MSP Guarantee: एमएसपी की गारंटी से ही संभव होगा गरीबी उन्मूलन
MSP Guarantee: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो चार जातियां बताई हैं- उनमें गरीब, युवा और महिला के अलावा किसान भी हैं, लेकिन पिछले साढ़े तीन साल में यह दूसरा मौका है, जब किसानों को अपनी वाजिब मांगों के लिए सड़क पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है।
इनमें सबसे बड़ी मांग अपनी फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य सुरक्षा की है, जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के नाम से जाना जाता है। दुर्भाग्य यह है कि जब भी किसान एमएसपी की मांग करते हैं, तो देश में एक ऐसी मज़बूत लॉबी है, जो अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा समझने का दम भरते हुए लोगों को गुमराह करना शुरू कर देती है, जैसे यह कोई गलत या अव्यावहारिक मांग हो।

लेकिन एक बुनियादी बात सबको समझनी चाहिए कि कोई भी उत्पादक बाज़ार में तभी खड़ा रह सकता है, जब उसकी मेहनत और लागत के ऊपर उसे एक न्यूनतम मुनाफा मिले। जिस तरह से किसी उद्योगपति को उसकी लागत पर न्यूनतम मुनाफा नहीं मिलेगा, तो उसका उद्योग बंद हो जाएगा, उसी तरह से अगर किसानों को भी उसके हिस्से का वाजिब मुनाफा नहीं मिलेगा तो उसके खेत बिक जाएंगे।
यूं कहने को एमएसपी की व्यवस्था अभी भी है, लेकिन एक तो वह केवल सरकारी खरीद में है; दूसरा- मुख्य रूप से कुछ ही राज्यों के किसानों को मिल पाती है; तीसरा- केवल 23 फसलों के लिए है; और चौथा- लगभग 6% किसानों को ही कवर कर पाती है। इसके कारण भारतीय संविधान में सभी नागरिकों के लिए "अवसर की समता" सुनिश्चित किये जाने का वादा किसानों के मामले में दम तोड़ता नज़र आता है।
सवाल है कि यदि 6% किसानों को एमएसपी मिल रही है, तो बाकी 94% किसानों ने कौन-सा गुनाह किया है कि उन्हें यह सुरक्षा न मिले? इसी तरह यदि पंजाब-हरियाणा के किसानों को अभी इसका अधिक लाभ मिल रहा है, तो दूसरे राज्यों के किसानों को इस सुरक्षा का लाभ कम क्यों मिले? यदि धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा, चना, मूंग, अरहर, गन्ना, कपास आदि 23 फसलों की एमएसपी हो सकती है, तो अन्य अनेक प्रमुख फसलों को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा जाए?
किसानों द्वारा एमएसपी की मांग के विरोध में देश की किसान-विरोधी लॉबी मुख्य रूप से पांच दलीलें देती है, लेकिन ये सारी दलीलें बेहद खोखली हैं, इनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।
प्राइवेट सेक्टर में भी एमएसपी लागू हो
उनकी पहली दलील यह होती है कि सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह सभी किसानों की सारी फसलें एमएसपी पर खरीद ले। लेकिन यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि एमएसपी गारंटी में केवल सरकार ही किसानों की सारी फसलें खरीदे, बल्कि आवश्यक यह है कि यदि प्राइवेट सेक्टर भी फसलों की खरीद करे तो उसे एमएसपी पर खरीद के लिए बाध्य किया जाए।
यह तरीका व्यावहारिक भी है और संभव भी, क्योंकि ऐसा तो है नहीं कि भारत में प्राइवेट सेक्टर पर सरकार का रेगुलेशन नहीं चलता। यदि सरकार प्राइवेट सेक्टर में न्यूनतम मजदूरी, पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य शर्ते तय कर सकती है, तो वह किसानों के लिए एमएसपी भी तय क्यों नहीं कर सकती? आखिर भारत में यह अंधा कानून कब तक चलेगा कि जो प्राइवेट सेक्टर बेचते समय एमआरपी द्वारा अति-लाभान्वित है, उसे खरीदते समय एमएसपी देने के लिए भी न कहा जाए?
