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Congress: क्या प्रमोद कृष्णम की पुकार सुनेगी कांग्रेस?

Congress: अपनी हर जीत को विचारधारा की जीत बताना और हार के लिए भाजपा की विचारधारा ही नहीं, मतदाताओं के विवेक तक को दोषी ठहरा देने का चलन कांग्रेस पार्टी में नया है। यह चलन इधर के दो-तीन दशक में शुरु हुआ है जब से भाजपा का मुखर उभार हुआ है। कांग्रेस घोषित तौर पर विचारधारा और समाज सुधार की राजनीति से परहेज ही करती रही है लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब कांग्रेस भी विचारधारा की राजनीति करने लगी है और उसकी राजनीतिक लड़ाई भाजपा की बजाय आरएसएस की विचारधारा से हो गयी है।

इसलिए उत्तर भारत के तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में मिली करारी हार के बाद उसके समर्थक हार के कारणों पर मंथन के बजाय वोट शेयर को वैचारिक आधार पर तौल रहे हैं और इसमें भी 'विचारधारा की जीत' खोज रहे हैं। उनके प्रवक्ता यह समझाने में लगे हैं कि हमारा वोट शेयर कम नहीं हुआ है इसलिए इसे कांग्रेस की हार के बजाय उसकी विचारधारा की जीत कहा जाना चाहिए। हालांकि प्रमोद कृष्णम जैसे कांग्रेस के नेता ऐसे भी हैं जो अब कांग्रेस की विचारधारा को ही हार के लिए दोषी ठहराने लगे हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कांग्रेस की विचारधारा क्या है और प्रमोद कृष्णम् कांग्रेस की कौन सी विचारधारा पर सवाल उठा रहे हैं?

election results 2023 Which ideology of Congress is Pramod Krishnam raising questions on?

नब्बे के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था उस समय तक कांग्रेस वीपी सिंह के उभार के कारण गहरी चोट खा चुकी थी। इसी दौर में राजीव गांधी की हत्या ने कांग्रेस को नेहरु वंश के नेतृत्व से विहीन भी कर दिया था। हालांकि वीपी सिंह लंबे समय तक शासन नहीं चला पाये और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर भी चार महीने में विदा हो गये। लेकिन यही वह समय था जब कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट और कांग्रेसी एक बात पर एकराय हो गये कि भाजपा को रोकना है तो उसे सांप्रदायिक पार्टी बता कर बदनाम कर देना है। मूल रूप से यह विचार न तो कांग्रेस का था और न ही सोशलिस्टों का। लेकिन आरएसएस के कट्टर विरोधी कम्युनिस्टों के साथ ये दोनों कदमताल करते हुए खड़े हो गये।

हालांकि इसके पहले वीपी सिंह सरकार में भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियां एक साथ सपोर्ट दे चुकी थीं। लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की रामरथयात्रा और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदल गयीं। अब एक ओर भाजपा थी और दूसरी ओर बाकी सब। लंबे समय से मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते आ रहे कम्युनिस्टों और कांग्रेस के लिए यह सामूहिक पीड़ा थी कि वो हिन्दुओं के ध्रुवीकरण के खिलाफ कम से कम वैचारिक रूप से साथ खड़े हो जाएं। सोशलिस्ट पार्टियां भी इस कोरस गान में इनके साथ शामिल हो गयीं और सामूहिक रूप से घोषित किया गया कि भाजपा सांप्रदायिक पार्टी है और इसके खिलाफ लड़ाई में सब साथ रहेंगे।

यहां से पहली बार कांग्रेस की उस राजनीतिक विचारधारा का जन्म होना शुरु हुआ जिसकी बुनियाद हिन्दू विरोध पर बनायी गयी थी। जवाहरलाल नेहरू रहे हों या इंदिरा गांधी। वो भी हिन्दूवादी राजनीति से परहेज ही करते थे लेकिन इसके पीछे उनकी राजनीति की अपनी सेकुलर सोच थी। लेकिन वो अपने आपको हिन्दू विरोधी के रूप में दिखना या दिखाना पसंद नहीं करते थे। पीवी नरसिंहराव तक यह सिलसिला कमोबेश चलता रहा, लेकिन उसके बाद मामला एकतरफा होता चला गया।

दूसरी ओर जितना भाजपा का 'सेकुलर विरोध' हुआ उतना ही उसका विस्तार होता चला गया। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने केन्द्र में 13 दिन की पहली सरकार चलाकर केन्द्र में सरकार चला लेने का अपना दावा पेश कर दिया। इसके बाद 13 महीने, फिर साढे चार साल अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए गठबंधन बनाकर भाजपा की सरकार चलायी। कदम कदम पर कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट और कांग्रेसी उन्हें वैचारिक आधार पर घेरते रहे लेकिन जब जनता को हिन्दुत्व की राजनीति रास आने लगी तो भाजपा इससे पीछे भला क्यों हटती?

