के जागीरदार राज कौल के पौत्र मौसाराम नेहरू थे। जागीर चली जाने पर मौसाराम के बेटे लक्ष्मीनारायण नेहरू ईस्ट इंडिया कंपनी में वकील की नौकरी करने लगे। जबकि लक्ष्मीनारायण के बेटे गंगाधर नेहरू थे जोकि कथित तौर पर दिल्ली में कोतवाल के रूप में तैनात थे। साल 1857 के विद्रोह के दौरान यह परिवार दिल्ली से आगरा जाकर बस गया। जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा के अनुसार, "1857 के गदर की वजह से दिल्ली से हमारे परिवार का सब सिलसिला टूट गया। हमारे खानदान के तमाम कागज-पत्र और दस्तावेज तहस-नहस हो गए। इस तरह अपना सबकुछ खो चुकने पर हमारा परिवार दिल्ली छोड़ने वाले कई और लोगों के साथ आगरा में जाकर बस गया।"
यहां एक बात ध्यान देने वाली यह है कि 1857 के महासंग्राम से जुड़े किसी भी अधिकारिक दस्तावेज में गंगाधर नाम के किसी व्यक्ति का दिल्ली में कोतवाल के रूप में तैनात होने का कोई उल्लेख नहीं है। दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में इतिहास और संस्कृति विभाग में प्रोफेसर एस.एस. अजीजुद्दीन हुसैन की पुस्तक '1857 रिविजिटेड बेस्ड ऑन पर्सियन एंड उर्दू डाक्यूमेंट्स' के अनुसार दिल्ली में उस दौरान गंगाधर नाम का कोई व्यक्ति कोतवाल नहीं था। इस पुस्तक में राष्ट्रीय अभिलेखागार के दस्तावेजों के आधार पर बताया गया है कि गदर के समय दिल्ली का कोतवाल काजी फैज़ुल्लाह था।
लाहौर से प्रकाशित '1857 इन द मुस्लिम हिस्ट्रोग्राफी' पुस्तक के संपादक एम. इकराम चगाताई के अनुसार काजी फैजुल्लाह से पहले दिल्ली का कोतवाल नवाब मोईनुद्दीन नाम का व्यक्ति था जिसे कंपनी का जासूस होने के चलते हटा दिया गया था। उसने एक पुस्तक लिखी जिसका अनुवाद एक ब्रिटिश अधिकारी ने किया था। साल 1898 में प्रकाशित उस पुस्तक का नाम 'टू नैटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी इन डेल्ही' था, जिसमें कहीं भी गंगाधर नेहरू का कोतवाल के रूप में तैनात होने का जिक्र नहीं है।
खैर, गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे या नहीं, इस पर संशय है। पता नहीं, जवाहरलाल नेहरू ने भी किस आधार पर अपने दादा को दिल्ली का कोतवाल बताया है? हां, इतना जरुर है कि आगरा में ही गंगाधर नेहरू के सबसे छोटे बेटे का जन्म हुआ जिनका नाम मोतीलाल नेहरू रखा गया। मोतीलाल के बड़े भाई नन्दलाल राजस्थान की खेतड़ी रियासत में दीवान की नौकरी करते थे। इतिहासकार बीआर नंदा अपनी पुस्तक 'मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया - मोतीलाल नेहरू' में लिखते है कि मोतीलाल की शुरूआती पढ़ाई इसी खेतड़ी रियासत में काजी सदरुद्दीन के यहां हुई जो उन्हें अरबी और पर्शियन पढ़ाते थे।