सरकार पर बोझ नहीं बढ़ेगा, बल्कि फायदा होगा
किसान विरोधियों की दूसरी दलील यह होती है कि एमएसपी की कानूनी गारंटी देने से सरकार पर 10 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आ जाएगा। सवाल है कि जब सरकार को सारी खरीद करनी ही नहीं है और प्राइवेट सेक्टर को भी इसमें शामिल करना है, तो सरकार पर 10 लाख करोड़ का अतिरिक्त खर्च कैसे आ जाएगा?
मुद्दा यह भी है कि किसान-विरोधियों को केवल किसानों पर होने वाले सरकार के खर्चे दिखाई देते हैं, किसान के सक्षम होने से उसे हो सकने वाली बचत या लाभ क्यों नहीं दिखाई देते? इसे एक छोटे से उदाहरण से समझिए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन के मुताबिक, आज देश में 11.8 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि दी जा रही है, जिसपर सालाना 60 हज़ार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का खर्च आता है।
यहां समझने की बात यह है कि जब सरकार किसानों को उनकी फसलों पर एमएसपी दिला देगी, तो उनका घाटा खत्म हो जाएगा, खेती उनके लिए फायदे का सौदा बन जाएगी, इसके बाद उन्हें इस तरह की रेवड़ियों की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। इसी तरह सरकार बहुत सारे किसान परिवारों को मुफ्त राशन, लोन, तरह-तरह की सब्सिडी, घर और शौचालय इत्यादि बनाने के लिए पैसे आदि भी दे रही है।
किसान यदि सक्षम हो जाएंगे, तो उन्हें इन बैसाखियों की भी ज़रूरत नहीं रह जाएगी। इन सब पर सरकार का पैसा बचेगा। इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर मेहनत और लागत के हिसाब से किसानों को सरकारी और निजी खरीद में न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल गया, तो भारत के कृषि जगत और ग्राम्य जीवन में एक बहुत बड़ी क्रांति आ जाएगी। देश की आधी से अधिक गरीबी तो एक झटके में खत्म हो जाएगी, जिसे मिटाने के लिए पिछले 77 साल से सरकारें केवल वादे ही किये जा रही हैं।
देश में महंगाई के लिए किसान नहीं हैं ज़िम्मेदार
किसान विरोधियों की तीसरी दलील यह होती है कि किसानों की फसलें एमएसपी पर बिकने लगेंगी तो देश में महंगाई बढ़ जाएगी, लेकिन इसमें भी ज्यादा दम नहीं है। देश में महंगाई मुख्य रूप से सरकार के भारी भरकम टैक्स और कॉरपोरेट लूट के कारण है। इसे नियंत्रित करने के नाम पर केवल किसानों की ही बलि नहीं दी जा सकती। पांच रुपये की जेनरिक दवा आज बाज़ार में यदि अलग-अलग ब्रांडों के नाम पर सौ-सौ रुपये में बिक रही है, तो क्या इस महंगाई के लिए भी किसान ही ज़िम्मेदार हैं? प्राइवेट स्कूलों और अस्पतालों में जो लूट हो रही है, क्या उसके लिए भी किसान ही ज़िम्मेदार हैं?