लेकिन 2014 में मोदी के तूफानी उभार ने हिन्दुत्व की राजनीति को ठोस धरातल दे दिया। अब वह पूर्ण बहुमत वाली पार्टी बन गयी और वैचारिक रूप से प्रखर हिन्दुत्ववादी भी। उधर बंगाल में ममता बनर्जी ने पहले ही कम्युनिस्टों का किला ढहा दिया था। बची खुची कसर भाजपा ने बंगाल से 2019 में 18 लोकसभा सीटें जीतकर पूरी कर दी। बंगाल से कम्युनिस्ट राजनीति का दबदबा खत्म हो जाने के बाद अब दिल्ली में बैठे कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों और बेरोजगारों के लिए जरूरी हो गया था कि वो अपना कोई नया ठिकाना तलाशते। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कांग्रेस को चुना।

प्रमोद कृष्णम जो आरोप लगा रहे हैं कि कुछ कम्युनिस्ट सलाहकार कांग्रेस को बर्बाद कर रहे हैं, इतना भी गलत नहीं है। जेएनयू में आईसा और एसएफआई की राजनीति करनेवाले छात्र नेता इस समय राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के प्रमुख सलाहकार हैं जिनके बारे में मोदी भी बहुत पहले खान मार्केट गैंग कहकर तंज कस चुके हैं। इतना ही नहीं जिला और राज्य स्तर पर जहां कम्युनिस्ट छात्र संगठन आइसा या एसएफआई से निकले छात्र नेता उपलब्ध हैं, उन्हें कांग्रेस में पद भी दिया जा रहा है। कोरोना काल से पहले प्रियंका गांधी के दफ्तर से यह संदेश जारी किया गया था कि जहां भी कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के नेता कांग्रेस ज्वाइन करने के इच्छुक हों, उन्हें जिलाध्यक्ष या राज्यस्तर पर ज्वाइन कराया जाए।

इसके पीछे संभवत: राहुल या प्रियंका का मानना है कि उन्हें 'आरएसएस की विचारधारा' को जिस वैचारिक संघर्ष के जरिए जवाब देना है वह कम्युनिस्टों की मदद लिए बिना संभव नहीं है। पत्रकारिता या फिर सोशल मीडिया पर भी कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि के लोग प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के समर्थक बन गये। भाजपा की 'सांप्रदायिक' राजनीति के विरोध में ये कम्युनिस्ट लोग जो तर्क गढ़ते हैं वही कांग्रेस का पक्ष हो जाता है। जैसे इन्हीं लोगों ने 2014 में मोदी की प्रचंड जीत के बाद यह तर्क गढ़ा था कि उनके नाम पर तो सिर्फ 40 प्रतिशत वोट पड़ा है, इसका अर्थ है कि आज भी 60 प्रतिशत लोग मोदी को पसंद नहीं करते हैं। ऐसे हास्यास्पद कुतर्कों और तथ्यों के कारण कांग्रेस को कितना फायदा हुआ है, यह दस साल से देश देख रहा है।

लेकिन बात सिर्फ मोदी और भाजपा विरोध तक सीमित नहीं रही। धीरे धीरे आरएसएस की विचारधारा को फासिस्ट बताकर उसे बदनाम किया गया ताकि मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश किया जा सके। राहुल गांधी को कांग्रेस का नेता बनाने के बजाय आरएसएस की विचारधारा का विरोध करनेवाला मुखौटा बना दिया गया जिन्हें आजतक यह छोटी सी बात भी समझ नहीं आयी कि जो संगठन चुनाव ही नहीं लड़ता उस पर राजनीतिक हमला करके भला क्या हासिल हो जाएगा? शोर इतना पैदा किया गया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तक यूएन में खड़े होकर भारत पाकिस्तान संबंध के बेहतर न होने के लिए आरएसएस की विचारधारा को दोष देने लगे।

राहुल गांधी के मुखारबिन्द से कभी हिन्दुत्व और हिन्दुइज्म का फर्क करवाया गया तो कभी नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खुलवाई गयी, या फिर कभी मैं सावरकर नहीं हूं, बुलवाया गया। कांग्रेस के भीतर यह नया चलन था जिसे दोहराने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ता भी मजबूर थे। अब पार्टी फोरम पर अगर कोई हिन्दू धर्म की बात भी कर दे तो उसे हाफपैण्ट वाला फासिस्ट घोषित कर दिया जाता है। यही शिकायत प्रमोद कृष्णम भी कर रहे हैं। ऐसे में ऊपरी तौर पर राहुल या प्रियंका को मंदिरों में भेजकर इसे संतुलित करने का प्रयास भले किया गया हो लेकिन वास्तविकता और अभिनय में अंतर तो होता ही है। वास्तविकता में हिन्दू विरोध कांग्रेस का नया कर्म हो चुका है जिसे एके एंटनी कमेटी काफी पहले कह चुकी है।

इसलिए आज अगर प्रमोद कृष्णम जैसे साधारण नेता मुखर होकर कांग्रेस की हार के लिए सनातन धर्म का विरोध प्रमुख कारण बता रहे हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है। जैसा कि पीएम मोदी ने भी एक पत्रकार का वीडियो जारी करके यही संकेत किया है कि कांग्रेस के नेता और समर्थक जनता तक की समझ पर सवाल उठाने लगे हैं लेकिन कभी गिरेबान में झांककर नहीं देख पा रहे हैं कि उनके पतन का कारण क्या है। इसलिए फिलहाल तो इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि प्रमोद कृष्णम जैसे साधारण से नेता के बोलने को कांग्रेस नेतृत्व बहुत गंभीरता से लेगा। कम्युनिस्टों से सीखकर उन्होंने अपनी राजनीतिक हार में भी वैचारिक जीत देखने का नजरिया विकसित कर लिया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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