जवाहरलाल नेहरू का जन्म
मोतीलाल ने वकालत की पढ़ाई आगरा और कानपुर में पूरी की। जल्दी ही वे कानपुर के प्रमुख वकीलों में गिने जाने लगे। कुछ समय बाद मोतीलाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत शुरू कर दी। बीआर नंदा के अनुसार साल 1900 में उन्होंने मुरादाबाद के रहने वाले कंवर परमानन्द से इलाहबाद में एक आलिशान मकान खरीद लिया। इस मकान में एक बड़ा बगीचा और स्विमिंग पूल भी था लेकिन मकान बेहद टूटा-फूटा था। इसलिए मोतीलाल को यह मकान भी बेहद कम दामों यानी मात्र 19000 हजार में मिल गया। मगर उन्होंने उसके पुनर्निर्माण में लाखों रुपये खर्च किये।
बीआर नंदा के मुताबिक मोतीलाल नेहरू ने 1900, 1905 और 1909 की अपनी यूरोप यात्राओं के दौरान इस घर की सजावट के लिए खरीददारी की जिसमें काफी पैसा और समय दोनों खर्च किया। इस खरीददारी में महंगी कारें और अरबी घोड़े तक शामिल थे। जब मकान का जीर्णोद्वार पूरा हुआ तो उसका नाम आनंद भवन रखा गया।
जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा के अनुसार उनका बचपन, पिता मोतीलाल नेहरू के मुंशी मुबारक अली के साथ बिता। मुबारक अली का परिवार भी 1857 में खत्म हो गया था और वे इलाहाबाद आकर बस गए। मुबारक अली और जवाहरलाल नेहरू के बीच बहुत घनिष्ठ संबंध था। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपने बचपन का सबसे भरोसे का आदमी कहकर संबोधित किया है। बतौर जवाहरलाल नेहरू घंटों उनके पास लेटे-लेटे अलिफलैला और अन्य कहानी-किस्सें सुना करते थे।
इंदिरा नेहरू का जन्म
कश्मीर से दिल्ली, फिर आगरा होते हुए इलाहाबाद तक के सफर में राज कौल से लेकर मोतीलाल नेहरू तक यह परिवार भारतीय राजनीति में एक परिचित नाम हो गया था। फिर जवाहरलाल नेहरू की राजनैतिक सक्रियता से इस कौल-नेहरू परिवार की ख्याति और बढ़ गयी। इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू की एक बेटी का 19 नवंबर 1917 को जन्म हुआ, जिसका नाम इंदिरा नेहरू रखा गया। इंदिरा को घर में इंदु और प्रियदर्शिनी भी कहा जाता था। जब इंदिरा नेहरू की मां कमला नेहरू इलाहाबाद में राजनैतिक रूप से सक्रिय थी तब उनकी मुलाकात फिरोज गांधी से हुई जो उस समय छात्र हुआ करते थे। साल 1931 के आसपास इंदिरा नेहरू और फिरोज गांधी अच्छे दोस्त बन गए थे।
फिरोज गांधी कौन थे?