यदि कृषि उत्पादों की भी बात करें, तो उदाहरण के लिए, गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2023-24 में 2125 रुपये था, जिसे 2024-25 के लिए 2275 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। देश के 94% किसान इससे भी कम कीमत पर गेहूं बेच रहे हैं, जो कि 1500 से 2000 रुपये क्विंटल के बीच ही है। यानी 15 से 20 रुपये किलो। लेकिन इसी गेहूं का आटा बनाकर बेचने वाली कंपनियां 250 से 300 रुपये में 5 किलो आटा बेच रही हैं। यानी 50 से 60 रुपये किलो।
सवाल है कि किसानों द्वारा 15 से 20 रुपये किलो बेचे जाने वाले गेहूं का आटा यदि ग्राहकों को 50 से 60 रुपये किलो मिल रहा है, तो इसके लिए किसान कहां से ज़िम्मेदार हो गया? इसलिए देश में महंगाई के लिए किसान कहीं से भी ज़िम्मेदार नहीं है। वह बेचारा तो न्यूनतम मूल्य सुरक्षा पाने के लिए लड़ाई लड़ रहा है। देश में महंगाई की ज़िम्मेदारी सबसे ज़्यादा उनकी है, जिन्हें अधिकतम खुदरा मूल्य का कवच पहनाकर बेहिसाब फायदा पहुंचाया जा रहा है।
किसानों को एमएसपी से उद्योगों को भी होगा फायदा
चौथी दलील कि किसानों को एमएसपी मिलने से उद्योग तबाह हो जाएंगे, और भी खोखली है। उद्योग तो अपने उत्पादों पर एमआरपी द्वारा संरक्षित हैं, इस प्रकार वे तो हमेशा ही अपने उत्पादों को लागत मूल्य से ज्यादा पर बेचते हैं, फिर वे कैसे तबाह हो जाएंगे? उल्टे किसानों की आमदनी बढ़ने से उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिसका लाभ उद्योग जगत को ही सबसे ज्यादा मिलेगा।
वैश्विक बाज़ार के लिए किसान की बलि दे दें?
पांचवी दलील यह कि यदि वैश्विक बाज़ार में कोई कृषि उपज सस्ती हुई और एमएसपी के कारण भारत में महंगी, तो भारतीय किसानों की फसलें नहीं बिकेंगी। यह भी बचकानी है, क्योंकि डब्ल्यूटीओ रिजीम में भी भारत सरकार आयात और निर्यात का नियमन करती ही है। जिन फसलों की देश में कमी हो जाती है, उनके निर्यात पर रोक लगाना और जिन फसलों की देश में अधिकता हो जाती है, उसके आयात को नियंत्रित करना यह तो चलता ही रहता है।
भारत सरकार भी नियंत्रण करती है और सभी देशों की सरकारें करती हैं। आखिर भारतीय नागरिकों का हित भारत का संविधान तय करेगा या अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तय करेगा? हमारे देश के किसान आत्महत्या करते रहेंगे और हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों की दुहाई देते रहेंगे?
यह तो सुनकर ही हैरानी होती है कि भारत में कृषि उत्पादों का कोई न्यूनतम मूल्य नहीं होगा। यानी उसका मूल्य शून्य भी हो सकता है। इससे बड़ी बकवास बात क्या हो सकती है? पुरानी से पुरानी, बेकार से बेकार वस्तुओं की नीलामी में भी एक आधार मूल्य तय कर दिया जाता है, जिसके ऊपर ही बोली लगाई जाती है। आईपीएल में खिलाड़ियों तक का आधार मूल्य तय कर दिया जाता है, उसके नीचे आप नहीं खरीद सकते। सरकार को भी अपने उत्पादों पर मोटा मुनाफा चाहिए। लगभग 30 रुपये का पेट्रोल-डीज़ल अपनी तेल कंपनियों के माध्यम से वह 100 रुपये या इससे भी ज्यादा में बेच सकती है, लेकिन किसानों को मुनाफे कमाने का अधिकार देने में उसे परेशानी है।
इसलिए एमएसपी न तो खैरात है, न बाज़ार के नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इस लोकतंत्र में सम्मानजनक जीवन जीने और अपनी ज़मीनें बचाने के लिए किसानों का "जन्मसिद्ध अधिकार" है। आखिर अपनी उपज के लिए मेहनत और लागत की कीमत वसूलने, सम्मानजनक जीवन जीने के लिए न्यूनतम मुनाफा लेने के अधिकार से कोई किसानों को कैसे वंचित कर सकता है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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