गणेश चतुर्थी विशेष: गणपति नहीं होते तो यह गणराज्य भी नहीं होता
आज गणेश चतुर्थी है। दस दिन बाद यानि अनंत चतुर्दशी 9 सिंतबर को गणपति विसर्जन होगा। कोरोना के कारण पिछले दो साल से महाराष्ट्र में गणेशोत्सव सार्वजनिक रूप से नहीं मनाया जा सका था, लेकिन इस बार पूरे धूमधाम से उत्सव मनाने की अनुमति राज्य सरकार ने दी है। दस दिन पूरा महाराष्ट्र गणेशोत्सव के रंग में डूबा रहेगा।

महाराष्ट्र में गणेश पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि इसकी शुरूआत महाराष्ट्र से ही हुई थी। महाराष्ट्र में 500 साल पहले लोग अपने घरों में गणेश की छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाते थे और उसकी पूजा करते थे। ऐसी मान्यता है कि पुणे में स्थित कस्बा पेठ गणपति मंदिर सबसे पुराना है जिसकी स्थापना शिवाजी की माता जीजामाता ने की थी और इसी मंदिर में जीजामाता और शिवाजी ने आदिल शाह से महाराष्ट्र वापस लेने का प्रण किया था।
शिवाजी के बाद पेशवाओं ने भी गणेश पूजा की परंपरा को जारी रखा। जब पेशवा बाजीराव ने शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया तो उन्होंने किले में गणेश भगवान की स्थापना की। पेशवाओं का शासन समाप्त होने और औपनिवेशिक युग शुरू होने के बाद शनिवार वाड़ा में होने वाला गणेशोत्सव भी बंद हो गया। हालांकि, बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर के होल्कर और ग्वालियर के सिंधिया के महलों में गणेशोत्सव उत्साह के साथ जारी रहा लेकिन महल के भीतर ही।
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लोकमान्य तिलक और सार्वजनिक गणेश उत्सव
वह लोकमान्य तिलक ही थे जिन्होंने महल और घरों के बंद दरवाजों तक सीमित गणेश पूजा को सार्वजनिक उत्सव में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की और इसे महाराष्ट्र के घर घर का उत्सव बना दिया। 1857 में अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम को कुचल कर क्रांतिकारियों को मार डाला था। अंग्रेजों के इस कदम से लोगों के दिलों में भय व्याप्त हो गया था। लोग एक जगह एकत्रित नहीं होते थे। लोकमान्य तिलक ने लोगों में व्याप्त भय को महसूस किया और माना कि जब तक लोग एक जगह एकत्रित होने की हिम्मत नहीं करेंगे तो अंग्रेजों से कैसे लड़ेगे और देश को स्वतंत्रता कैसे मिलेंगी? इस कारण लोगों को साथ में आने, सार्वजनिक स्थान में एकत्रित करने और उनमें आनंद, उर्जा और उमंग का संचार करने के साथ डर को मिटाने के लिए हर घर में होने वाली गणेश पूजा को सार्वजनिक पूजा में तब्दील कर दिया।
बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र के पुणे में 1893 में पहले सार्वजनिक गणेश उत्सव का आयोजन किया था। गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का माध्यम बनाया। गणेश उत्सव को उन्होंने एक आंदोलन का स्वरूप दे दिया।
तिलक के शुरू किए गणेशोत्सव ने सामाजिक चेतना और राष्ट्र के प्रति एकता जागृत करने का काम किया। तिलक के शुरू किए गए गणेशोत्सव की एक विशेषता यह भी रही कि इस उत्सव में हिन्दुओं के साथ सभी धर्मो, क्षेत्रों और जाति संप्रदायों के लोग शामिल हुए और इस कारण महाराष्ट्र में गणेशोत्सव एक सर्वव्यापी त्योहार बन गया। तिलक द्वारा शुरू किए गए गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज महाराष्ट्र में गणेशोत्सव सबसे बड़ा त्योहार है। महाराष्ट्र गणपति को मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। लेकिन अंग्रेज तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव को अंग्रेज शासन के लिए खतरा मानते थे।
भारतीय समाज को एक दूसरे के खिलाफ तलवार लिए खड़े सम्प्रदायों में तो अंग्रेजों ने बांटा ही। हमारे मंगल के प्रतीकों का भी उन्होंने सांप्रदायीकरण किया। वो जानते थे कि भारतीय समाज के मंगल में उनका अमंगल था। इसलिए उन्होंने तिलक के शुरू किए गए सार्वजनिक गणेशोत्सव को रोकने और उसमें व्यवधान डालने की कोशिश की,लेकिन वह सफल नहीं हो सके।
तिलक के कारण गणपति घर घर के देवता बन गए और सिर्फ हिन्दुओं के ही नहीं, हर धर्म के लोग गणपति में अपना मंगल देखने लगे। हर वर्ग में सब काम बिना किसी विध्न के सम्पन्न हों और चारों तरफ मांगल्य रहे इसलिए गणपति को सबसे पहले पूजा जाता है। बच्चों को भी सबसे पहले ॐ श्री गणेशायनम: से लिखना पढ़ना सिखाया जाता है और विवाह की पत्रिका सबसे पहले गणपति को ही दी जाती है।
गणपति का ऐसा स्थान और महत्व हमारे धार्मिक ही नहीं सांस्कृतिक जीवन में भी है। घर घर मनते एक धार्मिक उत्सव को सार्वजनिक जीवन का मंगल उत्सव बनाने का श्रेय लोकमान्य तिलक को जाता है। लेकिन दस दिन तक मनने वाले इस सार्वजनिक उत्सव के आखिरी दिन जब गणपति का विसर्जन कर गणेश भक्त घर लौटते है तो घर में एक अजीब सा खालीपन महसूस करते हैं। जैसे बेटी की विदाई के बाद घर में खालीपन और मन उदास महसूस होता है वैसे ही गणपित बप्पा के विसर्जन के बाद अनुभव होता हैं।
गणपति विसर्जन के बाद जैसे घर के सामान्य जीवन का क्रम भी उदासी में डूबकर थम जाता है। ऐसा महसूस होता है जैसे जीवन का सारा उत्सव अपने ही हाथों नदी में विसर्जित करके बहा आए हों।हालांकि गणेश जी का महत्व और महात्म्य पूरे देश में है लेकिन महाराष्ट्र के लिए गणेश उत्सव क्या है यह दिल्ली या शेष भारत के लोग तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक खुद महाराष्ट्र जाकर नहीं देखेंगे। दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में गणेशोत्सव की वो जातीय स्मृतियां नहीं हैं जो इस उत्सव को लगभग हर घर और हर वर्ग का उत्सव बना दें। ऐसा सिर्फ महाराष्ट्र में ही होता है।
गणपति की जितनी जरूरत हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन को है उतनी ही देश की राजनीति को भी है। जैसे महाराष्ट्र में गणपति ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी वैसे ही आज हमारे नेताओं को कोई सद्बुद्धि दे सकता है तो वह बुद्धि और मंगल के देवता गणपति ही दे सकते हैं। हमारे गणराज्य को बचाने के लिए अग्रदूत के रूप में गणपति ही चाहिए क्योंकि गणपति नहीं होते तो यह गणराज्य भी नहीं होता।
"गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ती मोरया"
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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