कांग्रेस नेता शशि भूषण अपनी पुस्तक 'फिरोज गांधी - ए पॉलिटिकल बायोग्राफी' में लिखते है कि फिरोज का जन्म 12 सितम्बर 1912 को एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जहांगीर फरेदून और मां रत्तीमई थी। जबकि इंदिरा गांधी की सबसे लोकप्रिय जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रेंक अपनी पुस्तक 'इंदिरा - द लाइफ ऑफ इंडिया नेहरू गांधी' में लिखती है, "यह एक सच्चाई है कि फिरोज गांधी का कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। इसके अलावा दूसरी एक सच्चाई यह है कि बंबई के पारसी मैटरनिटी हॉस्पिटल में 12 सितम्बर 1912 को रत्तीमई ने किसी लड़के को जन्म नहीं दिया था। इसलिए उनकी सगी मां शिरीन कमिस्सेरियट हो सकती है।"
दरअसल, फिरोज का जन्म तो बंबई में ही हुआ था और अधिकतर पुस्तकों में रत्तीमई को इनकी मां बताया गया है। मगर कैथरीन इस तथ्य को नकारती है। वहीं, 'फिरोज- द फॉरगॉटेन गांधी' के लेखक बर्टिल फाल्क लिखते हैं कि जब फिरोज सात महीने के थे तो उनको उनकी मां की बहन यानी मौसी डॉ. शिरीन कमिस्सेरियट ने गोद ले लिया था। बर्टिल ने यह दावा फिरोज की चचेरी बहन माकी डी. कमिस्सेरियट से एक इंटरव्यू लेने के बाद किया था।
बर्टिल ने अपनी पुस्तक लिखने से पहले फिरोज से जुड़े कई लोगों से मुलाकात की थी। दरअसल, वे फिरोज को गोद लेने वाले तथ्य से संतुष्ट नहीं थे। अपनी पुस्तक में वे लिखते हैं कि डॉ. शिरीन कमिस्सेरियट वैसे तो अविवाहित थी लेकिन उनकी इलाहाबाद के एक वकील, राज बहादुर कमला प्रसाद से बहुत गहरी दोस्ती थी। बर्टिल को मिली जानकारी के अनुसार डॉ. शिरीन का विवाह नहीं हुआ था फिर भी उन्होंने गर्भ धारण किया और वे पूरे एक साल तक इलाहाबाद से बाहर रही।
बर्टिल ने अपनी पुस्तक में फिरोज गांधी के जन्मप्रमाण पत्र को भी प्रकाशित किया है। इसमें पिता का नाम जहांगीर फरेदून घांडी और मां रत्तीमई (रतनबाई) लिखा है। इसके बावजूद भी बर्टिल लिखते है, "यह प्रमाण पत्र प्रमाणिक तो नजर आता है लेकिन यह मामलें पर पर्दा डालने की कोशिश भी हो सकती है। जो भी हो यह इस समस्या अभी भी अनसुलझी हुई है। अब बस डीएनए के माध्यम से ही इस गुत्थी को सुलझाया जा सकता है।"
अब हमारे सामने दो बिंदु है, फिरोज के माता-पिता का नाम रत्तीमई और जहांगीर फरेदून घांडी था। उन्होंने फिरोज को शिरीन कमिस्सेरियट को गोद दिया था। दूसरा, फिरोज की मां शिरीन कमिस्सेरियट ही थी लेकिन वे अविवाहित थी और सामाजिक बदनामी के चलते उन्होंने फिरोज के दस्तावेजों में माता-पिता का नाम रत्तीमई और जहांगीर लिखवा दिया। अब यह तो पक्का है कि फिरोज पारसी ही थे और उनका बचपन इसी धर्म के अनुसरण के साथ बिता। उनके रिश्तेदार और भाई-बहन सभी पारसी ही थे। एक बात और, फिरोज की पढ़ाई-लिखाई और विवाह संबंधी सभी निर्णय डॉ. शिरीन कमिस्सेरियट ही लिया करती थी।
फिरोज ने गांधी सरनेम कहां से लिया?
फिरोज के असली माता-पिता के साथ-साथ उनके द्वारा अपने नाम के आगे गांधी सरनेम लगाना भी एक पहेली बन चुका है। आमतौर पर कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने उन्हें अपना सरनेम दिया था। वैसे कभी ऐसे सरनेम नहीं दिया जाता। अगर, फिरोज को महात्मा गांधी ने गोद लिया होता तो यह संभव है। वहीं महात्मा गांधी और अन्य किसी लेखक ने भी ऐसा कोई जिक्र नहीं किया है।
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए जवाहरलाल नेहरू के ब्यान को देखा जा सकता है जोकि उन्होंने 25 दिसंबर 1933 को इलाहाबाद में दिया था। यह 'द लीडर' अखबार में प्रकाशित हुआ। उसमें वे 'श्री फिरोज गांधी' नाम का जिक्र करते है। यानी जब फिरोज मात्र 21 साल के थे तब भी उन्होंने अपने नाम के आगे गांधी लगाना शुरू कर दिया था।
बर्टिल फाल्क की पुस्तक 'फिरोज- द फॉरगॉटेन गांधी' के अनुसार फिरोज पर महात्मा गांधी का गहरा प्रभाव था। फिरोज ने भारत स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही हिस्सा लिया था। मगर, डॉ. शिरीन को फिरोज की यह गतिविधियां कभी पसंद नहीं आती थी और उनका पूरा जोर फिरोज की पढ़ाई-लिखाई पर ही रहता था। अतः 1931 में मोतीलाल नेहरू के निधन होने पर उन्हें श्रद्धांजलि देने महात्मा गांधी इलाहाबाद आये तो डॉ. शिरीन ने महात्मा गांधी से मुलाकात कर कहा कि आप फिरोज से कहें कि वह अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे, न कि स्वाधीनता संग्राम की गतिविधियों पर। इस पर महात्मा गांधी ने उन्हें जवाब दिया कि अगर फिरोज जैसे सात लोग मुझे और मिल जाए तो मैं सात दिन में आजादी दिलवा दूंगा।
इस वाकये का जिक्र फिरोज गांधी से जुड़ी लगभग हर पुस्तक में है। शायद यहीं से फिरोज ने अपने नाम के आगे गांधी लगाना शुरू कर दिया होगा और वह लोकप्रिय हो गया। इसलिए यह एक गलत अवधारणा है कि जब फिरोज की शादी इंदिरा नेहरू से हुई तो महात्मा गांधी ने उन्हें अपना सरनेम दिया था।
इंदिरा नेहरू और फिरोज गांधी का विवाह
फिरोज गांधी और इंदिरा नेहरू अपनी पढ़ाई के चलते कुछ समय लंदन में एकसाथ रहे। द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत से पहले दोनों भारत लौट आये। भारत लौटते ही इंदिरा ने अपने पिता जवाहरलाल नेहरू से कहा कि वे फिरोज से शादी करना चाहती है। हालांकि, नेहरू को इस शादी से कभी कोई दिक्कत नहीं थी और उन्होंने यह बात इंदिरा को भी स्पष्ट कर दी थी। दरअसल, उनका कहना था कि शादी एक व्यक्ति से होती है न कि पूरे परिवार से। इसलिए 26 फरवरी 1942 को दोनों की सगाई करवा दी गयी।
चूंकि दोनों के धर्म अलग-अलग थे इसलिए सामाजिक दवाब भी बहुत अधिक था। इस सन्दर्भ में महात्मा गांधी को कई पत्र प्राप्त हुए जोकि गुस्से और गालियों से भरे होते थे। हालांकि, महात्मा गांधी इस विवाह के एकदम पक्ष में थे लेकिन वे नहीं चाहते थे कि इंदिरा और फिरोज अपना-अपना धर्म बदल लें। यह बात उन्होंने सेवाग्राम से 2 मार्च 1942 को सार्वजानिक रूप से भी स्वीकार की। उन्होंने कहा, "मैं हमेशा से इस बात का घोर विरोधी रहा हूँ और अब भी हूँ कि स्त्री-पुरुष विवाह के लिए अपना धर्म बदलें। धर्म कोई चादर या दुपट्टा नहीं कि जब चाहा ओढ़ लिया, जब चाहा उतार दिया। इस मामलें में धर्म बदलने की कोई जरुरत नहीं है।"
हालांकि, महात्मा गांधी के सिर्फ कहने भर से यह संभव नहीं था। इसके लिए धार्मिक और कानूनी दोनों पक्षों का भी देखना जरुरी था। इसलिए महात्मा गांधी ने विवाह की तैयारियों पर बातचीत के लिए जवाहरलाल को वर्धा बुला लिया। यहां उन्होंने जवाहरलाल को एक विवाह की विधि सहित दिल्ली के रहने वाले लक्ष्मीधर शास्त्री के बारे में बताया जो यह विवाह संपन्न करवा सकते थे।
जब जवाहरलाल इलाहाबाद लौटे तो उन्होंने 16 मार्च 1942 को लक्ष्मीधर शास्त्री को एक पत्र लिखकर कहा कि "यह विवाह एक हिन्दू और गैर-हिन्दू के बीच हो रहा है। तो विवाह की विधि ऐसी हो जिसमें विवाह के बाद इंदिरा हिन्दू और फिरोज पारसी ही रहे।" आखिरकार 26 मार्च 1942 को बेहद सादगी से दोनों का विवाह हो गया। अगले दिन द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार यह विवाह मात्र डेढ़ घंटे में ही हो गया था।
इस बारे में जवाहरलाल के सेक्रेटरी एम.ओ. मथाई अपनी पुस्तक 'रेमेनिसेन्सेस ऑफ द नेहरू एज' में लिखते है कि "नेहरू जी ने 1942 में वैदिक रीति से विवाह की अनुमति क्यों दी? इसका कारण आजतक स्पष्ट नहीं है। उस समय वैदिक रीति से अन्तर्जातीय और विजातीय विवाह वैध नहीं माने जाते थे। ऐसा विवाह तभी वैध हो सकता था जब वह सिविल कानून के तहत हुआ हो।"
वैवाहिक जीवन कभी सफल नहीं रहा
शादी के बाद इंदिरा नेहरू अपना नाम इंदिरा गांधी लिखने लगी। पुपुल जयकार की पुस्तक 'इंदिरा गांधी - एन इंटीमेट बायोग्राफी' के अनुसार, फिरोज 1946 से 1952 के बीच लखनऊ में रहा करते थे। दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे को कभी-कभी मिलने भी आते थे। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बेटी की शादी में पड़ रही दरार को भांप लिया था लेकिन उन्होंने कभी पूछताछ नहीं की। उधर इंदिरा ने भी किसी बाहरी व्यक्ति को अपने निजी वैवाहिक जिंदगी में दखल देने की अनुमति नहीं दी।
वे आगे लिखती हैं कि जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा गांधी को फर्स्ट लेडी का अधिकारिक दर्जा मिला। जबकि फिरोज को प्रोटोकॉल उतना नहीं मिलता था और यह बात उन्हें खटकती थी। इसलिए गुस्से में और अपमानित होकर उन्होंने सभी अधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल होना ही छोड़ दिया था।
फिरोज पहली और दूसरी लोकसभा में सासंद निर्वाचित हुए थे और उन्होंने वहां अपने-आप को साबित करने का पूरा प्रयास किया। जबकि इंदिरा गांधी ने अपने राजनैतिक भविष्य के लिए संगठन यानी कांग्रेस पार्टी की राह चुनी। पुपुल जयकर के अनुसार इंदिरा गांधी के बढ़ते कद से दोनों के रिश्तों में और ज्यादा खटास आ गयी। अब फिरोज न सिर्फ उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने लगे बल्कि दूसरी महिलाओं के साथ खुलकर दोस्ती बढ़ाने लगे।
पुपुल के अनुसार इंदिरा ने फिरोज को 1958 में तलाक देने का भी मन बना लिया था। बतौर पुपुल यह बात खुद इंदिरा गांधी ने उन्हें बताई थी। इस बीच फिरोज को एक बार हृदयाघात आ चुका था और तब इंदिरा अपने पिता के साथ भूटान की यात्रा पर थी। इसके बाद 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया तो उनका वैवाहिक जीवन लगभग समाप्त हो गया था।
इसके बाद, 8 सितंबर 1960 को फिरोज गांधी को दूसरी बार हृदयाघात आया और निधन हो गया। फिरोज गांधी का अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर किया गया और उनकी चिता को मुखाग्नि उनके बड़े बेटे राजीव गांधी ने हिन्दू रिति-रिवाजों के साथ दी। इसके अलावा, उनकी अस्थियों का भी विसर्जन हिन्दू रीति से गंगा नदी में किया गया था।
क्या फिरोज गांधी हिन्दू बने?
ऐसा कहा जाता है कि जब फिरोज गांधी अपनी मृत्यु के एकदम करीब थे तब उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा के तौर पर हिन्दू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार करने को कहा था। अगले दिन समाचार-पत्रों में भी इस बात को बहुत ज्यादा हाईलाइट किया गया था कि फिरोज का हिन्दू परंपरा से संस्कार किया गया।
हालांकि, उन्होंने किसके आगे यह कहा इसकी कोई स्पष्टता नहीं है। महात्मा गांधी के अनुसार तो उन्होंने अपना धर्म कभी बदला ही नहीं था और इंदिरा गांधी के साथ उनका उतार-चढाव भरा रिश्ता भी एक बड़ी बात थी। दरअसल, इंदिरा और फिरोज की शादी का सिविल रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ था। कुछ लेखकों ने इस बात का दावा किया है कि दोनों ने अपनी शादी को कानूनी रूप से मान्यता दिलवाई थी। मगर इस तथ्य में सत्यता नहीं है क्योंकि इसके पीछे एक बड़ा कारण जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा हुआ था। वे कभी ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि पारसी और वैदिक तरीकों में बहुत सी समानतायें है। इसलिए महात्मा गांधी से बात करने के बाद शादी की विधि भी इस प्रकार बनवाई गयी जिससे आगे कोई दिक्कत न हो।
जवाहरलाल नेहरू की बहन और इंदिरा की बुआ, कृष्णा नेहरू की शादी एक जैन से हुई थी। हालांकि, जैन और हिन्दू वैवाहिक रिवाजों में तो कोई भिन्नता ही नहीं हैं फिर भी इस शादी को कानूनी रूप से मान्यता दिलवाई गयी थी। जबकि कृष्णा की मां इसके खिलाफ थी। खुद कृष्णा नेहरू अपनी पुस्तक 'डिअर टू बिहोल्ड -एन इंटिमेट पोर्ट्रेट ऑफ इंदिरा गांधी' में लिखती है कि मेरे पति ने कोर्ट मैरिज वाले दिन मुझसे कहा था कि ऐसा लग ही नहीं रहा कि मेरी शादी हो रही है।
कृष्णा नेहरू ने इंदिरा गांधी पर लिखी पुस्तक में इस वाकये का जिक्र उस पन्ने पर किया है जहां उन्होंने इंदिरा गांधी की शादी का उल्लेख किया है। दरअसल, उनका कहने का मतलब है कि मेरी शादी तो कोर्ट के माध्यम से हुई लेकिन इंदिरा के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
ऐसा बाद में हुआ हो उसकी भी संभावना कम है क्योंकि यह किताब 1969 में आई थी। कोर्ट मैरिज या धर्म परिवर्तन जैसा कुछ हुआ होता तो कृष्णा नेहरू इसका उल्लेख जरुर करती क्योंकि उनके मन में अपनी कोर्ट मैरिज को लेकर एक टीस थी। इन तथ्यों के आधार पर फिरोज जीवनभर पारसी ही रहे और उन्होंने कभी हिन्दू धर्मं नहीं अपनाया। साल 1970 में प्रकाशित आनंद मोहन की पुस्तक, 'इंदिरा गांधी - ए पर्सनल एंड पॉलिटिकल बायोग्राफी' के अनुसार फिरोज ने अपनी वसीयत में खुद को पारसी जोराष्ट्रीयन कहकर संबोधित किया है। इसलिए फिरोज के परिवार ने उनकी शरीर की बची हुई राख को इलाहाबाद स्थित पारसी कब्रिस्तान में पारसी परंपरा के अनुसार दफनाया था। यह कब्र आज भी वहां मौजूद है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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